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बाराही मेला-2026: लोक संस्कृति का उत्सव बना सामाजिक चेतना का मंच, जल संरक्षण और ‘बेटी सशक्तिकरण’ की गूंज से बदला मेले का स्वरूप


       मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ सूरजपुर  (ग्रेटर नोएडा)
प्राचीनकालीन और ऐतिहासिक महत्व वाला बाराही मेला-2026 इस वर्ष एक नए और व्यापक स्वरूप में सामने आ रहा है। यह आयोजन अब केवल धार्मिक आस्था और मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोक संस्कृति के संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों को केंद्र में रखकर एक जन-जागरण अभियान का रूप लेता दिख रहा है। चौथे दिन के कार्यक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया कि सूरजपुर का यह मेला अब क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी अपनी अलग पहचान स्थापित कर रहा है।
सुबह से ही मेले में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही, जबकि रात्रि होते-होते सांस्कृतिक मंचों पर उमड़ी भीड़ ने पूरे परिसर को जीवंत कर दिया। कार्यक्रमों की शुरुआत परंपरागत आरती एवं गणेश वंदना के साथ हुई, जिसने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। इसके बाद लोक कला मंच और संस्कृति मंच पर प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हुआ, जो देर रात तक अनवरत चलता रहा।
हरियाणा डांस ग्रुप (आरसीएफ इवेंट) ने अपने सधे हुए मंचन, रंग-बिरंगी वेशभूषा और ऊर्जा से भरपूर प्रस्तुतियों के माध्यम से दर्शकों को लोक संस्कृति की झलक दिखाई। हर प्रस्तुति के साथ तालियों की गूंज और दर्शकों की सहभागिता यह दर्शा रही थी कि लोक कला आज भी लोगों के दिलों में जीवित है।
इसके बाद मंच संभाला हरेंद्र नागर एंड पार्टी ने, जिन्होंने रागनी के माध्यम से न केवल मनोरंजन किया, बल्कि समाज को गहराई से जोड़ने का कार्य भी किया। राहुल अवाना (हरौला) की रागनी—
“गंगा जमुना यहां बहे, म्हारा प्यारा हिंदुस्तान…”
ने जहां राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति का संदेश दिया, वहीं बिशन सिंह इंदौर (राजस्थानी) की प्रस्तुति—
“ज्ञान बिना संसद में गाल बजाना ठीक नहीं…”
ने शिक्षा और विवेक के महत्व को तीखे लेकिन प्रभावशाली अंदाज में प्रस्तुत किया।
महाभारत के प्रसंगों पर आधारित प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को और अधिक प्रभावशाली बना दिया। कर्ण-अर्जुन संवाद—
“जो करण निकल गया हाथों से, सो पछताना हो जाएगा…”
ने जीवन में सही समय पर सही निर्णय लेने की सीख दी। वहीं भाईचारे पर आधारित रागनी—
भाई जैसी चीज जगत में मिलती न…”
ने सामाजिक एकता और रिश्तों की अहमियत को दर्शाया।
आशु चौधरी (रोहतक) का ऊर्जावान नृत्य युवाओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बना, जबकि रितु चौधरी कृष्ण खटाना की सवाल-जवाब शैली की रागनी ने पारंपरिक लोक विधा को जीवंत बनाए रखा।
मेले की एक और विशेष पहचान बनी हुई है जितेंद्र बंचारी नगाड़ा पार्टी, जो लगभग 26 वर्षों से लगातार इस आयोजन का हिस्सा है। नगाड़ों की गूंज ने पूरे वातावरण को जोश और भक्ति से भर दिया। वहीं सिकंदर नाथ भांगड़ा बीन पार्टी ने अपनी लोक शैली से मेले में विविधता का रंग भरा।
हालांकि, इस दिन की सबसे बड़ी विशेषता केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियां नहीं रहीं, बल्कि मंच से दिए गए वे संदेश रहे, जिन्होंने इस मेले को एक नई दिशा दी।
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित भारतीय महिला वॉलीबॉल टीम की पूर्व कप्तान निर्मल तंवर ने अपने विस्तृत उद्बोधन में समाज के सामने एक सकारात्मक सोच प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि आज की बेटियां हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं, लेकिन उन्हें आगे बढ़ाने के लिए परिवार और समाज दोनों का सहयोग आवश्यक है।
उन्होंने अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि एक खिलाड़ी का जीवन संघर्ष, अनुशासन और निरंतर अभ्यास से भरा होता है, और यही सिद्धांत जीवन के हर क्षेत्र में लागू होते हैं। उन्होंने विशेष रूप से ग्रामीण परिवेश की बेटियों को प्रेरित करते हुए कहा कि संसाधनों की कमी कभी भी सफलता में बाधा नहीं बनती, यदि संकल्प मजबूत हो और मेहनत सच्ची हो।
निर्मल तंवर ने युवाओं को यह भी संदेश दिया कि आज के दौर में दिखावे और चकाचौंध के बीच अपने लक्ष्य से भटकना आसान है, लेकिन जो युवा अपने उद्देश्य पर केंद्रित रहते हैं और माता-पिता के विश्वास को बनाए रखते हैं, वही जीवन में सफल होते हैं। उनके उद्बोधन ने उपस्थित युवाओं, अभिभावकों और महिलाओं के बीच एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार किया।
वहीं “पॉन्डमैन ऑफ इंडिया” रामवीर तंवर ने अपने विचारों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक ठोस पहल का संकेत दिया। उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में तालाब और जलाशय केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि समाज के जीवन का आधार हुआ करते थे। आज उनकी उपेक्षा ने जल संकट को गंभीर बना दिया है।
रामवीर तंवर ने एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए कहा कि यदि बाराही मंदिर प्रांगण में जलाशय निर्माण के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध कराया जाता है, तो वह स्वयं यहां एक आदर्श तालाब का निर्माण कराएंगे और इसके लिए लगभग 50 लाख रुपये तक का योगदान देने को तैयार हैं
उनकी इस घोषणा ने मेले में उपस्थित लोगों के बीच नई उम्मीद जगाई। यदि यह पहल साकार होती है, तो यह न केवल सूरजपुर क्षेत्र के लिए बल्कि पूरे प्रदेश के लिए एक मॉडल परियोजना बन सकती है।
मेले में लगातार बढ़ती भीड़ और जनसहभागिता यह दर्शाती है कि यह आयोजन लोगों के दिलों में गहराई से जुड़ा हुआ है। आयोजन समिति के पदाधिकारियों, स्थानीय नागरिकों और स्वयंसेवकों की सक्रिय भूमिका इस मेले को व्यवस्थित और सफल बनाने में महत्वपूर्ण साबित हो रही है।
आने वाले दिनों में भी मेले में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों, रागनी प्रस्तुतियों और धार्मिक आयोजनों की श्रृंखला जारी रहेगी, जिससे क्षेत्र में उत्सव का माहौल बना रहेगा।
विशेष विश्लेषण (विजन लाइव):
बाराही मेला-2026 इस बार केवल परंपरा का निर्वहन नहीं कर रहा, बल्कि यह एक विचार और बदलाव का मंच बनकर उभर रहा है। जहां एक ओर लोक कला और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर समाज के ज्वलंत मुद्दों—जैसे महिला सशक्तिकरण और जल संरक्षण—को केंद्र में लाया जा रहा है।
यदि ऐसे आयोजनों के माध्यम से सामाजिक संदेशों को इसी प्रकार जन-जन तक पहुंचाया जाता रहा, तो भविष्य में यह मेला केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का प्रेरक केंद्र बन सकता है। सूरजपुर का बाराही मेला इस दिशा में एक सशक्त उदाहरण के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है।