BRAKING NEWS

6/recent/ticker-posts


 

दहेज एक अभिशाप — समाज की जड़ों को खोखला करती कुरीति


✍️ लेखक: चैनपाल प्रधान
(पूर्व जिला अध्यक्ष — हिंदू युवा वाहिनी, गौतमबुद्ध नगर / सामाजिक चिंतक एवं विचारक)

दहेज प्रथा भारतीय समाज की उन सबसे खतरनाक सामाजिक बुराइयों में से एक है, जिसने परिवार, रिश्ते और मानवता — तीनों को गहराई से प्रभावित किया है। यह कुरीति न केवल बेटियों के जीवन पर बोझ बन गई है, बल्कि एक सभ्य समाज की पहचान पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

आज के युग में जब विज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में महिलाएँ हर मोर्चे पर आगे बढ़ रही हैं, तब भी दहेज जैसी प्रथा हमारे सामाजिक सोच को कमजोर और असंवेदनशील बनाती है।
दहेज लेना और देना दोनों ही समान रूप से अपराध और अभिशाप हैं।

हर माता-पिता की यही कामना होती है कि उनकी बेटी को एक स्नेहमयी, सम्मानपूर्ण और खुशहाल ससुराल मिले। परंतु दुर्भाग्य से आज भी कई घरों में विवाह “लेन-देन” का माध्यम बन गया है। शादी से पहले और बाद में दहेज की माँग न पूरी होने पर बेटियों को प्रताड़ना, हिंसा और कभी-कभी मौत तक का सामना करना पड़ता है। ऐसी घटनाएँ समाज के माथे पर कलंक हैं।

लेखक चैनपाल प्रधान, जो हिंदू युवा वाहिनी गौतमबुद्ध नगर के पूर्व जिला अध्यक्ष होने के साथ-साथ सामाजिक चिंतक और विचारक भी हैं, का कहना है —
“जब किसी समाज में दहेज के कारण बेटियाँ अपनी जान दे रही हों या प्रताड़ित हो रही हों, तो यह केवल एक परिवार का नहीं बल्कि पूरे समाज का अपराध है।”
वे आगे कहते हैं कि ऐसी घटनाओं में केवल दहेज लेने वालों पर ही नहीं, बल्कि देने वालों पर भी कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए, ताकि दोनों ओर से इस कुरीति का अंत किया जा सके।

समाज के बुद्धिजीवी, शिक्षित वर्ग और सामाजिक कार्यकर्ताओं की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे दहेज प्रथा के विरुद्ध सशक्त जन-जागरण अभियान चलाएँ।
लोगों को यह समझाना होगा कि विवाह कोई सौदा नहीं, बल्कि दो आत्माओं, दो परिवारों और दो संस्कृतियों का पवित्र मिलन है।

समाधान यही है —

  1. बेटा और बेटी में समानता का व्यवहार अपनाया जाए।
  2. बेटियों को आत्मनिर्भर और शिक्षित बनाया जाए।
  3. विवाह में सादगी और सीमित लोगों की उपस्थिति पर बल दिया जाए।
  4. समाज में दहेज लेने-देने वालों का बहिष्कार किया जाए।

यह समय है कि हम सब मिलकर इस सामाजिक बुराई को समाप्त करने का संकल्प लें। जब तक समाज में सोच नहीं बदलेगी, तब तक कानून भी सीमित रहेगा।
हर परिवार, हर माता-पिता, हर युवक और युवती को यह समझना होगा कि “दहेज से नहीं, प्रेम और सम्मान से ही जीवन का सौंदर्य बढ़ता है।”

दहेज न ले, न दे — यही सच्ची मानवता, यही सच्चा धर्म।