देश में एक साथ चुनाव करा दिए जाएं, सारा झंझट ही खत्म, न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी, सत्यमेव जयते का अर्थ भी समझ आ जाएगा




जय जवान- जय किसान, सबका भारत, देश महान, कानून व संविधान का हो सम्मान, समझना मुश्किल किसके साथ खड़ा इंसान

 




चौधरी शौकत अली चेची


--------------------------अच्छे दिन आए नहीं, सबका साथ- सबका विकास, विकास पैदा हुआ नहीं, लेकिन कोरोना पैदा हो गया। अत्याचार, भ्रष्टाचार, बलात्कार, बेरोजगारी, महंगाई पैदा भी हो रही है और जवानी दहलीज पर आकर उछल कूद भी मचा रही हैं। यहां सवाल पैदा हो रहा है कि क्या सरकार व सत्ता पक्ष समर्थकों से कोरोना डरता है? कोरोना बीमारी है, जादूगरी है, उल्लू की नस्ल से है या फिर कोरोना महामारी की आड में लोगों पर उल्लू की लकडी फिराना है? लोगों को डराना है, सच्चाई की आवाज को दबाना है, समझ में नहीं आ रहा है कि कोरोना पहले लाल कलर का था अब हरा बन गया? प्रधानमंत्री मोदी ने पहले ताली और थाली बजवाई फिर मोमबत्ती जलवाई और दूरी बनवाई? मगर कोरोना फिर भी नहीं भागा और आंखे तरेर कर फिर गुर्ररा रहा है। मोटी सी बात है कि न जाने कितने ही लोगों की मौत हर साल किसी न किसी बीमारी से हो जाती हैं? कैंसर, हार्ट अटैक जैसी कई बीमारियों से इस दौर में ज्यादातर लोगों की मौतें हो रही हैं उन पर ध्यान क्यों नही दिया जा रहा है? मगर कोरोना पर इतनी हायतौबा मची है कि पिछला साल तो पूरा सा ही लॉकडाउन में निकल गया और अब फिर पहले जैसे ही हालात सामने आ रहे हैं। अब तो वैक्सीन भी आ गई फिर ऐसे हालात क्यों है? जब वैक्सीन सुरक्षित और कारगर है तो फिर ये सब टंटैंबाजी क्यों हो रही है? जिन लोगों को वैक्सीन की सभी खुराक मिल चुकी है उन्हें तो हर तरह से फ्री कर देना चाहिए। किंतु ऐसा नही हो रहा है और सभी फिर से कोविड-19 प्रोटोकाल लादा जा रहा है। ऐसा लगता है कि भाजपा के लिए अब कोरोना अब अवसर ही बल्कि एक हथियार भी बन चुका है। यदि विपक्ष कहीं ताकतवार दिखाई दे ंतो कोरोना, यदि कहीं चुनावी महौल पक्ष में कराना हो तो कोरोना, कहीं चुनाव जीतना हो तो कोराना, कहीं विरोध प्रदर्शन को दबाना या खत्म कराना हो तो कोरोना,---- कोरोना, कोरोना कोरोना सुनते सुनते आखिर कान ही पक गए हैं। वैक्सीनेशन के बाद भी  कोरोना हावी, 2 गज दूरी, मॉक्स जरूरी, सब फेल। सवाल तो यह भी बनता है कि 50 या 100 लोगों पर ही हमला है कोरोना।


लाखों कोरोडों की भीड से डर कर भाग जाता है, कोरोना। पश्चिमी बंगाल में हर रोज चुनावी रैली,जहां लाखों की भीड वहां कोरोना डरा हुआ है और न किसी मंत्री और न किसी विधायक और न ही किसी नेता का बाल बांका कर रहा है। चुनाव में लाखों की भीड़ को देखकर कोराना भाग जाता है। रात में लॉकडाउन, दिन में आजादी, शायद उल्लू की तरह कोराना को रात में दिखाई देता है। कुंभ मेला हरिद्वार में लाखों श्रद्वालूओं की भीड को देख कर कोरोना उल्टे पैर भाग जाता है। शहरी क्षेत्र से कोरोना नहीं डरता है, ग्रामीण क्षेत्र से डरता है। ग्रामीण और किसान शहरी क्षेत्र में सरकार के खिलाफ कृषि बिल को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, यहां कोरोना की दस्तक दिखाई देने लगी है। पहले भी ऐसा देखा गया था कि दिल्ली के शहीनबाग में सीएए और एनआरसी कानून के विरोध में धरने पर बैठे लोग जब सरकार के गले की हड्डी साबित होने लगे तो पूरे देश में कोरोना ने पैर पसार लिए और लॉकडाउन की आड में धरना प्रदर्शन सब छू मंतर हो गए। ऐसा लग रहा है कि ये कोरोना कोरोना सरकार के लिए मुफीद साबित हो रहा है,जहां विरोध को दबाना हो कोरोना आ गया और जहां चुनाव जीतना हो कोई कोराना नही ये बात अब धीरे धीरे जनता के समझ में आ भी रही है। यदि पूरे देश में एक साथ चुनाव करा दिए जाएं, सारा झंझट ही खत्म, न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी, सत्यमेव जयते का अर्थ भी समझ आ जाएगा। जय जवान- जय किसान, सबका भारत, देश महान, कानून व संविधान का हो सम्मान, समझना मुश्किल किसके साथ खड़ा इंसान।

लेखकः. चौधरी शौकत अली चेची भारतीय किसान यूनियन ( बलराज) के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष  हैं।