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सोनू कश्यप हत्याकांड: पीड़ित से मिलने पर पहरा, मंत्री नजरबंद — सड़क से सदन तक उबाल

 मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ मेरठ/ गाजियाबाद
मेरठ में सोनू कश्यप की जिंदा जलाकर की गई नृशंस हत्या अब सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं रह गई है, बल्कि यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सत्ता, प्रशासन और सामाजिक न्याय के टकराव का बड़ा मुद्दा बनती जा रही है।
पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद को पुलिस-प्रशासन ने गाजियाबाद के यूपी गेट पर रोकते हुए हाउस रेस्ट कर लिया। इसके बाद उन्हें गाजियाबाद स्थित गेस्ट हाउस में करीब तीन घंटे तक नजरबंद रखा गया। इस कार्रवाई से निषाद पार्टी और समर्थक संगठनों में भारी रोष फैल गया।
गुर्जर वीरेंद्र डाढा का तीखा बयान
निषाद पार्टी के पश्चिमी उत्तर प्रदेश प्रभारी गुर्जर वीरेंद्र डाढा ने प्रशासन की कार्रवाई को सीधे-सीधे अन्याय करार देते हुए कहा—
“यह लोकतंत्र नहीं, तानाशाही का उदाहरण है। एक कैबिनेट मंत्री को पीड़ित परिवार से मिलने से रोका जा रहा है, जबकि हत्यारे खुलेआम घूम रहे हैं। यह साफ दिखाता है कि प्रशासन अपराधियों को संरक्षण दे रहा है और पीड़ित समाज की आवाज को दबाया जा रहा है।”
उन्होंने आगे चेतावनी भरे लहजे में कहा—
“यदि सोनू कश्यप के हत्यारों को जल्द गिरफ्तार कर कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो निषाद पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर लखनऊ तक बड़ा आंदोलन करेगी। सड़क से सदन तक सरकार को जवाब देना पड़ेगा।”
धरना और चक्का जाम से बढ़ा दबाव
डॉ. संजय निषाद को रोके जाने की खबर मिलते ही गाजियाबाद में पार्टी पदाधिकारी गेस्ट हाउस के बाहर धरने पर बैठ गए। वहीं, मेरठ और मुजफ्फरनगर में निषाद पार्टी कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर चक्का जाम कर दिया, जिससे यातायात व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित रही।
प्रशासन पर उठे गंभीर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—
क्या पीड़ित परिवार से मिलने पर भी अब प्रशासनिक अनुमति जरूरी है?
क्या सामाजिक न्याय की बात करने वालों को नजरबंद किया जाएगा?
और क्या कानून-व्यवस्था की सख्ती सिर्फ जनप्रतिनिधियों और पीड़ित पक्ष तक सीमित है?
पीड़ित परिवार अब भी न्याय के इंतजार में
उधर, सोनू कश्यप के परिजन अभी भी न्याय और सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं। परिवार का कहना है कि उन्हें धमकियां मिल रही हैं, लेकिन प्रशासन की प्राथमिकता पीड़ित की बजाय विरोध को दबाने में नजर आ रही है।
साफ है कि सोनू कश्यप हत्याकांड अब कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और प्रशासनिक निष्पक्षता की अग्निपरीक्षा बन चुका है।