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30 हजार महीना दो या ठेले लगवाओ” — रंगदारी, फायरिंग और कोर्ट की सख्ती


🚨 स्पेशल स्टोरी | दादरी से बड़ी खबर
⚖️ “30 हजार महीना दो या ठेले लगवाओ” — रंगदारी, फायरिंग और कोर्ट की सख्ती
मौहम्मद इल्यास ‘दनकौरी’ / गौतमबुद्धनगर 
ग्रेटर नोएडा के दादरी क्षेत्र से सामने आया यह मामला अब केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था, पुलिस की भूमिका और कानूनी लड़ाई का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है। एक अधिवक्ता और नगर पालिका सभासद को कथित रूप से 30 हजार रुपये प्रतिमाह देने या स्कूल के बाहर ठेले लगवाने का दबाव बनाया गया। विरोध करने पर फायरिंग तक का आरोप है।
🔴 क्या है पूरा मामला?
पीड़ित अक्षय शर्मा (एडवोकेट) के अनुसार, 10 मार्च 2025 को आरोपी कपिल देव शर्मा ने उनके पारिवारिक इंटर कॉलेज के बाहर 10 ठेले लगवाने की बात कही। मना करने पर आरोपी ने तमंचा तानकर धमकी दी—
👉 “या तो 30 हजार रुपये महीना दो, या ठेले लगवाओ, नहीं तो जान से मार दूंगा।”
पीड़ित का आरोप है कि इसके बाद आरोपी ने फायरिंग की, जिसमें वह बाल-बाल बच गए।
🔫 हत्या के प्रयास का आरोप
एफआईआर के अनुसार, आरोपी ने जान से मारने की नीयत से गोली चलाई, जो पीड़ित के सिर के पास से निकल गई। मौके पर मौजूद लोगों ने हस्तक्षेप कर उनकी जान बचाई।
⚖️ कोर्ट का हस्तक्षेप: अब दर्ज हुई एफआईआर
जब पुलिस स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई, तो मामला अदालत पहुंचा।
👉 अपर सिविल जज (सी.डी.) प्रथम/ए.सी.जे.एम., गौतमबुद्धनगर श्री सुमित कुमार-2 की अदालत ने दादरी पुलिस को एफआईआर दर्ज कर विवेचना के आदेश दिए।
👉 इसके बाद दादरी पुलिस ने संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
🧑‍⚖️ अधिवक्ताओं की भूमिका बनी केस का टर्निंग पॉइंट
इस पूरे मामले में पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता विकास शर्मा और सिद्धार्थ त्यागी की भूमिका बेहद अहम रही।
🔹 दोनों अधिवक्ताओं ने न सिर्फ मामले को कानूनी रूप से मजबूती से प्रस्तुत किया, बल्कि पुलिस की निष्क्रियता के खिलाफ अदालत में प्रभावी पैरवी की।
🔹 उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय Lalita Kumari Vs State of UP (2014) का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि संज्ञेय अपराध में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है।
🔹 उनकी दलीलों के आधार पर ही अदालत ने हस्तक्षेप करते हुए पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए।
👉 अधिवक्ता विकास शर्मा ने कहा:
“अगर समय पर पुलिस कार्रवाई करती, तो पीड़ित को अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाना पड़ता।”
👉 अधिवक्ता सिद्धार्थ त्यागी का कहना है:
“यह मामला दिखाता है कि कानून की जानकारी और सही पैरवी से न्याय पाया जा सकता है।”
⚠️ पुलिस पर सवाल
पीड़ित का आरोप है कि:
थाना दादरी में शिकायत लेने से इनकार किया गया
उच्च अधिकारियों को सूचना देने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई
यही कारण रहा कि अंततः कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा।
📜 किन धाराओं में केस?
मामले में बीएनएस की गंभीर धाराओं—हत्या के प्रयास, रंगदारी, धमकी समेत अन्य अपराधों—में मुकदमा दर्ज किया गया है।
🧾 आरोपी का आपराधिक रिकॉर्ड
एफआईआर में आरोपी के खिलाफ पहले से गैंगस्टर एक्ट और रंगदारी जैसे मामलों का भी उल्लेख है।
🔍 Vision Live News का विश्लेषण
दादरी का यह मामला साफ तौर पर दो पहलुओं को उजागर करता है—पहला, स्थानीय स्तर पर पुलिस की प्रारंभिक निष्क्रियता; और दूसरा, न्यायपालिका का समय पर हस्तक्षेप।
यदि पीड़ित पक्ष के अधिवक्ताओं द्वारा कानूनी रूप से मजबूत पैरवी न की जाती, तो संभव है कि मामला इसी तरह दबा रह जाता। यह भी स्पष्ट होता है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर एफआईआर दर्ज करने में अभी भी लापरवाही देखने को मिलती है।
इस केस में अदालत का हस्तक्षेप न केवल पीड़ित को राहत दिलाने वाला साबित हुआ, बल्कि यह एक संदेश भी देता है कि कानून के दायरे में रहकर लड़ाई लड़ी जाए तो न्याय संभव है। अब असली परीक्षा पुलिस की निष्पक्ष और प्रभावी विवेचना की होगी, जिस पर पूरे क्षेत्र की नजर बनी हुई है।