जीएसटी लागू हो गई फिर पिछली सरकारों की बनाई सरकारी संपत्ति क्यों बेची जा रही हैं? इसका जवाब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देना ही चाहिए

 


चौधरी शौकत अली चेची


-------------------------भारत  ने वर्ष 1962, 1965 और 1971 की लड़ाईयां भी लडी और इसके साथ ही पोलियो, प्लेग, हैजा, टीबी जैसी महामारियां भी झेली और इनका मुफ्त में इलाज, मुफ्त में पूरे देश का टीकाकरण कराया। साथ ही खूब भ्रष्टाचार और घोटाले भी होते रहे तथा विदेशों में काला धन जमा होता रहा। इनके सबके वाजूद बहुत सारे सरकारी कारखाने,कंपनियां और अस्पताल, कॉलेज स्कूल भी स्थापित हुए और सरकारी कंपनियों में कोई कमी नहीं हुई तथा प्राइवेट कंपनियां से नौकरियां व सरकारी कोष में लाभ होता रहा। महंगाई भत्ता 131 प्रतिशत तक सबसे अधिक वेतन वृद्धि छठे वेतनमान में मिली, सरकारी कर्मचारियों को पेंशन दिया, देश की जीडीपी 9 प्रतिशत से ऊपर थी। आखिर पहले की वे सरकारें किस फार्मूले से ये सब  कुछ कर लेती थीं, जो मोदी सरकार अब एक तरह से लाचार बनी हुई है? देश की अर्थव्यवस्था कहां थीं और अब कहां पहुंच रही है? नोटबंदी से काला धन देश व विदेशों से भी वापस आ गया क्या? इसका जवाब भी शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास नही है? जीएसटी लागू हो गई फिर पिछली सरकारों की बनाई सरकारी संपत्ति क्यों बेची जा रही हैं? इसका जवाब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देना ही चाहिए। लॉकडाउन से कोराना की कमर टूट गई तो 2 गज दूरी, माक्स है जरूरी, वैक्सीन क्यों है जरूरी यह सब व्यंगात्मक लगते हैं। नौकरियां लगातार जा रही हैं, एनजीओ से पैसा प्रधानमंत्री रिलीफ फंड में जमा हो गया, कोई युद्ध नहीं हुआ, जीडीपी 0 प्रतिशत से नीचे क्यों चल रही है, आरणीय प्रधानमंत्री इस बारे में कुछ नही बोलते हैं। डीजल, पेट्रोल पर सब्सिडी की जगह वैट और टैक्स बढ़ाकर 40 से ऊपर जनता से वसूली की जा रही है। वादा था मोदी सरकार बनाओ, डीजल पेट्रोल 35 लीटर में खरीदो, इन्श्योरेंस और म्यूच्यूअल फण्ड पर भी 18 प्रतिशत टैक्स से कमाई की जा रही है, फिर भी सारी जेबे खाली है। देश के रिज़र्व बैंक में आपातकालीन जमा में से 175 अरब रुपये निकालकर कहां खर्च कर दिए पता ही नही चल पा रहा है? पूंजीपति मित्रों की सूची उठा देखें तो पाएंगे कि देश के 28 राष्ट्रवादी बिजनेसमैन के नाम देख कर होश उड जाएंगे। इनमें भगोडे विजय माल्या, मेहुल चौकसी, नीरव मोदी, निशान मोदी समेत पूरी पलटन जो है। खबरों की मानें तो इनके द्वारा लूटी गई सरकारी रकम लगभग 10000000000000 रुपए 10 ट्रिलियन है और विजय माल्या को छोड़कर सभी गुजरात से हैं। तीन कृषि कानूनों के उद्देश्यों की बात करें तो कारपोरेट की भारत के विशाल खाद्यान्न पर नजर समस्या थी किसानों से अनाज खरीदने के लिए अलग.अलग राज्यों के नियम अनुसार कारपोरेट के लिए नुकसान था।  इसीलिए सरकार ने पूरे देश के लिए केंद्रीय अधिनियम बना दिया राज्यों का झंझट ही समाप्त कारपोरेट खाद्यान्न  थोक में खरीदना और भंडार करना चाहते हैं आवश्यक अधिनियम उन्हें लंबे समय तक फसलों का भंडारण करने से रोकेगा क्योंकि इससे बाजार में कीमतों में वृद्धि नहीं होती इस समाधान से खाद्य फसलें वस्तु अधिनियम के तहत नहीं आएंगी खाद्यान्न फसल कम पैदा की जाएगी। इस प्रकार मुनाफाखोरी के लिए लंबी अवधि संग्रहित आसानी से की जा सकती है जहां कारपोरेट द्वारा खेती निजी फसल उगाने के लिए लाखों हेक्टर जमीन पर एक जैसी फसल होगी जिसमें किसानों को अनुबंध कर दिया जाएगा। किसान अपने अधिकार के लिए कोर्ट नहीं जा सकता। एसडीएम और डीसी न्यायाधीश के रूप में कार्य करेंगे। सरकारी कर्मचारी सत्ता पक्ष तथा रसूखदारो के फेवर में ही काम करते हैं। किसान हर तरफ से कमजोर होता है, गरीब किसान, मजदूर असहाय केवल कानून का पालन करता है और जाति धर्म की द्वेष भावना में उलझ कर अपने हक अधिकार के लिए तरक्की सद्भावना के लिए वोट देता है, लेकिन पैसा कमाने के लिए उच्च कोटि के लोग कानून अपने फेवर में बनवाते हैं।

लेखकः. चौधरी शौकत अली चेची भारतीय किसान यूनियन  (बलराज) के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष  हैं।