मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम और योगेश्वर श्री कृष्ण हैं, आर्य संस्कृति के देदीप्यमान नक्षत्र


 

राम और राक्षस रावण का युद्ध 9 दिन तक चला था और दसवे दिन  राम ने रावण को मृत्यु के गले लगा कर उन पर जीत प्राप्त  की थी और तभी से उस दस दिन के समय को दशहरा के रूप में मनाते हैं

 

पं0 महेंद्र कुमार आर्य


मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम और योगेश्वर श्री कृष्ण आर्य संस्कृति के देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनके आलोक से आर्य जाति आज भी मार्गदर्शन प्राप्त कर रही है। श्री राम का जीवन मर्यादा में बंधा हुआ चलता है, जंहा मुनि वशिष्ठ, विश्वामित्र उनका पग पग पर मार्गदर्शन करते है, परंतु श्री कृष्ण को यह सौभाग्य प्राप्त नही हुआ।  भगवान राम बचपन से ही शान्त  स्व्भाव के वीर पुरूष थे। उन्हों ने मर्यादाओं को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया था। इसी कारण उन्हेंश मर्यादा पुरूषोत्तम राम के नाम से जाना जाता है। उनका राज्य न्या्यप्रिय और खुशहाल माना जाता था। इसलिए भारत में जब भी सुराज (अच्छे राज) की बात होती है तो रामराज या रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है। धर्म के मार्ग पर चलने वाले राम ने अपने तीनों भाइयों के साथ गुरू वशिष्ठा से शिक्षा प्राप्तद की। किशोरावस्था में गुरु विश्वामित्र उन्हेंथ वन में राक्षसों द्वारा मचाए जा रहे उत्पात को समाप्त करने के लिए साथ ले गये। राम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी इस कार्य में उनके साथ थे। ब्रह्म ऋषि विश्वामित्रए जो ब्रह्म ऋषि बनने से पहले राजा विश्वरथ थेए उनकी तपोभूमि बिहार का बक्सर जिला है। ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र वेदमाता गायत्री के प्रथम उपासक हैंए वेदों का महान गायत्री मंत्र सबसे पहले ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र के ही श्रीमुख से निकला था। कालांतर में विश्वामित्र की तपोभूमि राक्षसों से आक्रांत हो गई। ताड़का नामक राक्षसी विश्वामित्र की तपोभूमि बक्सर (बिहार) में निवास करने लगी थी तथा अपनी राक्षसी सेना के साथ बक्सर के लोगों को कष्ट दिया करती थी। समय आने पर विश्वामित्रजी के निर्देशन प्रभु श्री राम के द्वारा वहीं पर उसका वध हुआ। राम ने उस समय ताड़का नामक राक्षसी को मारा तथा मारीच को पलायन के लिए मजबूर किया। इस दौरान ही गुरु विश्वासमित्र उन्हें मिथिला ले गये। वहां के विदेह राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के लिए एक स्वयंवर समारोह आयोजित किया था। जहां भगवान शिव का एक धनुष था जिसकी प्रत्यं चा चढ़ाने वाले शूरवीर से सीता जी का विवाह किया जाना था। बहुत सारे राजा महाराजा उस समारोह में पधारे थे। जब बहुत से राजा प्रयत्न करने के बाद भी धनुष पर प्रत्यंयचा चढ़ाना तो दूर उसे उठा तक नहीं सकेए तब विश्वामित्र जी की आज्ञा पाकर श्री राम ने धनुष उठा कर प्रत्यूंचा चढ़ाने का प्रयत्न किया। उनकी प्रत्यंधचा चढ़ाने के प्रयत्न में वह महान धनुष घोर ध्‍‍वनि करते हुए टूट गया। महर्षि परशुराम ने जब इस घोर ध्वरनि को सुना तो वे वहां आ गये और अपने गुरू शिव का धनुष टूटने पर रोष व्यक्त् करने लगे। लक्ष्मवण जी उग्र स्वाभाव के थे। उनका विवाद परशुराम जी से हुआ। ;वाल्मिकी रामायण में ऐसा प्रसंग नहीं मिलता है। तब श्री राम ने बीच.बचाव किया। इस प्रकार सीता का विवाह राम से हुआ और परशुराम सहित समस्त  लोगों ने आशीर्वाद दिया। अयोध्या में राम सीता सुखपूर्वक रहने लगे। लोग राम को बहुत चाहते थे। उनकी मृदुल, जनसेवायुक्ता भावना और न्यासयप्रियता के कारण उनकी विशेष लोकप्रियता थी। राजा दशरथ वानप्रस्थल की ओर अग्रसर हो रहे थे। अत. उन्होंने राज्याभार राम को सौंपने का सोचा। जनता में भी सुखद लहर दौड़ गई की उनके प्रिय राजाए उनके प्रिय राजकुमार को राजा नियुक्ता करने वाले हैं। उस समय राम के अन्यद दो भाई भरत और शत्रुघ्नए अपने ननिहाल कैकेय गए हुए थे। कैकेयी की दासी मन्थरा ने कैकेयी को भरमाया कि राजा तुम्हाभरे साथ गलत कर रहें है। तुम राजा की प्रिय रानी हो तो तुम्हासरी संतान को राजा बनना चाहिए पर राजा दशरथ राम को राजा बनाना चा‍हते हैं। राजा दशरथ के तीन रानियां थींरू कौशल्याए सुमित्रा और कैकेयी। भगवान राम कौशल्या के पुत्र थेए सुमित्रा के दो पुत्रए लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे और कैकेयी के पुत्र भरत थे। राज्य नियमों के अनुसार राजा का ज्येष्ठ पुत्र ही राजा बनने का पात्र होता है अत- श्री राम का अयोध्या का राजा बनना निश्चित था। कैकेयी जिन्होंने दो बार राजा दशरथ की जान बचाई थी और दशरथ ने उन्हें यह वर दिया था कि वो जीवन के किसी भी पल उनसे दो वर मांग सकती हैं। राम को राजा बनते हुए और भविष्य को देखते हुए कैकेयी चाहती थी कि उनका पुत्र भरत ही अयोध्या का राजा बनेए इसलिए उन्होंने राजा दशरथ द्वारा राम को १४ वर्ष का वनवास दिलाया और अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राज्य मांग लिया। वचनों में बंधे राजा दशरथ को विवश होकर यह स्वीकार करना पड़ा। श्री राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया। श्री राम की पत्नी देवी सीता और उनके भाई लक्ष्मण जी भी वनवास गये थे।  वनवास में उनके पहले के 13 वर्ष का समय ठीक.ठाक ही व्यतित हुआ, आखिरी के कुछ समय में रावण ने सीता का हरण किया था, रावण एक राक्षस था और वो लंका का राजा था।  श्री राम, सीता  और लक्ष्मण  कुटिया में रहते थे तब एक हिरण की वाणी सुनकर सीता व्याकुल हो गयी, वह हिरण रावण का मामा मारीच था, उसने रावण के कहने पर सुनहरे हिरण का रूप बनाया। सीता जी उसे देख कर मोहित हो गई और श्री राम जी से उस हिरण का शिकार करने का अनुरोध किया। श्री राम जी अपनी पत्नी की इच्छा पूरी करने चल पड़े और लक्ष्मण जी से सीता की रक्षा करने को कहा, मारीच श्री राम जी को बहुत दूर ले गया। का मिलते ही श्री राम जी ने तीर चलाया और हिरण बने मारीच का वध किया। मरते.मरते मारीच ने ज़ोर से हे  सीता- हे लक्ष्मण की आवाज़ लगायी। उस आवाज़ को सुन सीता चिन्तित हो गयीं और उन्होंने लक्ष्मण  को श्री राम जी के पास जाने को कहा। लक्ष्मण  जी जाना नहीं चाहते थे, पर अपनी भाभी की बात को इंकार न कर सके। लक्ष्मण ने जाने से पहले एक रेखा खींची, जो लक्ष्मण रेखा के नाम से प्रसिद्ध है।  लक्ष्मण भाभी द्वारा कहने पर भैया को देखने गए तभी रावण एक तांत्रिक बाबा के रूप मे कुटिया के बाहर आकर भिक्षा की मांग करने लगा। सीता जी ने देवर लक्ष्मण द्वारा खिची हुई लक्ष्मण रेखा पार कर दी और तभी रावण ने उनका हरण कर लिया। जब श्री राम और लक्ष्मण कुटिया वापस आए तो उन्होने सीता जी को नहीं पाया और फिर वो उनकी तलाश में वन की और निकल पड़े। श्री राम  अपने भाई लक्ष्मण के साथ सीता की खोज में दर.दर भटक रहे थे। तब वे हनुमान और सुग्रीव नामक दो वानरों से मिले। वहाँ राम ने उनसे अपनी समस्या बताया और तभी हनुमान, राम के सबसे बड़े भक्त बने, पत्नी सीता को पुनः प्राप्त करने के लिए भगवान श्री राम  ने हनुमान,विभीषण और वानर सेना की मदद से रावण के सभी बंधु.बांधवों और उसके वंशजों को पराजित किया तथा लौटते समय विभीषण को लंका का राजा बनाकर अच्छे शासक के लिए मार्गदर्शन किया। राम और राक्षस रावण का युद्ध 9 दिन तक चला था और दसवे दिन  राम ने रावण को मृत्यु के गले लगा कर उन पर जीत प्राप्त  की थी और तभी से उस दस दिन के समय को दशहरा के रूप में मनाते हैं ।

संकलनकर्ताः. पं0 महेंद्र कुमार आर्य पूर्व प्रधान आर्य समाज मंदिर सूरजपुर, ग्रेटर नोएडा, जिलाः. गौतमबुद्धनगर हैं।