लॉकडाउन में किसानों के लिए खतरे की घंटी साफ नजर आ रही है

 






चौधरी शौकत अली चेची

-----------------------------------  प्रधान सेवक के मन की बात सुनते सुनते कान तक पक गए हैं। गोदी मीडिया और अंधभक्तों की नजर में अब भी अच्छे दिन की बहार चल रही है। किंतु रोजगार और शिक्षा लगभग समाप्ति की तरफ है। भ्रष्टाचार, महंगाई और कालाबाजारी से जनता रिंझ रिंझ कर मर रही है। देश की आर्थिक व्यवस्था गांवों में बसती है जिसे किसान व मजदूर चलाते हैं। पिछले 7 सालों मे सरकार द्वारा किसानों पर डीजल, पेट्रोल, बिजली बिल आदि की वजह से लगभग 45 प्रतिशत का भार बढ़ा है। किसान की इनकम लगभग 30 प्रतिशत कम हुई है और इससे लगभग 60 प्रतिशत किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हुए हैं। साथ ही कोई दूसरा रोजगार नहीं होने पर किसानों की आत्महत्या लगातार बढ़ रही हैं। लगभग 40 प्रतिशत किसान अपने माल को उम्मीद के हिसाब से घर पर रोके हुए हैं। मजदूर व पैसा आदि की वजह से अगली फसल किस तरह तैयार की जाए किसान इसी सोच विचार में लगा हुआ है। नोटबंदी, जीएसटी और लॉकडाउन से लगभग 60 प्रतिशत देश की जनता बेरोजगार हो गई। रियल स्टेट, उद्योग धंधे पूरी तरह से तबाह हो चुके है,। पिछले साल के लॉकडाउन में किसानों ने अपनी ग्रोथ को गिरने नहीं दिया, लेकिन इस समय के लॉकडाउन में किसानों के लिए खतरे की घंटी साफ नजर आ रही है, अगर यही स्थिति रही तो आने वाला समय ज्यादा खतरनाक हो सकता है। रोजी, रोजगार और कोरोना से हो रही मौतों से खतरनाक सबब साफ नजर आ रहा है। पिछले 30 सालों में भारत ने विदेशी मुल्कों से कोई आर्थिक मदद नहीं ली, लेकिन कई देशों की आपदा में भारत ने मदद की। किंतु अब लगभग 30 मुल्क भारत की मद्द कर रहे हैं। समझ में नही आ रहा है कि यह वाकई कोई भंयंकार महामारी है या फिर कोरोना भयंकर स्थिति में नाकामियों को छुपाने के लिए सरकार झूठ की गठरी बांधकर जनता के ऊपर फेंक रही है? सच्चाई उजागर करने वाले लोगों को  आरोपी बनाकर बैकफुट पर फैंका जा रहा है। कोरोना कुदरती आपदा है, लापरवाही है, भयंकर बीमारी है, षड्यंत्र है, प्रोपगंडा है? समझना आसान नहीं है, लेकिन समय पर इलाज नहीं होना दवाई आदि की पूर्ति नहीं होना शमशान, कब्रिस्तान और नदियों में बहती हुई लाशें चीख चीख कर सरकार की नाकामियों को जरूर उजागर कर रही हैं। आंसुओं के बनते हुए समंदर दिलों के अरमान आग का गोला बनकर खुद को ठगा महसूस कर गहरे दर्द की दास्तां अपनों की निहारती तस्वीरों व यादों को जिंदगी भर के लिए नहीं भुलाने वाली यादगार दर्द में तडप रहे हैं।ं देश को चलाने वाला किसान व मजदूर समझ नहीं पा रहा पुण्य पाप, रोजी, रोजगार अच्छे दिन का इंतजार खत्म हो गया या अभी समय बाकी है? पवित्र ग्रंथों में लिखा करनी का फल भोगना पड़ेगा क्या अब सामने आ गया है? किसी ने खूब लिखा है बिन मतलब के किसी के दर पर जाना नहीं चाहिए बिन औलादी इंसान को कभी भी सत्ता पर नहीं बैठाना चाहिए। संत कबीर ने कहा है बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय काम बिगाड़े आपनो जग में होत हंसाय जग में होत हंसाय चित में चैन ना पावे खानपान सब राग रंग कुछ मन नहीं भावे। जय जवान, जय किसान, तिरंगा भारत की शान, एकता जागरूकता भाईचारा जिंदाबाद, अंधभक्ति, बुद्धि हीनता, मूर्खता, मुर्दाबाद।

लेखकः. चौधरी शौकत अली चेची भारतीय किसान यूनियन  (बलराज) के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष  हैं।