मुस्लिम की राजनीतिक पहचान गौतमबुद्धनगर की पावन धरती पर बन जाएगी ?

 



चौधरी शौकत अली चेची

बसपा सुप्रीमो के गृह जनपद गौतमबुद्धनगर लोक सभा के गलिहारो में लगातार धूल फांक रही है, मुस्लिम लीडरशिप। समझना बड़ा मुश्किल है गौतमबुद्धनगर में अच्छी खासी जनसंख्या मुस्लिमों की होने के बावजूद राजनीतिक पहचान नहीं बन पा रही? सवाल पैदा होता है कि क्या राजनीतिक पार्टियां बढ़ावा नहीं दे रही या मुस्लिम चेहरे अपनी जिम्मेदारी निभाने से पीछे हट रहे हैं। इस समय गौतमबुद्धनगर लोकसभा क्षेत्र में 24 लाख वोटर बताए जाते हैं। इनमें लगभग 525000 मुस्लिम वोटर हैं। दादरी  विधानसभा पर लगभग 570000 वोटर हैं। इन्हीं में से लगभग 95000 मुस्लिम वोटर हैं। मुस्लिमों ने राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए समाजवादी पार्टी से एक चेहरे को आगे कर 2022 में चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की है। समाजवादी पार्टी टिकट देगी या नहीं यह तो आने वाला समय ही बताएगा? लेकिन कुछ लोग चर्चाएं जरूर


करते हैं कि मुस्लिमों को हर पार्टी इग्नोर कर देती है, लेकिन समझना यह भी होगा पीस पार्टी, एमआईएम पार्टी और कांग्रेस पार्टी में मुस्लिम चेहरे को जिलाध्यक्ष बनाया है बाकी किसी भी पार्टी में मुस्लिम को जिलाध्यक्ष या चुनाव मैदान में नहीं उतारा।  प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर कोई सम्मानित जिम्मेदारी नहीं दी या मंत्री पद का कार्यभार नहीं सौंपा। कुछ बुद्धिजीवी लोग यह भी मानते हैं मुस्लिम राजनीति में बढ़.चढ़कर हिस्सा नहीं लेता। इस बात के कई मायने हो सकते हैं जबकि कई सारे चेहरों ने राजनीति में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया है, छोटे बड़े चुनाव लड़ने की प्रोग्रेस की, अनेक संगठनों में मुख्य भूमिका भी निभा रहे हैं, लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने मुस्लिमों को शायद इग्नोर कर गैर मुस्लिम दर्जनों चेहरों को उचित सम्मान दिया, बाहरी चेहरों को भी चुनाव लड़ा कर उचित सम्मान दिया और मौका देख कर सम्मान देने वाली पार्टियों को ठोकर मार कर दूसरी पार्टियों में शामिल होते चले आ रहे हैं। 1992 में बनी समाजवादी पार्टी से मुस्लिमों का विशेष लगाव आज भी बरकरार है। उत्तर प्रदेश के अलग.अलग जिलों में समाजवादी पार्टी में मुस्लिमों ने अपनी मुख्य भूमिका और पहचान बनाई, लेकिन गौतमबुद्धनगर में समाजवादी पार्टी को कामयाबी अभी तक नहीं मिली जबकि समाजवादी पार्टी ने सत्ता में रहकर गौतमबुद्धनगर में कई अच्छे कार्य किए हैं, किसानों को अच्छा खासा लाभ भी दिया है। क्या इसका कारण यह भी हो सकता है कि यहां हाईकमान द्वारा मुस्लिमों को दरकिनार किया गया, जिसकी वजह से समाजवादी पार्टी यहां से सफलता नहीं हासिल कर सकी है, हर किसी भी क्षेत्र में जागरूकता के आधार पर मुस्लिम आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है, अच्छी खासी संख्या होने के अनुसार राजनीति में पीछे हटता दिखाई दे रहा है, जबकि कम संख्या वाले नेता बनकर उभर रहे हैं। मुस्लिमों पर समाजवादी पार्टी का वोटर सपोर्टर होने का तमका शायद आगे नहीं बढ़ने दे रहा, सामाजिक राजनीतिक बुद्धिजीवियों को इस पर भी विचार करना पड़ेगा। लीडरशिप को समझने के लिए बिसाडा कांड, दादरी दतावली, दनकौर अच्छेजा, कादलपुर, रबूपुरा सामाजिक धार्मिक आदि घटनाओं को मुस्लिमों ने गहराई से महसूस किया है, लेकिन राजनीतिक नेता और पार्टियों से खोखले वादे आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। इसी कारण मुस्लिम कम्युनिटी के लोग कुछ चेहरों को राजनीति में बढ़ाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। कुछ राजनीतिक लोकल लीडरशिप बढ़ावा देने की बजाय बैकफुट पर धकेलने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे हाईकमान में बैठे राजनीतिक पार्टी के लोग मुस्लिमों को इग्नोर कर देते हैं। समझना देखना बाकी है यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा? मुस्लिम समझ कर चलता है कि भरोसा टूटना नहीं चाहिए संघर्ष और सफलता के लिए रास्ता छूटना नहीं चाहिए, पकड़े रहो डोर को लहर एक दिन जरूर आएगी। ऊर्जा की किरण एक दिन किसी को जरूर दिखाई दे जाएगी। गौतमबुद्धनगर की पावन धरती पर मुस्लिम की राजनीतिक पहचान बन जाएगी।

लेखकः- भारतीय किसान यूनियन (बलराज) के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष हैं।

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