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मनरेगा पर चोट, गांवों पर असर


गौतमबुद्ध नगर में ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ क्यों बना ग्रामीण संघर्ष का प्रतीक
📍 मौहम्मद इल्यास- “दनकौरी /  ग्रेटर नोएडा वेस्ट, बिसरख
ग्रेटर नोएडा वेस्ट के बिसरख स्थित जिला कांग्रेस कार्यालय में हुई प्रेस वार्ता सामान्य राजनीतिक गतिविधि से कहीं आगे जाती दिखी। यह उस ग्रामीण बेचैनी का सार्वजनिक रूप थी, जो मनरेगा के कमजोर होते क्रियान्वयन से लगातार बढ़ती जा रही है। जिला कांग्रेस द्वारा शुरू किया गया “मनरेगा बचाओ संग्राम” अब केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि ग्रामीण रोजगार, सम्मान और संवैधानिक अधिकार की लड़ाई के रूप में सामने आ रहा है।
मनरेगा: योजना नहीं, कानून
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 देश का पहला ऐसा कानून है, जो ग्रामीण नागरिकों को साल में कम से कम 100 दिन का रोजगार देने की गारंटी देता है। यह योजना नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार है। इसके तहत काम न मिलने पर बेरोजगारी भत्ता देना भी सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन जमीनी सच्चाई इससे उलट है।
बजट कटौती से बढ़ी मुश्किलें
कांग्रेस का आरोप है कि बीते वर्षों में मनरेगा के बजट में वास्तविक जरूरतों की तुलना में लगातार कटौती की गई है। परिणामस्वरूप:
पंचायतों के पास काम शुरू कराने के लिए पर्याप्त धन नहीं
पुराने भुगतान लंबित
नए कामों की स्वीकृति में देरी
इसका सीधा असर उन मजदूर परिवारों पर पड़ा है, जिनकी आजीविका मनरेगा पर निर्भर है।
मजदूरी भुगतान: सबसे बड़ा संकट
ग्रामीण इलाकों में मजदूरी का समय पर भुगतान सबसे गंभीर मुद्दा बन चुका है। कई मामलों में मजदूरों को महीनों तक मेहनताना नहीं मिलता। डिजिटल भुगतान प्रणाली और आधार-आधारित सत्यापन ने तकनीकी बाधाएं तो बढ़ाईं, लेकिन समाधान नहीं दिया। नतीजा—मजदूर कर्ज में डूबते जा रहे हैं।
जॉब कार्ड निरस्तीकरण और डिजिटल छंटनी
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि बड़ी संख्या में जॉब कार्ड निरस्त किए जा रहे हैं। कहीं आधार लिंक नहीं, तो कहीं तकनीकी त्रुटियों के नाम पर मजदूरों को काम से बाहर कर दिया गया। यह प्रक्रिया डिजिटल सुधार से ज्यादा डिजिटल बहिष्कार जैसी लगती है।
काम की मांग पर काम’—कागजों तक सीमित
मनरेगा की आत्मा रही है—काम मांगने पर 15 दिनों के भीतर रोजगार। लेकिन हकीकत में काम की मांग दर्ज होने के बावजूद रोजगार नहीं मिल रहा। बेरोजगारी भत्ते की बात तो लगभग गायब हो चुकी है।
कलेक्ट्रेट पर अनशन: प्रशासन के नाम सीधा संदेश
कल जिला कलेक्ट्रेट पर होने वाला एकदिवसीय शांतिपूर्ण अनशन सरकार और प्रशासन के लिए सीधा संदेश है कि यदि मनरेगा को कमजोर करने की नीति जारी रही, तो ग्रामीण असंतोष खुलकर सामने आएगा। कांग्रेस इसे जनआंदोलन का रूप देने की तैयारी में है।
ग्राम पंचायतों में जागरूकता: रणनीति या मजबूरी?
12 से 29 जनवरी तक ग्राम पंचायतों में बैठकें आयोजित कर ग्रामीणों को उनके अधिकार बताए जाएंगे। यह कार्यक्रम बताता है कि मनरेगा को लेकर जानकारी का अभाव भी एक बड़ा कारण है, जिससे अधिकार छिनते जा रहे हैं।
राजनीतिक आरोप बनाम सामाजिक सच्चाई
भाजपा सरकार पर कांग्रेस के आरोप राजनीतिक हो सकते हैं, लेकिन जिन मुद्दों को उठाया जा रहा है, वे ग्रामीण समाज की रोजमर्रा की सच्चाई से जुड़े हैं। सवाल यह नहीं कि आंदोलन कौन कर रहा है, सवाल यह है कि क्या मनरेगा अपनी मूल भावना में जिंदा रह पाएगा?
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
मनरेगा केवल रोजगार नहीं देता, बल्कि गांवों में नकदी प्रवाह बनाए रखता है। जब मजदूरी रुकती है, तो गांव का बाजार भी ठप पड़ जाता है। छोटे दुकानदार, किसान और सेवा क्षेत्र सभी प्रभावित होते हैं।
अब आगे क्या?
अब सबकी नजरें प्रशासन और सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। अगर मनरेगा को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो “मनरेगा बचाओ संग्राम” एक जिले तक सीमित नहीं रहेगा।