किसानों के साथ साथ देश की 80 प्रतिशत जनता पर भारी पड़ेगी और मुनाफा उद्योगपति और सत्ता में बैठी सरकार लेगी

 


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व रक्षामंत्री राजनाथ सिंह इस काले कानून को अपने संसदीय क्षेत्र में कुछ समय के लिए लागू कर ही देख लें,ं फायदा और नुकसान का सब पता चल जाएगा?

 


चौधरी शौकत अली चेची

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तीन कृषि  कानून के मुख्य बिंदुओं को समझने की जरूरत है। सबका साथ सबका विकास जाए भाड़ में भाजपा तो सिर्फ सरकार चला रही है उद्योगपतियों व गोदी मीडिया व अंधभक्ति की आड़ में आम जनता और किसानों की कोई परवाह नही है। पहला कानून- भंडारण करने पर रोक हटी किसानों की इनकम घटी आम आदमी की जेब फटी उद्योगपतियों की इनकम बढ़ी लगभग 96 प्रतिशत किसान अपने माल का भंडारण नहीं कर सकता अपने माल को 100 किलोमीटर दूर जाकर नहीं बेचता है। 1976 से कानून चला आ रहा है कि किसान अपने माल को कहीं भी बेच सकता है। दूसरा कानून- कॉन्टैक्ट फार्मिंग खेती हजारों बीघे जमीन कांटेक्ट पर व्यापारी लेगा अपनी मर्जी के हिसाब से फसल की बुवाई व लागत कराएगा। यही नहीं किसान खेत में क्या कर रहा है और क्या नहीं कर रहा उद्योगपतियों के कर्मचारी देखरेख करेंगे? वहीं किसानों की फसल पर लोन लिया जा सकता है। फसलो के रेट का एग्रीमेंट तय किया जाएगा मार्केट रेट में माल की कीमत कम है तो कई तरह के बहाने बनाकर माल में कमी निकाल कर उद्योगपति किसानों का माल नहीं खरीदेगा। दूसरा कॉन्टैक्ट एग्रीमेंट के हिसाब से मार्केट रेट ज्यादा हो जाता है तो किसान के माल को व्यापारी करार के तौर पर जबरजस्ती किसान से माल खरीद लेगा। तीसरा व्यापारी किसान के माल को घर या खेत से खरीद कर बगैर पैसे दिए कोई बहाना बनाकर फरार हो जाएगा। किसान एसडीएम या डीएम  की मद्द से  इंसाफ नहीं ले पाएंगे। वैसे भी हमारे देश में लगभग 4 करोड़ केस पेंडिंग पड़े हैं, आर्थिक स्थिति अन्य कारणों से देश में किसान केस लड़ने में सक्षम नहीं है। तीसरा कानून-मंडी से व्यापारी माल खरीदने पर 2. 5 प्रतिशत टैक्स देता है और अन्य  फॉर्मेलिटी खर्च व्यापारी करता है। प्राइवेट मंडी अमीर इंसान ही बना सकता है, किसान या आम नागरिक नहीं। कुछ दिन तक सरकारी मंडियों की खरीद से 50 या 100 किसानों के माल को महंगा खरीदा जाएगा। किसान लालच में प्राइवेट मंडियों में जाएगा और सरकारी मंडी अपने आप समाप्त हो जाएंगी, फिर उद्योगपति किसानों के माल को सस्ती कीमत में ही खरीदेगा। इन तीन कृषि कानूनों को किसानों और बुद्धिजीवियों ने काला कानून नाम दिया है, जिसका बुरा प्रभाव, मंदी और महंगाई की मार किसानों के साथ साथ देश की 80 प्रतिशत जनता पर भारी पड़ेगी और मुनाफा उद्योगपति और सत्ता में बैठी सरकार लेगी। गहराई से समझा जाए तो यह नोटबंदी व जीएसटी से भी ज्यादा खतरनाक है। तीन कृषि कानूनांं के भाजपा सरकार फायदे गिना कर उद्योगपतियों व अपने निजी नुकसान को बचाने की कोशिश कर रही है। केंद्र पर लगभग 162 लाख करोड़ रुपए का कर्ज हो चुका है और प्रदेशों पर कर्ज अलग है क्या अन्नदाता को अदानी अंबानी को बेचकर कर्ज उतारने का फार्मूला तैयार नही किया है? इस बिल का समर्थन करने वाले अंधभक्त या गोदी मीडिया अपने निजी स्वार्थ में किसानों का अपमान कर देश की लगभग 80 प्रतिशत जनता को बर्बादी में धकेलने के लिए सरकार का साथ दे रहे हैं। मेरा दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व रक्षामंत्री राजनाथ सिंह इस काले कानून को अपने संसदीय क्षेत्र में कुछ समय के लिए लागू कर ही देख लें,ं फायदा और नुकसान का सब पता चल जाएगा?

लेखकः- चौधरी शौकत अली चेची भारतीय किसान यूनियन ( बलराज  ) के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष  हैं।