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लोहड़ी पर्व : आस्था, परंपरा और कृषि संस्कृति का उत्सव


लोहड़ी पर्व को लेकर विद्वानों, पुराणों और लोक मान्यताओं में इसके विभिन्न उद्देश्यों का उल्लेख मिलता है। यह पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, नारी सम्मान, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है।
ज्योतिषीय व पंचांग अनुसार लोहड़ी 2026
ज्योतिषीय गणना के अनुसार वर्ष 2026 में लोहड़ी पर्व 13 जनवरी, मंगलवार को मनाया जाएगा।
इस दिन दोपहर 3:13 बजे भद्रा तिथि रहेगी।
मकर संक्रांति स्नान का शुभ समय प्रातः 9:03 से 10:48 बजे तक रहेगा।
14 जनवरी 2026, बुधवार को सूर्य देव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे, इसी दिन मकर संक्रांति मनाई जाएगी।
परंपरानुसार लोहड़ी पर्व हर वर्ष मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व मनाया जाता है।
लोहड़ी मनाने के प्रमुख कारण
13 जनवरी को मनाई जाने वाली लोहड़ी के पीछे कई विशेष कारण हैं—
नई फसल की पूजा
अग्नि देव की आराधना
लोहड़ी माता का पूजन
कृषि वर्ष की शुरुआत
यह पर्व मुख्य रूप से सिख समुदाय द्वारा पूरे उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है, हालांकि आज यह पर्व संपूर्ण उत्तर भारत में लोकप्रिय हो चुका है।
लोहड़ी शब्द का अर्थ
लोक मान्यताओं के अनुसार
लोहड़ी = ल (लकड़ी) + ओह (सूखे उपले) + डी (रेवड़ी)
इस पर्व से लगभग 20–25 दिन पहले लोग लोकगीत गाते हुए लकड़ी और उपले एकत्र करते हैं। पर्व की संध्या पर मोहल्लों या चौराहों पर अग्नि प्रज्वलित कर सामूहिक पूजा की जाती है।
चरखा चढ़ाने की परंपरा
सिख समाज में मन्नत पूरी होने पर गोबर के उपलों की माला बनाकर अग्नि में अर्पित की जाती है, जिसे “चरखा चढ़ाना” कहा जाता है। यह परंपरा आस्था और कृतज्ञता का प्रतीक है।
कृषि और किसान से जुड़ा पर्व
लोहड़ी को किसान नई फसल और आर्थिक नववर्ष के रूप में मनाते हैं।
इस दिन—
नई फसल की पूजा
गन्ने से बने गुड़ का उपयोग
मक्का, खील, मूंगफली, तिल और रेवड़ी का भोग
किया जाता है।
पौराणिक मान्यताएं
पुराणों के अनुसार लोहड़ी को सती के त्याग और बलिदान की स्मृति में मनाया जाता है।
कथा के अनुसार, जब प्रजापति दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया, तब सती ने स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया।
इसी कारण इस दिन—
विवाहित बेटियों को घर बुलाया जाता है
उपहार दिए जाते हैं
महिलाओं को श्रृंगार सामग्री भेंट की जाती है
दुल्ला भट्टी की ऐतिहासिक कथा
लोहड़ी से जुड़ी एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक कथा दुल्ला भट्टी की है, जो अकबर काल में पंजाब के नायक माने जाते थे।
उन्होंने लड़कियों की खरीद-फरोख्त का विरोध किया और उन्हें सम्मानपूर्वक विवाह कर सुरक्षित जीवन दिलाया।
आज भी लोहड़ी के गीतों में दुल्ला भट्टी को वीर नायक के रूप में याद किया जाता है।
सांस्कृतिक उल्लास
लोहड़ी की संध्या पर—
ढोल की थाप
भांगड़ा और गिद्दा
लोकगीत और नृत्य
पंजाबी संस्कृति की पहचान बन जाते हैं।
युवा और बच्चे 15 दिन पहले से घर-घर जाकर लोहड़ी के गीत गाते हैं।
अन्य मान्यताएं
कुछ लोग इसे होलिका की बहन लोहड़ी से जोड़ते हैं
कहीं इसे संत कबीर की पत्नी लोही के नाम से जोड़कर देखा जाता है
कई क्षेत्रों में इसे तिलोड़ी (तिल + गुड़) भी कहा जाता है
वसंत ऋतु का स्वागत
लोहड़ी को वसंत ऋतु के आगमन के प्रतीक रूप में भी मनाया जाता है। रबी की फसलों का अन्न अग्नि को समर्पित कर देवताओं से समृद्धि, खुशहाली और धन-धान्य की कामना की जाती है।
लेखक परिचय
चौधरी शौकत अली चेची
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष – किसान एकता (संघ)
पिछड़ा वर्ग उ०प्र० सचिव – समाजवादी पार्टी
⚖️ कानूनी डिस्क्लेमर
यह लेख धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं लोक मान्यताओं पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी एवं वैचारिक हैं। प्रकाशित मंच/पोर्टल/समाचार संस्था लेखक के विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं है। लेख का उद्देश्य किसी धर्म, वर्ग या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। किसी भी प्रकार की आपत्ति या विवाद की स्थिति में लेखक स्वयं उत्तरदायी होगा।