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मनरेगा पर हमला या गांव की सुनियोजित खालीकरण नीति ?


मकोड़ा की चौपाल से उठा सवाल, सत्ता के इरादों पर सीधा वार
मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ गौतमबुद्धनगर
दादरी विधानसभा का ऐतिहासिक मकोड़ा गांव आज सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि गांव की पीड़ा, मजदूर की बेबसी और लोकतंत्र की आखिरी चौकी बनकर सामने आया। मनरेगा बचाओ संग्राम के तहत आयोजित पंचायत स्तरीय ग्राम चौपाल में जो कुछ कहा गया, वह एक राजनीतिक भाषण से कहीं आगे था—यह गांव के अस्तित्व की चेतावनी थी।
ग्राम चौपाल का दृश्य खुद कहानी कह रहा था। खुले आसमान के नीचे बैठे मजदूर, किसान, बुजुर्ग और युवा—हर चेहरे पर एक ही सवाल था: क्या गांव में रहकर भी अब पेट भरना गुनाह हो गया है?
मनरेगा: योजना से ज्यादा जीवनरेखा
कांग्रेस नेताओं ने चौपाल में साफ किया कि मनरेगा कोई सरकारी स्कीम नहीं, बल्कि वह डोर है जो गांव के गरीब को उसके घर, खेत और मिट्टी से जोड़ती है।
जब मजदूरी समय पर नहीं मिलती, जब काम महीनों बंद रहता है और जब बजट घटाकर रोजगार छीना जाता है—तो गांव खुद-ब-खुद शहर की ओर धकेला जाता है।
यही वजह है कि चौपाल में सबसे ज्यादा गुस्सा भुगतान में देरी और काम की कमी को लेकर दिखाई दिया। ग्रामीणों ने बताया कि कई लोगों की मजदूरी महीनों से अटकी हुई है, लेकिन शिकायत करने पर सिर्फ आश्वासन मिलते हैं।
पलायन की मजबूरी: गांव का दर्द
ग्राम चौपाल में मौजूद कई युवाओं ने बताया कि मनरेगा के कमजोर होने के बाद उन्हें ईंट-भट्टों, फैक्ट्रियों और महानगरों की दिहाड़ी पर जाना पड़ रहा है।
नेताओं ने इसे “नीति-निर्मित पलायन” करार दिया—जहां गांव को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है ताकि सस्ता श्रम शहरों को मिल सके।
जिला कांग्रेस अध्यक्ष दीपक भाटी चोटीवाला ने कहा,
“मनरेगा को कमजोर करना केवल मजदूर को बेरोजगार करना नहीं, बल्कि गांव की आत्मा को तोड़ना है। यह सीधी-सीधी गरीब विरोधी नीति है।”
पंचायत से संसद तक संघर्ष का संकल्प
चौपाल के संयोजक कपिल भाटी एडवोकेट ने बताया कि मनरेगा बचाओ संग्राम का उद्देश्य सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि अधिकारों की पुनर्स्थापना है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी हर पंचायत में जाकर मजदूरों को बताएगी कि—
100 दिन का रोजगार उनका कानूनी अधिकार है
मजदूरी समय पर मिलना सरकार की जिम्मेदारी है
काम मांगने पर काम न देना अपराध है
चौपाल के अंत में यह संकल्प लिया गया कि यदि मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन को गांव-गांव से जिला मुख्यालय और फिर लखनऊ-दिल्ली तक ले जाया जाएगा।
मकोड़ा बना आंदोलन का केंद्र
मकोड़ा की चौपाल सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आने वाले बड़े जन-आंदोलन की पटकथा थी।
यहां से यह संदेश साफ निकला कि मनरेगा बचाओ संग्राम अब कागजों में नहीं, मिट्टी से उठकर सड़क तक जाएगा।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से उपस्थित रहे
इस ऐतिहासिक ग्राम चौपाल में बड़ी संख्या में ग्रामीण, कांग्रेस कार्यकर्ता और पंचायत प्रतिनिधि उपस्थित रहे, जिनमें प्रमुख रूप से—
अजय चौधरी, मास्टर जागीर सिंह, कपिल भाटी, प्रेम राज सिंह, चौधरी चरण सिंह, सुखबीर सिंह, दुष्यंत नागर, कृष्ण भाटी, मुकेश शर्मा, मनोज बंसल, नीरज लोहिया, रविंद्र भाटी, एडवोकेट हेमंत भाटी, आर.के. प्रथम, राजकुमार प्रधान, पुनीत मावी, सत्येंद्र भाटी, देवेश चौधरी, नरेंद्र भाटी, मोहम्मद तनवीर, मनोज भाटी, सचिन जीनवाल, देवेंद्र भाटी, सचिन शर्मा, महावीर सिंह, जितेंद्र चौधरी, राजकुमार भाटी, जय प्रसाद, आदेश भाटी, अरविंद भाटी, अरुण भाटी, आलोक भाटी, अजन सिंह, कुलदीप भाटी, ईश्वर भाटी, हरेंद्र भाटी, भूपेंद्र भाटी सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।