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26 जनवरी : भारत के गणतंत्र बनने की ऐतिहासिक यात्रा और उसका मूल उद्देश्य

🇮🇳 चौधरी  शौकत अली चेची
भारत के तीन राष्ट्रीय पर्वों में गणतंत्र दिवस का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। 26 जनवरी केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारत के स्वाभिमान, संघर्ष, बलिदान और लोकतांत्रिक चेतना का प्रतीक है। यह वह दिन है जब भारत ने स्वयं को एक संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में विश्व के समक्ष स्थापित किया।
🔹 पूर्ण स्वराज की ऐतिहासिक घोषणा
जब भारत अंग्रेज़ों की गुलामी में जकड़ा हुआ था, तब हमारे पूर्वजों ने असंख्य यातनाएँ सहकर आज़ादी की मशाल जलाए रखी।
31 दिसंबर 1929 की मध्यरात्रि को लाहौर में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में, पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में यह ऐतिहासिक घोषणा हुई कि यदि अंग्रेज़ सरकार 26 जनवरी 1930 तक भारत को डोमिनियन स्टेटस नहीं देती, तो भारत स्वयं को पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर देगा।
26 जनवरी 1930 को कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की घोषणा की और रावी नदी के तट पर पहली बार सर्वसम्मति से तिरंगा फहराया गया। तभी यह तय हुआ कि हर वर्ष 26 जनवरी को पूर्ण स्वराज दिवस मनाया जाएगा। 1947 में स्वतंत्रता मिलने तक यह दिन अघोषित रूप से स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा।
🔹 संविधान लागू होने का स्वर्णिम दिन
26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और देश ने संसदीय लोकतंत्र के साथ गणराज्य का रूप धारण किया।
यह संविधान 2 वर्ष 11 माह 18 दिन की अथक मेहनत से 389 विद्वानों द्वारा तैयार किया गया।
कुल 114 दिन बैठकें हुईं, जिनमें प्रेस और जनता को भी भाग लेने की स्वतंत्रता थी।
संविधान निर्माण में लगभग 63,96,729 रुपये खर्च हुए।
डॉ. भीमराव अंबेडकर को संविधान निर्माण का मुख्य शिल्पकार माना जाता है, इसलिए उन्हें भारतीय संविधान का जनक कहा जाता है।
🔹 तिरंगे का संदेश और उसका दर्शन
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का हर रंग अपना संदेश देता है—
केसरिया: साहस, बलिदान और शक्ति
सफेद (धर्मचक्र सहित): शांति, सत्य और न्याय
हरा: समृद्धि, उर्वरता और जीवन
धर्मचक्र में 24 तीलियाँ जीवन की निरंतर गति का प्रतीक हैं—रुकना मृत्यु समान है।
🔹 तिरंगे की रचना में महिला का योगदान
आम तौर पर यह माना जाता है कि तिरंगे का डिज़ाइन पिंगली वेंकैया ने किया था, परंतु अंतिम रूप में ध्वज तैयार करने का श्रेय सुरैया तैयबजी को जाता है।
अंग्रेज़ इतिहासकार ट्रेवर रोयेल ने अपनी पुस्तक The Last Days of the Raj में इसका उल्लेख किया है।
सुरैया तैयबजी एक कलाकार, स्वतंत्रता सेनानी और संविधान सभा की सक्रिय सदस्य थीं।
🔹 स्वतंत्रता संग्राम में सभी वर्गों का योगदान
भारत की आज़ादी किसी एक जाति, धर्म या समुदाय की देन नहीं है।
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, यहूदी—सभी ने बलिदान दिए।
नारी शक्ति ने भी संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभाई।
"इंकलाब ज़िंदाबाद" जैसे नारे मौलाना हसरत मोहानी ने दिए।
"सारे जहाँ से अच्छा", "सरफ़रोशी की तमन्ना", "जय हिंद", "अंग्रेज़ों भारत छोड़ो" जैसे नारे मुस्लिम विद्वानों और क्रांतिकारियों की देन हैं।
अशफाक़ उल्ला ख़ाँ, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे वीर इसी चेतना से प्रेरित थे।
🔹 26 जनवरी : परंपरा, संघर्ष और समकालीन संदर्भ
1950 में 21 तोपों की सलामी के साथ डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया।
इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो पहले मुख्य अतिथि थे।
1952 में किसान ट्रैक्टर परेड और 2020–21 का किसान आंदोलन—दोनों 26 जनवरी को इतिहास में दर्ज हुए।
2023 में अमर जवान ज्योति को स्थानांतरित किए जाने जैसे निर्णयों पर देश में गंभीर चर्चाएँ हुईं, जो यह दर्शाती हैं कि गणतंत्र केवल उत्सव नहीं, बल्कि निरंतर सवाल पूछने की जिम्मेदारी भी है।
🔹 भारत : विविधताओं की सुगंध
भारत एक ऐसी फुलवारी है, जिसमें हर फूल की खुशबू अलग है, पर सुंदरता एक है।
हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि इस एकता, लोकतंत्र और न्याय की रोशनी को बुझने न दें।
जय जवान, जय किसान
हमारे शहीद अमर थे, अमर हैं और अमर रहेंगे।
भारत की एकता और अखंडता ज़िंदाबाद।
✍️ लेखक परिचय
चौधरी  शौकत अली चेची
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष – किसान एकता (संघ)
पिछड़ा वर्ग सचिव – समाजवादी पार्टी, उत्तर प्रदेश
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, किसान आंदोलन से जुड़े हुए नेता एवं समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन करने वाले चिंतक।
कृषि, सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और संविधानिक मूल्यों के पक्षधर।
⚖️ कानूनी डिस्क्लेमर
यह लेख लेखक के व्यक्तिगत अध्ययन, ऐतिहासिक संदर्भों और वैचारिक दृष्टिकोण पर आधारित है।
इसमें व्यक्त विचार किसी संस्था, संगठन या राजनीतिक दल के आधिकारिक मत का प्रतिनिधित्व नहीं करते।
लेख का उद्देश्य ऐतिहासिक जागरूकता, लोकतांत्रिक विमर्श और सामाजिक चेतना को प्रोत्साहित करना है, न कि किसी व्यक्ति या समूह की भावनाओं को आहत करना।