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“सिर्फ 1 रुपये का सगुन, बिना दहेज की मिसाल: दादरी के भाटी परिवार ने पेश किया अनोखा उदाहरण”


      मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ ग्रेटर नोएडा
जहां एक ओर शादियों में लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करने और दिखावे की होड़ लगातार बढ़ती जा रही है, वहीं गौतम बुद्ध नगर के दादरी क्षेत्र के भाटी परिवार ने समाज को एक नई दिशा देने वाला सराहनीय कदम उठाया है। ग्राम कठेरा निवासी स्वर्गीय चौधरी फुलचन्द सिंह भाटी के सुपौत्रों—मोहित संग रुचि और रितिक संग वैशाली—का विवाह पूर्णतः सादगी और दहेज-मुक्त परंपरा के साथ सम्पन्न हुआ।
19 अप्रैल 2026 को सम्पन्न हुए इस विवाह समारोह की सबसे खास बात यह रही कि इसमें दहेज तो दूर, शगुन के रूप में भी मात्र एक-एक रुपये—लगुन, पीली चिट्ठी और विदाई—का प्रतीकात्मक रूप से आदान-प्रदान किया गया। यह “एक रुपया सगुन विवाह” न केवल खर्चों में संयम का उदाहरण बना, बल्कि सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एक मजबूत संदेश भी देता नजर आया।
बारात ग्राम कठेरा, दादरी से चलकर जिला सहारनपुर के ग्राम कासिमपुर निवादा पहुंची, जहां पूरे रीति-रिवाजों के साथ विवाह की रस्में निभाई गईं। बिना बैंड-बाजे के दिखावे, बिना महंगे इंतजामों के, इस शादी ने यह साबित कर दिया कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं का सम्मान सादगी में भी पूरी गरिमा के साथ किया जा सकता है।
इस पहल के पीछे परिवार का स्पष्ट उद्देश्य समाज में फैली दहेज प्रथा और अनावश्यक खर्च की प्रवृत्ति को समाप्त करना है। कार्यक्रम से जुड़े अधिवक्ता देवेंद्र चौधरी, जो सूरजपुर जिला कचहरी में प्रैक्टिस करते हैं, ने बताया कि यह विवाह उनके ही छोटे चाचा के पुत्रों का है और परिवार ने मिलकर यह निर्णय लिया कि शादी को एक सामाजिक संदेश के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
उन्होंने कहा, “आज के समय में शादियां दिखावे का माध्यम बनती जा रही हैं, जिसमें बेहिसाब पैसा खर्च होता है। यह न केवल आर्थिक बोझ बढ़ाता है, बल्कि समाज में असमानता और दबाव भी पैदा करता है। यदि सादगी से विवाह किया जाए, तो यह समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश बन सकता है। इसी सोच के तहत मात्र एक रुपये के शगुन के साथ यह विवाह सम्पन्न किया गया।”
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने भी इस पहल की सराहना की है। उनका मानना है कि इस तरह के प्रयास समाज में बदलाव की बुनियाद रखते हैं और आने वाली पीढ़ियों को एक बेहतर दिशा देते हैं।
यह विवाह सिर्फ दो परिवारों का मिलन नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है—जहां परंपरा है, संस्कार हैं, लेकिन फिजूलखर्ची और दहेज जैसी कुरीतियों के लिए कोई जगह नहीं।