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सफीपुर में गूंजे पारंपरिक होली के रसिया, नगाड़ों की थाप पर जीवंत हुई 40 वर्ष पुरानी सांस्कृतिक परंपरा


   मौहम्मद इल्यास “दनकौरी” / गौतमबुद्धनगर
होली का पर्व जहां रंगों और उमंग का प्रतीक है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह लोक संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता को जीवित रखने का भी माध्यम बनता है। गौतमबुद्धनगर के ग्राम सफीपुर में भी इस परंपरा की अनूठी झलक देखने को मिली, जब यहां पारंपरिक होली उत्सव और रसिया गायन का भव्य आयोजन किया गया। नगाड़ों की गूंज, ढोल की थाप और होली के पारंपरिक गीतों ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया और गांव में देर रात तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रही।
यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि करीब चार दशक पुरानी परंपरा का जीवंत उदाहरण है। इस होली उत्सव मेले की शुरुआत वर्ष 1982 में स्वर्गीय चौधरी भजनलाल चेची द्वारा की गई थी। बताया जाता है कि उसी वर्ष गांव में मंदिर का निर्माण कराया गया था और मंदिर स्थापना के साथ ही समाज को एक मंच पर जोड़ने के उद्देश्य से इस होली उत्सव मेले की परंपरा की शुरुआत की गई थी। तब से लेकर आज तक यह आयोजन लगातार जारी है और ग्रामीणों का संकल्प है कि यह परंपरा आगे भी इसी तरह चलती रहेगी।
परंपरा को आगे बढ़ा रहे चौधरी मेहरचंद प्रधान
वर्तमान में इस आयोजन की जिम्मेदारी चौधरी मेहरचंद प्रधान संभाल रहे हैं, जो वर्षों से इस होली उत्सव का आयोजन कराते आ रहे हैं। उनके प्रयासों से यह आयोजन हर साल और अधिक भव्य रूप लेता जा रहा है। उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम उनके पिता स्वर्गीय चौधरी भजनलाल चेची की स्मृति और उनके द्वारा शुरू की गई सामाजिक परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास है।
उन्होंने कहा कि इस होली उत्सव का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं बल्कि समाज को एक मंच पर लाना, आपसी भाईचारा बढ़ाना और लोक संस्कृति को जीवित रखना है।
एक दर्जन से अधिक होली गायन मंडलियों ने दी प्रस्तुति
इस वर्ष आयोजित कार्यक्रम की विशेष बात यह रही कि इसमें करीब एक दर्जन होली गायन मंडलियों ने भाग लिया। ये मंडलियां अलग-अलग क्षेत्रों से दो तरह के पारंपरिक अंदाज में होली गायन प्रस्तुत करने पहुंची थीं। मंच से प्रस्तुत किए गए रसिया और पारंपरिक होली गीतों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम के अंत में सभी होली गायन मंडलियों को विशेष पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित भी किया गया, जिससे कलाकारों का उत्साह और भी बढ़ गया।
गुर्जर बिरादरी के सरदारों का हुआ सम्मान
इस होली उत्सव मेले की एक और खास परंपरा यह है कि इसमें हर वर्ष गौतमबुद्धनगर ही नहीं बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से गुर्जर बिरादरी के सरदार और समाज के गणमान्य लोग भाग लेने पहुंचते हैं। इस बार भी बड़ी संख्या में समाज के प्रमुख लोग कार्यक्रम में शामिल हुए।
आयोजन समिति की ओर से इन सभी अतिथियों का पगड़ी पहनाकर सम्मान किया गया। यह सम्मान समारोह कार्यक्रम का आकर्षण बना रहा और इससे समाज में आपसी सम्मान और भाईचारे की भावना को भी मजबूती मिली।
लोक संस्कृति को जीवित रखने का प्रयास
होली गायक चौधरी शौकत अली चेची ने कहा कि ब्रज और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होली के रसिया और लोकगीतों की परंपरा सदियों पुरानी है। ऐसे आयोजनों से न केवल लोगों का मनोरंजन होता है बल्कि लोक संगीत और सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखने में मदद मिलती है।
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने के लिए ऐसे आयोजनों का लगातार होना बेहद जरूरी है।
सामाजिक एकता और परंपरा का प्रतीक बना आयोजन
सफीपुर में आयोजित यह होली उत्सव केवल रंगों का पर्व नहीं बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और परंपरा के संरक्षण का प्रतीक बन गया है। गांव के बुजुर्गों, युवाओं और बच्चों ने एक साथ मिलकर इस आयोजन का आनंद लिया और आने वाले वर्षों में भी इस परंपरा को जारी रखने का संकल्प दोहराया।
ग्रामीणों का कहना है कि स्वर्गीय चौधरी भजनलाल चेची द्वारा शुरू की गई यह परंपरा अब गांव की पहचान बन चुकी है, जिसे आने वाली पीढ़ियां भी इसी उत्साह के साथ आगे बढ़ाती रहेंगी।