0 महेंद्र कुमार आर्य

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हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहित मुखम्। योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्। ओ३म् खं ब्रह्मं ॥

 पदार्थ-सत्यस्य-सत्यस्वरूप परमात्मा वा ज्ञान रूप मोक्ष का मुखम् द्वार हिरण्मयेन-सुवर्णादि पात्रेण-दरिद्रता रूपी दुःख से रक्षक धन सम्पत्ति से अपिहितम्-ढका हुआ है यः असौ-जो यह आदित्य प्रलय में सब को संहार करनेवाला ईश्वर, उसमें जो पुरुषः-जीव है सः असौ अहम् सो वह में हूं। ओ३म् खम् ब्रह्म-सबसे उत्तम नाम परमेश्वर का ओ३म् है, वह खम् आकाश के सदृश व्यापक और ब्रह्म-सबसे बड़ा है।

पदार्थ-जो पुरुष धन को प्राप्त हो कर धन को शुभ कामों में लगाते हैं, पाप कर्मों में कभी नहीं लगाते वे पुरुष धन्यवाद के योग्य हैं। प्रायः सुवर्णादि धन से प्रमादी लोग, पाप करके मोक्ष मार्ग को प्राप्त नहीं हो सकते। इसलिए मन्त्र में कहा है कि सुबर्णादि धन से मुक्ति का द्वार ढका हुआ है, इसीलिए उपनिषद् में कहा है-तत्वं यूषन् अपावृणुहे सबके पालन पोषण कर्ता प्रभो उस दिन को दूर कर ताकि मैं मुक्ति का पात्र बन सकू। मैं यह परमात्मा का सबसे उतम नाम है। इस नाम की उत्तमता वेद, उपनिषद, दर्शन और गीता आदि स्मृतियों में वर्णन की गई है। इसमें वेदों को माननेवालों को कभी सन्देह नहीं हो सकता। उसको वेद ने (खम्) आकाश की न्याई व्यापक और सबसे बड़ा होने से ब्रह्म कहा है।न्याई व्यापक और सबसे बडा होने से ब्रहम कहा है।

सामवेद-शतक

जैसे सूर्य के प्रकाश में सूर्य का ही प्रमाण है, अन्य का नहीं और जैसे सूर्य प्रकाशस्वरूप है, पर्वत से लेके त्रसरेणु पर्यन्त पदार्थों का प्रकाश करता है, वैसे वेद भी स्वयं-प्रकाश हैं और सत्य विद्याओं का भी प्रकाश कर रहे हैं।

- महर्षि दयानन्द (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका)

 

 

अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि ॥

-पूर्वाचिक १ प्रपाठक १।दर्शांत १। मन्त्र १

शब्दार्थ-अग्ने-हे स्वप्रकाश, सर्वव्यापक, सबके नेता, परमपूज्य परमात्मन्! बर्हिषि-आप हमारे ज्ञानयज्ञरूप ध्यान में ़आयाहि़़़- प्राप्त हो जाओ।आया ही- प्राप्त होओ। गृणानः-आप स्तुति किये हुए हैं होता-आप हो दाता हैं। वीतये हमारे हृदय में प्रकाश करने के लिए तथा हव्यदातये-भक्ति, प्रार्थना, उपासना का फल देने के लिए नि सत्सि- विराजो।

 

भावार्थ-परम कृपालु परमात्मा, वेद द्वारा हम अधिकारियों को प्रार्थना करने का प्रकार बताते हैं। हे जगत्यितः ! आप प्रकाशस्वरूप हैं, हमारे हृदय में ज्ञान का प्रकाश कोजिये। आप यज्ञ में विराजते हो, हमारे ज्ञानयज्ञरूप ध्यान में प्रा्त होओ। आपकी वेद और वेदद्रष्टा ऋषि लोग स्तुति करते हैं हमारी स्तुति को भी कृपा करके, त्रवण कर हम पर प्रसन्न होओ। आप हो सब को सब पदार्थ और सुखों के देनेवाले हो।

 

(२)

त्वमग्रे यज्ञानां होता विश्वेषां हितः। देवैभिर्मानुषे जने ॥

 

शब्दार्थ-हे अग्ने-ज्ञानस्वरूप परमात्मन्! आप विश्वेषां यज्ञानाम्- व्रह्चत्ञादि स्व यज्ञों के होता-ग्रहम करनेवाले स्वामी हैं। आप देवेभिः- विडन् भकों से

मानुषे जने-मनुष्यवर्ग में हितः-धारण किये जाते हैं। भावार्च-आप जगत्यिता सब यों के ग्रह करनेवाले पहन के स्वामी हैं. अर्थात् दध से किये यज्ञ होम. उप ्रदाचर्य बेदपाटन सत्याषण इश्वर भकि आदि उतम- उन्हम कम आपको प्यारे हैं। मनुष्य जन्म में ही उत्तम कर्म किये जा सकते हैं और          

इन श्रेष्ठ कर्मों द्वारा, इस मनुष्य जन्म में आप परमात्मा का यथार्थ ज्ञान भी हो सकता है। पशु-पक्षी आदि अन्य योनियों में तो आहार, निद्रा, भय, राग, द्वेषादि ही वर्त्तमान हैं, न इन योनियों में यज्ञादि उत्तम काम बन सकते हैं और न आपका ज्ञान ही हो सकता है।

 

(३)

 

अनिने दर्त वरणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम ॥

 

-पू० १। १ । १।३

 

शब्दार्थ-विश्ववेदसम् सब को जाननेवाले, ज्ञानस्वरूप ज्ञान के दाता होतारम् व्यापकता से सबके ग्रहण करनेवाले दूतम्-कर्मों का फल पहुंचानेवाले अस्य यज्ञस्य-इस ज्ञान यज्ञ के सुक्रतुम्-सुधारनेवाले अग्निं वृणीमहे-ऐसे ज्ञानस्वरूप परमात्मा को हम सेवक जन स्वीकार करते हैं।

 

भावार्थ-आप ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ही वेदों द्वारा सबके ज्ञानप्रदाता हैं। सबके कर्मों के यथायोग्य फलदाता भी आप हैं, सब जगह व्यापक होने से, सब ब्रह्माण्डों को आप ही धारण कर रहे हैं। आप ही हमारी भक्ति उपासना के श्रेष्ठ फल देनेवाले हैं, आप इतने बड़े अनन्त श्रेष्ठ गुणों के धाम और पतित पावन परमदयालु सर्वशक्तिमान् हैं तो हमें भी योग्य है कि सारी मायिक प्रवृत्तियों से उपराम हो, आपकी ही शरण में आएँ, आपको ही अपना इष्ट देव परम पूजनीय समझ निशि-दिन आपके ध्यान और आपकी आज्ञापालन में तत्पर रहें।

 

(४)

 

अग्निवृत्राणि जङ्घनद्द्रविणस्युर्विपन्यया।

 

समिद्धः शुक्र आहुतः॥

 

-पू० १ । १। १।४

 

शब्दार्थ-विपन्यया स्तुति से द्रविणस्युः अपने प्यारे उपासकों के लिए आत्मिक बल रूप धन को चाहनेवाला समिद्धः विज्ञात हुआ शुक्रः ज्ञान और बलवाला तथा ज्ञान और बल का दाता आहुतः अच्छे प्रकार से भक्ति किया हुआ अग्निः-ज्ञानस्वरूप ईश्वर वृत्राणि-अविद्यादि अन्धकार दुःखों और दुःख साधनों को जङ्घनत्-हनन करे।

 

भावार्थ-हे जगत्पते। आपकी प्रेम से स्तुति प्रार्थना उपासना करनेवालों को आप आत्मिक बल देते हैं, जिससे आपके प्यारे उपासक भक्त, अविद्यादि पञ्च क्लेश और सब प्रकार के दुःख और दुःख साधनों को दूर करते हुए, सदा आपके बरह्मानन्द मं मग्न रहते हैं। कृपासिन्धो भगवन्। हम पर ऐसी कपा करो कि हम भी आपके न के मन हुए, अविद्यादि सब क्लेशों और उनके कार्य दुःखों और दुःख साधनी की दूर कर आपके स्वरूपभूत ब्रह्मानन्द को प्राप्त होवें।

 

 

(५)

 

नमस्ते आग्रा जसे गृणन्ति देव कृष्टयः। अमेरमित्रमर्दय ॥

 

पू० १ । १।२।१

शब्दार्थ- है अग्रे! ते नमः-आपको हमारा नमस्कार है। कृष्टयः आपके प्यारे भक्त मनुष्य ओजसे गृणन्ति-बल प्राप्ति के लिए आपकी स्तुति करते हैं। देव हे प्रकाश स्वरूप और सबके प्रकाश करनेवाले सुखदाता प्रभो! अमैः-रोग भयादिकों से अमित्रम् पापी शत्रु को अर्दय-पौड़ित कीजिये।

 

भावार्थ-हे ज्ञानस्वरूप सर्व सुखदायक देव! आपको स्तुति, प्रार्थना, उपासना हम सदा करें, जिससे हमें आत्मिक बल मिले और ज्ञान का प्रकाश हो। जो लोग आपसे विमुख होकर आपकी भक्ति और वेदों की आज्ञा से विरुद्ध चलते, नास्तिक बन संसार को हानि करते हैं, उन पतितों तथा संसार के शत्रुओं को ही बाह्य शत्रु और आभ्यन्तर शत्रु काम, क्रोध, रोग, शोक, भयादि सदा पीड़ित करते रहते हैं।

 

(६)

अग्निमिन्धानो मनसा धियं सचेत मर्त्यः । अग्निमिन्धे विवस्वभिः॥

 

शब्दार्थ-मर्त्यः-मनुष्य मनसा-सच्चे मन से श्रद्धापूर्वक अग्निम् इन्धानः-प्रभु का ध्यान करता हुआ धियम् बुद्धि को सचेत-अच्छे प्रकार प्राप्त हो इसलिए विवस्वभिः सूर्य की किरणों के साथ अग्निम् इन्धे-प्रकाशस्वरूप प्रभु को हृदय में विराजमान करे।

 

भावार्थ -मनुष्य का नाम मर्त्य अर्थात् मरणधर्मा है। यदि यह मृत्यु से बचना चाहे तो जगत्पिता की उपासना करे।

 

सबको योग्य है कि दो घण्टा रात्रि रहते उठकर प्रभु का ध्यान करें। प्रातकाल सूर्य के निकले कभी सोवें नहीं। प्रभु को भक्ति करें तो लोगों को दिखलाने के लिए दम्भ से नहीं, किन्तु श्रद्धा और प्रेम से ध्यान करते करते परमात्मा के ज्ञान द्वारा मोक्ष को प्राप्त कर मृत्यु से तर जावें।

 

(७)

 

अग्ने मृड महाँ अस्यय आ देवियों जनम्। इयेथ बहिरासदम् ।।

 

-पू०१।१।३३

 

शब्दार्थ-अग्ने-हे पूजनीय ईश्वर । हमें मूड-सुखी करो महान् असि आप महान् हो देवियों जनम्-ज्ञान यज्ञ से आप देव की पूजा चाहनेवाले भक्त को अयः प्राप्त होते हो, बर्हिः यज्ञस्थल में आसदग विराजने को आ इयेथ-ग्राम होने हो।

               

                               

भावार्थ

हे पूजनीय परमात्मन्! आप श्रद्धा भक्ति युक्त पुरुषों को सदा सुखी और प्राप्त होते हो। श्रद्धा भक्ति और सत्कर्म होन नास्तिक और दुराचारियों को तो आपकी प्राप्ति हो सकती है, न दे सुखो हो सकते हैं। इसलिए हम सब को योग्य है। आपको वेदाज्ञा के अनुसार यज्ञ, होम, तप, स्वाध्याय और श्रद्धा, भक्ति, नम्रता और प्रेम से आपकी उपासना में लग जाएँ जिससे हमारा कल्याण हो।

 

(८) अग्निर्मू दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपां रेतांसि जिन्वति ॥

 

-पू०१।१।३।७.

 शब्दार्थ-अयम् अग्निः यह प्रकाशमान जगदीश्वर मूर्दा सर्वोत्तम है दिव ककुत्-प्रकाश की टाट है। जैसे बैल की टाट-कोहान सा ऊँची होती हैं ऐसे परमेश्वर का प्रकाश अन्य सर्व प्रकाशों से श्रेष्ठ है पृथिव्याः पतिः पृथिवी आदि सब लोकों का पालक है। अपाम्-कर्मों के रेतांसि- बीजों को जिन्वति जानता है। भावार्थ-आप परम पिता जी सबसे ऊंचे, सबसे श्रेष्ठ प्रकाशस्वरूप, सबके क। के साक्षी और फलप्रदाता हैं। ऐसे आप जगत्पिता प्रभु को सदा अति समोपचर्ती जान, हम सबको पापों से रहित होना, सदाचार और आपकी भक्ति में सदा तत्पर रहना चाहिये।

 

(९)

 तं त्वा गोपवनो गिरा जनिष्ठदग्ने अङ्गिरः। स पावक श्रुधी हवम्।

 

-पू०१।१।३

शब्दार्थ-हे अग्ने!  तम् त्वा-उस आपको गोपवनः-वाणी की शुद्धि चाहनेवाला और आपकी स्तुति से जिसकी वाणी शुद्ध हो गई है ऐसा भक्त पुरुष गिरा-अपनी वाणी से जनिष्ठत्-आपकी स्तुति करता हुआ आपको ही प्रकट कर रहा है। अङ्गिरः हे ज्ञाननिधे! पावक-पवित्र करनेवाले! स हवम् श्रुधी-ऐसे आप हमारी स्तुति प्रार्थना को सुनकर अंगीकार करो।

 

भावार्थ- मनुष्य को वाणी, संसार के अनेक पदार्थों के वर्णन और कठोर, कटु। मिथ्या भाषणादिकों से अपवित्र हो जाती है। परमात्मा पतितपावन हैं, जो पुरुष उनके ओङ्कारादि सर्वोत्तम पवित्र नामों का वाणी से उच्चारण और मन से चिन्तन करते हैं, वे अपनी वाणी और मन को पवित्र करते हुए आप पवित्र होकर, दूसरे सत्सङ्गियों को भी पवित्र करते हैं। धन्य हैं ऐसे सत्पुरुष जो आप भक्त बनकर दूसरों को भी भक्त बनाते हैं। वास्तव में उनका हो जन्म सफल है।

 

(१०)

 

परि वाजपतिः कविरग्रिहव्यान्यक्रमीत् । दधद्रल्नानि दाशुषे॥

 

 

 

शब्दार्थ-वाजपतिः अन्नपति, कविः सर्वज्ञ अग्निः-प्रकाशस्वरूप परमात्मा दाशुषे-दानी के लिए हव्यानि ग्रहण करने योग्य रत्नानि विद्या, मोती, हीरे स्वर्णादि धनों को दधत् देता हुआ परि अक्रमीत सर्वत्र व्याप रहा है।

भावार्थ-हे सर्वसुखदातः! आप दानशील हैं. इसलिए दानशील उदार भक्त पुरुष ही आपको प्यारे हैं। विद्यादाता को विद्या, अन्नदाता को अन, धनदाता को धन, आप देते इसलिए विद्वानों को योग्य है कि आपकी प्रसन्नता के लिए, विद्यार्थियों को विद्या का दान बड़े प्रेम से करें, धनी पुरुषों को भी योग्य है कि योग्य सुपात्रों के प्रति धन, वस्त्रादिकों का दान उत्साह, श्रद्धा, भक्ति और प्रेम से करें। आपके स्वभाव के अनुसार चलनेवाले सत्पुरुषों को आप सब सुख देते हैं। इसलिए हम सबको आपके स्वभाव और आज्ञा के अनुकूल चलना चाहिये तब ही हम सुखो होंगे अन्यथा कदापि नहीं।

 

(११)

 

कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे । देवममीवचातनम् ॥

 

पू० १। १। ३।१२

 

शब्दार्थ-कविम् सर्वज्ञ सत्यधर्माणम्-सत्यधर्मी अर्थात् जिनके नियम सदा अटल हैं देवम् सदा प्रकाशस्वरूप और सब सुखों के देनेवाले अमीवचातनम्- रोगों के विनाश करनेवाले अग्निम् तेजोमय परमात्मा की अध्वरे-ब्रह्मयज्ञादि में उपस्तुहि-उपासना और स्तुति कर।

 

भावार्थ-हे प्रभो! जिस आप जगत्पति के नियम से बँधे हुए पृथिवी, सूर्य, चन्द्र, मंगल, शुक्र शनि, बृहस्पति आदि ग्रह, उपग्रह अपने-अपने नियम में स्थित होकर अपनी अपनी गति से सदा घूम रहे हैं। आप जगन्नियन्ता के नियम को तोड़ने का किसी - का भी सामर्थ्य नहीं। ऐसे अटल नियमवाले सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, स्वप्रकाश, सुखदायक, रोग, शोकविनाशक, आप परमात्मा की, मुमुक्षु, पुरुष श्रद्धा भक्ति से प्रेम में मग्न होकर प्रार्थना और उपासना सदा किया करें, जिससे उनका कल्याण हो।

 

(१२)

 

कस्य नून परीणसि धियो जिन्वसि सत्पते। गोषाता यस्य ते गिरः॥

 

-पू० १। १। ३।१४

शब्दार्थ-सत्पते महात्मा सन्त जनों के रक्षक! यस्य गिरः- जिस  भक्त को वाणियाँ ते-आपके विषय में गोधाताः-अमृतरस से भरी हैं उसके लिए कस्य-सुख की परीणसि-बहुत सी धियः बुद्धियों को नूनम् जिन्वसि निश्चय से भरपूर कर देते हैं।

 

भावार्थ-हे प्रभो! आपके जो परम प्यारे सुप्त्र और अनन्य भक्त हैं, अपनी अतिमनोहर अमृतभरी वाणी से, सदा आप प्रभु के ही गुणगण को गान करते हैं।

               

                               

के ही गुणगान को गान करते हैं।

 

 

 

कृतिः- सामवेद-शतक

संकलनकर्ताः-प0 महेंद्र कुमार आर्य, पूर्व प्रधान- आर्य समाज मंदिर सूरजपुर, ग्रेटर नोएडा, जिलाः- गौतमबुद्धनगर हैं।