आचार्य करणसिह   नोएडा

   वेदवाणी-

 उक्थं च न शस्यमानं नागो रयिरा चिकेत।न गायत्रं गीयमानम्।।साम २२५

 पदार्थ-(अगो:)अश्रद्धालु जन का (न) न तो(शस्यमानम्)उच्चारण किया जाता हुआ (उक्थं च)स्तोत्र ही (न)न ही(गीयमानम्)गान किया जाता हुआ (गायत्रं) सामगान (अचिकेत)कभी

किसी से जाना गया है।अतः श्रद्धा पूर्वक स्तुति आदि शुभ कर्म करना चाहिए।

 भावार्थ- श्रद्धा रहित मनुष्य का उच्चारण किया गया भी स्त्रोत पाठ अनुच्चरण के समान ही होता है, अ श्रद्धा से दिया गया दान भी न दिए के समान होता है, और अश्रद्धा से गाया हुआ भी साम गान न गाए हुए के समान ही होता है। इसीलिए मनुष्यों को श्रद्धा के साथ ही सब शुभ कर्म संपादित करने चाहिए।

 विशेष- भाव यह है कि दिखावा करने से कोई लाभ होने वाला नहीं है। आचरण से, व्यवहार में लाने पर ही लाभ होता है, और वही दूसरों को भी लाभ करा सकता है।