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राष्ट्रचिंतना की पाँचवी मासिक गोष्ठी प्रिंस इंस्टीट्यूट ऑफ़ इन्नोवेटिव टेक्नोलॉजी ग्रेटर नोएडा में संपन्न हुई

Vision Live/Greater Noida 
राष्ट्रचिंतना की पाँचवी मासिक गोष्ठी आज रविवार दिनांक २० अगस्त २०२३ को प्रिंस इंस्टीट्यूट ऑफ़ इन्नोवेटिव टेक्नोलॉजी, 9-नॉलेज पार्क-3, ग्रेटर नोएडा में 
संपन्न हुई। बैठक की अध्यक्षता एयर कोमोडोर पुष्पेंद्र कुमार VSM ने की तथा मेजर सुदर्शन सिंह (से नि) एवं श्री अजेय कुमार गुप्ता, अधिवक्ता उच्चतम न्यायालय ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त किये। संस्थान के अध्यक्ष डॉ भरत सिंह ने सभी आमंत्रित अतिथियों का पुष्प गुच्छ देकर स्वागत किया तथा बताया की उनके संस्थान में बालिकाओं को ५० % फीस में छूट दी जाती है एवं  वंचित और निर्धन छात्रों को छात्रवृति प्रदान की जाती है। डॉ भरत सिंह ने बताया कि 
 राष्ट्रचिंतना के अध्यक्ष एवं कुमायूं व गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफ बलवंत सिंह राजपूत ने कहा कि देश की न्याय प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। भारतीय न्याय संहिता - बदलाव की आवश्यकता और लागू करने की चुनौतियां, यह काफी महत्वपूर्ण व  गंभीर विषय है और इस पर पुरे समाज में विमर्श और इसकी जानकारी की आवश्यकता है । पुराने कानून अंग्रेजों ने आजादी से पहले बनाये थे जिनमें बदलाव की आवश्यकता है। न्यायपालिका का भी यह कर्त्तव्य है और न्यायपालिका को भी अपनी सीमा रेखा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए और यह ध्यान रखना चाहिए कि देश हित  सबसे ऊपर है।
एयर कोमोडोर पुष्पेंद्र कुमार ने कहा कि १५ अगस्त १९४७ को जो हमें स्वतंत्रता मिली वह सत्ता हस्तांतरण था और वास्तव में जो आजादी मिली वो २०१४ के बाद देखने को मिलती है।
गोष्ठी का संचालन एमिटी इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के हेड तथा राष्ट्रचिंतना के  संगठन सचिव प्रो विवेक कुमार  और प्रो. बबलू सिंह रावत अधिवक्ता (मीडिया प्रमुख, राष्ट्रचिंतना) ने किया। उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता  अजेय कुमार गुप्ता ने  भारतीय न्याय संहिता - बदलाव की आवश्यकता और इसकी पृष्ठ्भूमि पर प्रकाश डाला। अजेय गुप्ता ने अधिनियम, संहिता और बिल के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री ने लोकसभा में तीन नए विधेयक पेश किये हैं जो देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में संपूर्ण बदलाव का प्रस्ताव करते हैं जैसे: भारतीय न्याय संहिता विधेयक, 2023, जो IPC, 1860 को प्रतिस्थापित करेगा , भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता विधेयक, 2023, जो CrPC, 1898 को प्रतिस्थापित करेगा, भारतीय साक्ष्य विधेयक, 2023, जो साक्ष्य अधिनियम, 1872 को प्रतिस्थापित करेगा। ये कानून भारतीयों के लिए हैं, उन्हें सुगम न्याय दिलाने के लिए हैं | कानून ऐसे हों जो संविधान की रक्षा करें।
अजेय गुप्ता ने भारतीय साक्ष्य विधेयक, 2023 में प्रस्तावित परिवर्तन के बारे में बताया कि यह विधेयक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को किसी भी उपकरण या सिस्टम द्वारा उत्पन्न या प्रसारित किसी भी जानकारी के रूप में परिभाषित करता है जो किसी भी माध्यम से संग्रहित या पुनर्प्राप्त करने में सक्षम है। यह इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता जैसे प्रमाणिकता, अखंडता, विश्वसनीयता आदि के लिये विशिष्ट मानदंड निर्धारित करता है, जो डिज़िटल डेटा के दुरुपयोग या छेड़छाड़ को रोक सकता है। यह DNA साक्ष्य जैसे सहमति, हिरासत की श्रृंखला आदि की स्वीकार्यता के लिये विशेष प्रावधान प्रदान करता है, जो जैविक साक्ष्य की सटीकता और विश्वसनीयता को बढ़ा सकता है। यह विशेषज्ञ की राय को मेडिकल राय, लिखावट विश्लेषण आदि जैसे साक्ष्य के रूप में मान्यता देता है, जो किसी मामले से संबंधित तथ्यों या परिस्थितियों को स्थापित करने में सहायता कर सकता है। यह आपराधिक न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांत के रूप में निर्दोष होने की धारणा का परिचय देता है, जिसका अर्थ है कि अपराध के आरोपी प्रत्येक व्यक्ति को उचित संदेह से परे दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाता है।
दूसरे वक्ता मेजर सुदर्शन सिंह ने भारतीय न्याय संहिता विधेयक, 2023 में प्रस्तावित परिवर्तन के सम्बन्ध में विस्तार से बताया कि यह  विधेयक आतंकवाद एवं अलगाववाद, सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह, देश की संप्रभुता को चुनौती देने जैसे अपराधों को परिभाषित करता है, जिनका पूर्व में कानून के विभिन्न प्रावधानों के तहत उल्लेख किया गया था। यह राजद्रोह के अपराध को रोकने पर केंद्रित है, जिसकी औपनिवेशिक विरासत के रूप में व्यापक रूप से आलोचना की गई थी जो स्वतंत्र भाषण और असहमति पर अंकुश लगाता है। यह मॉब लिंचिंग के लिये अधिकतम सज़ा के रूप में मृत्युदंड का प्रावधान करता है, जो हाल के वर्षों में एक खतरा रहा है। इसमें विवाह के झूठे वादे पर महिलाओं के साथ यौन संबंध बनाने के लिये 10 वर्ष की कैद का प्रस्ताव है, जो धोखे और शोषण का एक सामान्य रूप है। यह विधेयक विशिष्ट अपराधों के लिये सजा के रूप में सामुदायिक सेवा का परिचय देता है, जो अपराधियों को सुधारने और जेलों में भीड़भाड़ को कम करने में मदद कर सकता है। इस विधेयक में चार्जशीट दाखिल करने के लिये अधिकतम 180 दिनों की सीमा तय की गई है, जिससे मुकदमे की प्रक्रिया में तेज़ी आ सकती है और अनिश्चितकालीन देरी को रोका जा सकता है। इस विधेयक में कहा गया है कि पुलिस को शिकायत की स्थिति के विषय में 90 दिनों में सूचित करना होगा, जिससे जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ सकती है। 
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता विधेयक, 2023 में प्रस्तावित परिवर्तन के बारे में उन्होंने कहा कि यह परीक्षणों, अपीलों और गवाही की रिकॉर्डिंग के लिये प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देता है, जिससे कार्यवाही के लिये वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग की अनुमति मिलती है। यह विधेयक यौन हिंसा के व्यक्तियों के बयान की वीडियो-रिकॉर्डिंग को अनिवार्य बनाता है, जो सबूतों को संरक्षित करने और बलपूर्वक या हेरफेर को रोकने में मदद कर सकता है। इस विधेयक में यह आवश्यक है कि पुलिस सात वर्ष या उससे अधिक की सज़ा वाले मामले को वापस लेने से पहले पीड़ित से परामर्श करे, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि न्याय से समझौता या उसे अस्वीकार नहीं किया जाए। CrPC की धारा 41A को धारा 35 के रूप में पुनः क्रमांकित किया जाएगा। इस परिवर्तन में एक अतिरिक्त सुरक्षा शामिल है, जिसमें कहा गया है कि कम से कम पुलिस उपाधीक्षक (DSP) रैंक के किसी अधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना कोई गिरफ्तारी नहीं की जा सकती है, खासकर 3 वर्ष से कम सज़ा वाले दंडनीय अपराधों के लिये या 60 वर्ष से अधिक आयु वाले व्यक्तियों के लिये। यह फरार अपराधियों के संबंध में न्यायलय को उनकी अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने और सज़ा सुनाने की अनुमति देता है, जो भगोड़ों को न्याय से बचने से रोक सकता है। यह मजिस्ट्रेटों को ईमेल, एसएमएस, व्हाट्सएप संदेशों आदि जैसे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के आधार पर अपराध का संज्ञान लेने का अधिकार देता है, जिससे साक्ष्य संग्रह और सत्यापन की सुविधा मिल सकती है। मृत्युदण्ड के मामलों में दया याचिका राज्यपाल के पास 30 दिन के अंतर्गत और राष्ट्रपति के पास 60 दिन के अंतर्गत दाखिल की जानी चाहिये।
प्रोफेसर विवेक कुमार ने बताया कि राष्ट्रचिंतना के तत्वावधान में समसामयिक ज्वलंत विषयों पर चिंतन-मनन हेतु राष्ट्रवादी विचारों के प्रबुद्ध नागरिकों की  प्रत्येक माह के तीसरे रविवार को एक विचार गोष्ठी आयोजित की जाती है |  
गोष्ठी में राष्ट्रचिंतना के उपाध्यक्ष नरेश कुमार गुप्ता, राजेंद्र सोनी एवं डॉ आरती शर्मा, संयुक्त सचिव मेजर निशा सिंह, डॉ उमेश कुमार, आनंद प्रकाश, व्यवस्था प्रमुख संजीव सालवान, सह व्यवस्था प्रमुख उमेश पांडे, गुड्डी तोमर और विवेक द्विवेदी, संयोजक अशोक राघव, सह संयोजकश्रीमती संगीता सक्सेना, मीडिया प्रमुख  प्रोफेसर बबलू सिंह रावत और डॉ नीरज कौशिक, आर श्री निवासन,  राजेश बिहारी, नमित भाटी, विनय चौधरी, कर्नल के के तंवर, कर्नल बी सी यादव , अक्षय कुमार सिंह राणा , संगीता वर्मा , विजेंद्र सिंह , अधिवक्ता सौरव भाटी , अवनेश नायक, तनिश शर्मा , जूली शर्मा , मेजर सुरेश राणा , कैप्टेन शशि भूषण, अनिल कुमार शर्मा , राहुल पाल , उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता श्री अवधेश दुबे आदि गणमान्य प्रबुद्ध जन उपस्थित थे।