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स्पेशल न्यूज़ स्टोरी:-- “ग्रेटर नोएडा में PG/हॉस्टल पर कार्रवाई के बीच सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सहारा, प्राधिकरण से राहत की मांग तेज”

  मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ ग्रेटर नोएडा
शहर में पीजी (Paying Guest) और हॉस्टल संचालन को लेकर चल रहे विवाद के बीच अब मामला कानूनी और संवैधानिक बहस का रूप लेता जा रहा है। एक ओर जहां ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण द्वारा आवासीय परिसरों में संचालित पीजी/हॉस्टल को लेकर नोटिस जारी किए गए हैं, वहीं दूसरी ओर पीजी संचालकों और होम ओनर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का हवाला देते हुए इसे पूरी तरह आवासीय गतिविधि बताया है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मिला आधार
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी संपत्ति का उपयोग रहने (residential purpose) के लिए किया जा रहा है, तो उस पर जीएसटी लागू नहीं होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि हॉस्टल और पीजी जैसी व्यवस्थाएं, जहां छात्र और कामकाजी लोग रहते हैं, उन्हें आवासीय इकाई माना जाएगा, न कि व्यावसायिक होटल या गेस्ट हाउस।
यह फैसला PG संचालकों के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इससे यह सिद्ध होता है कि इस प्रकार की गतिविधियां मूल रूप से निवास की श्रेणी में आती हैं।
प्राधिकरण के नोटिस से बढ़ी चिंता
ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण द्वारा हाल ही में जारी एक कॉमन नोटिस ने सेक्टरों में रहने वाले प्रॉपर्टी मालिकों और पीजी संचालकों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। नोटिस में आवासीय परिसरों में संचालित पीजी/हॉस्टल गतिविधियों को लेकर कार्रवाई के संकेत दिए गए हैं।
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए Home Owners Association, Beta-1 के सदस्यों ने ACEO को एक विस्तृत पत्र लिखकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है।
हम केवल आवासीय किरायेदारी चला रहे हैं”
एसोसिएशन द्वारा भेजे गए पत्र में स्पष्ट किया गया है that संबंधित संपत्तियों का उपयोग सामान्य आवासीय किरायेदारी के तहत किया जा रहा है, जहां छात्र और कामकाजी लोग लंबे समय के लिए रहते हैं।
पत्र में यह भी कहा गया है कि:
कोई होटल, गेस्ट हाउस या कमर्शियल हॉस्पिटैलिटी गतिविधि संचालित नहीं हो रही
शॉर्ट-टर्म स्टे, कैटरिंग या रिसेप्शन जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं
संपत्ति का मूल स्वरूप पूरी तरह आवासीय है
2 लाख छात्रों की जरूरत से जुड़ा मुद्दा
ग्रेटर नोएडा आज एक प्रमुख एजुकेशन और एम्प्लॉयमेंट हब के रूप में विकसित हो चुका है। यहां स्थित विश्वविद्यालयों और संस्थानों के कारण हर साल लाखों छात्र और प्रोफेशनल्स यहां आते हैं।
एसोसिएशन के अनुसार:
वर्तमान में 2 लाख से अधिक छात्र विभिन्न सेक्टरों में रह रहे हैं
इनमें से अधिकांश छात्र रेंटल हाउसिंग और PG व्यवस्था पर निर्भर हैं
ऐसे में किसी भी प्रकार की सख्त या अचानक कार्रवाई न केवल प्रॉपर्टी मालिकों, बल्कि छात्रों की शिक्षा और रोजगार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
संवैधानिक अधिकारों का हवाला
पत्र में यह भी तर्क दिया गया है कि आवासीय किरायेदारी एक वैध आर्थिक गतिविधि है, जो संविधान के तहत:
अनुच्छेद 21 (जीवन और आजीविका का अधिकार)
अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यवसाय करने की स्वतंत्रता)
के अंतर्गत संरक्षित है।
साथ ही यह भी कहा गया कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई को अनुच्छेद 14 के तहत न्यायसंगत, तार्किक और गैर-मनमाना होना चाहिए।
हाईकोर्ट में लंबित मामला और ‘स्टेटस क्वो’
इस मुद्दे का एक अहम पहलू यह भी है कि इसी प्रकार का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में पहले से लंबित है—
Paying Guest House Owners Welfare Association vs NOIDA Authority (2019)
इस केस में कोर्ट ने “स्टेटस क्वो बनाए रखने” का आदेश दिया हुआ है।
चूंकि नोएडा और ग्रेटर नोएडा “सिस्टर अथॉरिटी” हैं, इसलिए एसोसिएशन का तर्क है कि यहां भी समान दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

न्यायालयों के अन्य महत्वपूर्ण फैसले
सुप्रीम कोर्ट (2025): State of Karnataka vs Taghar Vasudeva Ambrish में स्पष्ट किया गया कि हॉस्टल/PG का उपयोग रहने के लिए होता है, इसलिए इसे आवासीय ही माना जाएगा।
मद्रास हाईकोर्ट (2025): M. Divya केस में कहा गया कि हॉस्टल को कमर्शियल घोषित करना गरीब और मध्यम वर्ग के साथ भेदभाव होगा।
PG संचालकों की मांग: संतुलित नीति बने
ग्रेटर नोएडा के PG संचालकों, जिनमें प्रमुख रूप से निखिल गुप्ता शामिल हैं, ने ACEO को पत्र लिखकर अपनी समस्याएं रखी हैं। उन्होंने मांग की है कि:
जब तक मामला न्यायालय में लंबित है, तब तक कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए
आवासीय किरायेदारी को कमर्शियल गतिविधि न माना जाए
यदि कोई नियम बनाए जाएं, तो वे व्यावहारिक और संतुलित हों
वहीं, Paying Guest House Owners Welfare Association के अध्यक्ष विशेष त्यागी ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए कहा—
"सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के स्पष्ट फैसलों के बावजूद यदि PG और हॉस्टल को जबरन कमर्शियल गतिविधि मानकर कार्रवाई की जाती है, तो यह न केवल कानून की भावना के खिलाफ होगा बल्कि लाखों छात्रों और मध्यम वर्गीय परिवारों के हितों पर भी सीधा प्रहार होगा। हम प्राधिकरण से आग्रह करते हैं कि न्यायालय के आदेशों का सम्मान करते हुए किसी भी प्रकार की कठोर कार्रवाई से पहले संवाद का रास्ता अपनाया जाए।"
विजन लाइव का विश्लेषण
विजन लाइव के विश्लेषण के अनुसार, ग्रेटर नोएडा में PG/हॉस्टल का मुद्दा केवल नियमों के उल्लंघन या पालन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शहरी विकास, शिक्षा व्यवस्था और आवासीय जरूरतों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
एक तरफ प्राधिकरण की चिंता अनियंत्रित कमर्शियल गतिविधियों को रोकने की है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि शहर की बड़ी आबादी—खासकर छात्र और युवा प्रोफेशनल—इन्हीं PG और रेंटल व्यवस्थाओं पर निर्भर हैं।
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के फैसले यह संकेत देते हैं कि आने वाले समय में “यूज-बेस्ड क्लासिफिकेशन” (यानी उपयोग के आधार पर संपत्ति की श्रेणी तय करना) अधिक महत्वपूर्ण होगा, न कि केवल कागजी श्रेणीकरण।
ऐसे में जरूरत इस बात की है कि:
प्राधिकरण, संचालकों और निवासियों के बीच संवाद बढ़े
एक स्पष्ट, पारदर्शी और व्यवहारिक नीति बनाई जाए
और शहर की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए संतुलित समाधान निकाला जाए
क्योंकि यह मुद्दा सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि लाखों लोगों के रहने, पढ़ने और भविष्य से जुड़ा हुआ है।