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परशुराम जन्मोत्सव: सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना और वैचारिक एकता का विराट मंच बना ग्रेटर नोएडा

📍मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ ग्रेटर नोएडा 
ग्रेटर नोएडा में आयोजित भगवान श्री परशुराम जन्मोत्सव समारोह इस वर्ष अपने व्यापक स्वरूप, विविध आयामों और प्रभावशाली उपस्थिति के कारण एक ऐतिहासिक आयोजन के रूप में स्थापित हुआ। ब्राह्मण सभा (पंजीकृत) उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में 17 मई को संपन्न इस कार्यक्रम ने न केवल धार्मिक आस्था को सुदृढ़ किया, बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैचारिक समन्वय का भी सशक्त संदेश दिया।
वैदिक परंपरा से हुआ शुभारंभ, आध्यात्मिकता से सराबोर रहा वातावरण
समारोह की शुरुआत वैदिक रीति-रिवाजों के साथ हुई, जहां आचार्य रविकांत दीक्षित के निर्देशन में गुरुकुल के बटुकों ने स्वस्तिवाचन और मंगलाचरण प्रस्तुत किया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अतिथियों एवं अध्यक्ष मंडल द्वारा दीप प्रज्वलन किया गया। पूरे सभागार में गूंजती ऋचाओं ने कार्यक्रम को एक दिव्य और अनुशासित स्वरूप प्रदान किया, जिससे उपस्थित जनसमूह आध्यात्मिक ऊर्जा से अभिभूत नजर आया।
परशुराम के आदर्शों को आधुनिक संदर्भ में किया गया प्रस्तुत
कार्यक्रम में वक्ताओं ने भगवान श्री परशुराम के जीवन और उनके आदर्शों को वर्तमान समाज के संदर्भ में जोड़ते हुए प्रस्तुत किया। मुख्य अतिथि डॉ. महेश शर्मा (सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री) ने कहा कि परशुराम केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म, न्याय और आत्मसम्मान के प्रतीक हैं। उन्होंने समाज को संगठित होकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया।
विशिष्ट अतिथियों में अभिषेक शर्मा (जिला अध्यक्ष, भाजपा), तेजपाल नागर (विधायक, दादरी), मुकूल उपाध्याय (पूर्व विधायक एवं राज्य मंत्री), संजय शर्मा (चेयरमैन, खैर नगरपालिका) और शैलेन्द्र शर्मा (सीईओ, टीवी न्यूज चैनल) ने भी अपने विचार रखे। वक्ताओं ने सामाजिक एकजुटता, युवाओं में संस्कार और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण पर विशेष जोर दिया।
संतों के प्रवचनों ने जगाई आध्यात्मिक चेतना
हरिद्वार से पधारे संत प्रवर आनंद ब्रह्मचारी महाराज ने अपने ओजस्वी प्रवचनों से कार्यक्रम में आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की। उन्होंने भारतीय संस्कृति, गौ संरक्षण, नैतिक मूल्यों और धर्म के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि समाज तभी सशक्त होगा जब वह अपनी जड़ों से जुड़ा रहेगा।
साहित्य और संवेदना का अद्भुत संगम
समारोह का एक विशेष आकर्षण प्रसिद्ध गीतकार संतोष आनंद की गरिमामयी उपस्थिति रही। उनके भावपूर्ण और ओजस्वी उद्बोधन ने पूरे सभागार को भावनात्मक रूप से जोड़ दिया। उन्होंने अपनी शैली में समाज, संवेदना और मानवीय मूल्यों को रेखांकित किया, जिससे कार्यक्रम का स्तर और ऊंचा हो गया।
साहित्यिक सत्र में कवयित्री शिखा दीप्ति तथा कवि अमित शर्मा, मुकेश शर्मा और राज सिंघल ने अपनी रचनाओं के माध्यम से ओज, व्यंग्य, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक सरोकारों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। यह सत्र दर्शाता है कि आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि बौद्धिक विमर्श का भी सशक्त मंच था।
ऐतिहासिक क्षण: परशुराम प्रतिमा भेंट
कार्यक्रम के दौरान भगवान श्री परशुराम की फाइबर ग्लास से निर्मित भव्य प्रतिमा भेंट किया जाना आयोजन का सबसे स्मरणीय और गौरवपूर्ण क्षण रहा। ब्राह्मण सभा के सचिव बृजेश कुमार शर्मा के विशेष प्रयासों से संपन्न इस पहल ने आयोजन को स्थायी सांस्कृतिक पहचान प्रदान की। संत प्रवर की उपस्थिति में यह क्षण भावनात्मक और ऐतिहासिक बन गया।
व्यापक जनभागीदारी ने बढ़ाई आयोजन की गरिमा
समारोह में बड़ी संख्या में समाज के विभिन्न वर्गों से आए लोगों ने भाग लिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि ऐसे आयोजन अब समाज को जोड़ने और दिशा देने का माध्यम बन रहे हैं।
उपस्थित प्रमुख गणमान्य व्यक्तियों में शामिल रहे:
सुरेश चंद्र पचौरी (अध्यक्ष), देवी शरण शर्मा (पूर्व डीजीसी), सुनील शर्मा (संयोजक), अजीत प्रधान, वेद प्रकाश शर्मा, हरिओम शर्मा, वेद कुमारी मुद्गल, हरेंद्र शर्मा, यतेंद्र शर्मा, सुमन कुमार शर्मा, महेश शर्मा बादौली, निर्वेश मुद्गल, अखिलेश पाठक, गौरव उपाध्याय, ममता तिवारी, छाया शुक्ला, कुलदीप शर्मा, अनुज उपाध्याय, ब्रजेश शर्मा, जी.पी. गोस्वामी, डॉ. आरती शर्मा, भगवत प्रसाद शर्मा, चित्र कुमार एवं सुभाष शर्मा सहित अनेक गणमान्य नागरिकों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
भविष्य की दिशा: निरंतर होंगे ऐसे आयोजन
ब्राह्मण सभा के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि समाजोत्थान, सांस्कृतिक संरक्षण और युवा पीढ़ी में संस्कार जागरण के उद्देश्य से इस प्रकार के आयोजन आगे भी निरंतर किए जाते रहेंगे। उन्होंने इसे एक आंदोलन का रूप देने की बात कही, जिससे समाज के हर वर्ग तक सकारात्मक संदेश पहुंचे।
विजन लाइव का विश्लेषण:
ग्रेटर नोएडा का यह आयोजन केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्संरचना की दिशा में उठाया गया संगठित प्रयास प्रतीत होता है। जिस तरह से संत, साहित्यकार, राजनेता और समाजसेवी एक मंच पर आए, वह इस बात का संकेत है कि भविष्य में ऐसे मंच सामाजिक संवाद और सांस्कृतिक नेतृत्व की भूमिका निभा सकते हैं।
विशेष रूप से युवाओं को जोड़ने, परंपराओं को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करने और समाज को वैचारिक रूप से संगठित करने की जो कोशिश यहां दिखाई दी, वह आने वाले समय में ऐसे आयोजनों को और अधिक प्रभावशाली बना सकती है।
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