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कोर्ट के आदेश से खुली नोएडा जमीन घोटाले की परतें


रिटायर्ड प्राधिकरण कर्मियों पर धोखाधड़ी का आरोप, FIR दर्ज करने के निर्देश
    मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ ग्रेटर नोएडा
नोएडा क्षेत्र में जमीन से जुड़े एक गंभीर प्रकरण में न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद बड़ा खुलासा सामने आया है। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-प्रथम, गौतमबुद्धनगर की अदालत ने जमीन खरीद-बिक्री में कथित धोखाधड़ी, जालसाजी और साजिश के मामले में थाना सेक्टर-24 को एफआईआर दर्ज कर विवेचना करने के निर्देश दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
65 वर्षीय गंगाराम ने न्यायालय में प्रार्थना पत्र देकर आरोप लगाया कि नोएडा विकास प्राधिकरण में कार्यरत रहे रामप्रकाश और धर्मपाल सिंह (अब सेवानिवृत्त) ने अपने पद और भरोसे का दुरुपयोग करते हुए उन्हें करोड़ों की संपत्ति के नाम पर ठग लिया।
प्रार्थी के अनुसार, ग्राम गेझा तिलपताबाद स्थित 254 वर्गमीटर भूमि के संबंध में वर्ष 2011 में एग्रीमेंट टू सेल और वसीयतनामा उसके पक्ष में पंजीकृत कराए गए। इसके एवज में किसानों को 40 लाख रुपये (10 लाख चेक + 30 लाख नकद) दिए गए।
बिना सहमति बना दी गई पावर ऑफ अटॉर्नी
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि उसी दिन कथित तौर पर प्रार्थी की जानकारी और सहमति के बिना धर्मपाल सिंह ने अपनी पत्नी के नाम जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी भी पंजीकृत करवा ली।
नोएडा प्राधिकरण के अंदरूनी सिस्टम पर सवाल
वर्ष 2017 में जब उसी खाता संख्या से दो आवासीय भूखंड (GT-117 और GT-122) आवंटित हुए, तो आरोप है कि दोनों रिटायर्ड अधिकारियों ने अपने प्रभाव का उपयोग कर विकास शुल्क जमा करा दिया, जबकि वास्तविक लाभार्थी को आज तक प्लॉट नहीं मिला।
दोबारा मांगे गए 10 लाख रुपये
रजिस्ट्री और ट्रांसफर के नाम पर प्रार्थी से 10 लाख रुपये अतिरिक्त भी लिए गए, लेकिन एक साल तक घुमाने के बाद भी कोई समाधान नहीं हुआ।
सबसे बड़ा खुलासा: जमीन पहले ही बिक चुकी थी
प्रार्थी को बाद में जानकारी मिली कि जिस जमीन के आधार पर सौदे किए गए, वह तो मूल काश्तकार द्वारा वर्ष 2006 में ही विक्रय की जा चुकी थी। इसके बावजूद कथित रूप से दोबारा एग्रीमेंट कर जमीन बेची गई।
पुलिस की चुप्पी, कोर्ट का हस्तक्षेप
पीड़ित ने 20 सितंबर 2025 को पुलिस आयुक्त सहित उच्च अधिकारियों को शिकायत भेजी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद न्यायालय की शरण ली गई।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने माना कि प्रकरण में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनता है और सत्य विवेचना के बाद ही सामने आ सकती है। हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए न्यायालय ने FIR दर्ज करने को न्यायोचित ठहराया।
क्या बोले पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता
पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता धर्मपाल सिंह ने बताया कि
“यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की ठगी का नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर बैठे लोगों द्वारा भरोसे के दुरुपयोग का उदाहरण है। न्यायालय के आदेश से अब सच्चाई सामने आएगी।”
क्यों है यह मामला खास? (Special Angle)
🔹 नोएडा प्राधिकरण से जुड़े रिटायर्ड अधिकारियों पर सीधे आरोप
🔹 जमीन पहले बिकने के बावजूद दोबारा सौदे
🔹 सरकारी सिस्टम के अंदर से कथित सहयोग
🔹 पुलिस की निष्क्रियता के बाद कोर्ट का हस्तक्षेप
🔹 आम नागरिक बनाम प्रभावशाली तंत्र