ईश्वर का वैदिक स्वरुप


पं0 महेन्द्र कुमार आर्य

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ईश्वर के लक्षण सच्चिदानंद आदि लक्षण ’’युक्त’’ सत्, चित् और आनन्द जो जीवो को आनंद व्यक्त करता है।

परमेश्वर के संकेतमात्र से नृत्य करते हुए चांद तारों से सजा हुआ आकाश, हरी-.भरी वसुंधरा, हिम से ढके हुए पर्वतों के शिखर, ये रिमझिम करते हुए बादल, कल.कल बहती नदियां झरने तथा लहलाते हुए रंग बिरंगे फूल, उसी की सत्ता का आभास करते हैं शुभ और अशुभ को दिखाने वाले पैतृक वेद मनुष्य सरस्वती शिशु विद्या संसार के सभी रहस्य वेद और शास्त्रों में है। अतीत वर्तमान और भविष्य में भी होने वाली बातें वेद में सिद्ध है अर्थात मानव की सर्वगुण उन्नति के लिए उपेक्षित समस्त वेद में है। प्रभु का शुद्ध स्वरूप समझे बिना मनुष्य में विचार और आचार की पवित्रता कभी नही आ सकती। वेदों वाला कहते ही एकमात्र व्यक्तित्व जो उभकर कर सामने आता है वह है दयानंद महर्षि जी। ईश्वर के वैदिक स्वरूप को आर्य समाज के दूसरे में नियमों में जिस प्रकार लिखते हैं- ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निरंकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, आनदि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्रवर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य पवित्र और सृष्टिकर्ता करता है। हमें केवल उसी की पूजा करनी चाहिए।

आओ ईश्वर के वैदिक स्वरुप पर एक दृष्टि डाले। ईश्वर के वेद स्वरूप का वर्णन यजुर्वेद के अध्याय 40 मंत्र 4-8 में इस प्रकार से हैः-

4ः- वह गतिरहित है और उसकी गति मन से तीव्र हैं। देव ’’इन्द्रिय’’ उस तक पहुंच नही सके, जहां तक इनकी पहुंच है, उससे परे वह पूर्व से ही है। वह स्थिर है, परंतु मन और इंद्रियों को उल्लांघ जाता है। उसकी स्थिति में जीव अपने कर्म को धारण करता है।

5ः- वह हरकत करता हैं और हरकत नहीं करता। वह दूर है और निकट है। वह इस दृष्टि के अंदर और इसके बाहर, इसके परे हैं।

 6ः- जो मनुष्य सब प्राणियों और अप्राणियों को परमात्मा में देखता हैं और भूतों में परमात्मा को देखता है, ऐसा जानने पर उसे कोई संशय नहीं रहता।

 7ः- जब कोई मनुष्य जान लेता हैं कि सारे प्राणी एक परमात्मा में होने के कारण एक ही सूत्र में पिरोए हुए हैं, तो उसे क्या मोह हो सकता है और क्या शोक हो सकता है?

8ः- वह परमात्मा सर्वव्यापक, शुद्ध, अशरीरी, हर प्रकार के छिद्र और नाड़ी से रहित हैं, वह पवित्र हैं और पाप के स्पर्श से परे हैं वह विश्वरुपी काव्य का रचियता, सब कुछ जानने वाला, सबसे बड़ा और अपनी सत्ता से ही विद्यमान हैं, उसी ने अनन्त काल के लिए यथायोग्य रीति से सारे पदार्थों का विभाग किया है।

इन पांचों मंत्रों में इस विषय को और आगे बढ़ाया है कि धर्मिक मनोवृति का क्या महत्त्व है और वृत्ति मान जीवन पर क्या प्रभाव डालती है। पहले मन्त्र में जो यहां नहीं लिखा गया है उसमें बताया गया है कि सारा विश्व परमात्मा से आच्छादित है। चौथे और पांचवे मंत्रों में बताया गया है कि यह जगत के प्रति कण में विद्यमान है और इससे परे भी हैं। वह जीवात्मा में भी व्यापक हैं। 8 वे मंत्र में कुछ और विशेषणों का वर्णन किया गया हैं वह हर जगह विद्यमान ही नहीं, वह सब कुछ जानता है, सारे प्राणियों पर शासन करता हैं। उसका शासन केवल शक्ति का ही शासन नहीं, यह धर्म का राज्य भी हैं। वह शुद्ध पवित्र हैं, पाप और त्रुटि से सर्वथा अलग हैं। उसका दण्ड बेजुबान हैं। परमात्मा की सत्ता को इस रुप में देखने का फल क्या हैं? परमात्मा मेरा रक्षक है, परंतु वह मुझे सीधा ही रख सकता हैं मैं उसके न्याय नियम में हूं। मैं उसका पुत्र हूं। परंतु दूसरे मनुष्य भी उसी की संतान हैं। मानव जाति की एकता का आधार परमात्मा की एकता है। जब मझे यह ज्ञान वास्तव में हो जाए, तो सारे मनुष्य मुझे भाई दिखेंगे। उनमें से प्रत्येक का दुःख मुझे बेचौन करेगा, प्रत्येक के सुख से मुझे संतोष होगा। यदि मैं और कुछ न कर सकूं तो इतना तो अनुभव करूंगा ही कि मैं किसी से अनुचित व्यवहार करके उसे हानि ना पहुंचाऊं। जिस बालक को यह दृढ़ विश्वास हो जाता है कि उसका पिता कल्याण करता हैं और कल्याण ही चाहता हैं, वह पिता के कठोर वचनों को श्रद्धा से सुनता हैं। इधर भक्तों के लिए न कोई संशय रहता हैं, न शोक रहता है। दुनिया उसकी दृष्टि में उसका अपना घर है। जहां राग द्वेष के लिए कोई स्थान नही। प्रभु के ज्ञान का केवल आभास पाने के लिए उपनिषद में कहा गया हैं ’’संख्यता अस्य निमिषो जनानाम्-’’मनुष्य अपने जीवन भर में जितनी बार आंखों की पलक झपकता है, प्रभु के ज्ञान मं उनका भी हिसाब है।

ब्रह्म, सत्, चित, आनन्द हैं। इसी के साथ मित्रता प्राप्त करके जीवात्मा को सत् चित आनन्द को पाता हैं। इसी तत्त्व की खोज करनी हैं इसी को जानना हैं और इसी से जीवात्मा ने मैत्री करनी है, यह शरीर को मरणधर्मा हैं। ’’छान्दोयोपनिषद्’’ में कहा है कि यह स्थूल शरीर ऐसा है कि जैसे सिंह के मुख में बकरी। ऐसे ही यह शरीर मृत्यु के मुख में पडा है। यह मरणधर्मा शरीर,शरीरहित जीवात्मा का निवास स्थान है। इसलिए यह जीव दुःख.सुख से सदा ग्रस्त रहता हैं।  इसे पूर्ण आनंद तब होगा जब यह आनंदस्वरूप परमात्मा के साथ मिलेगा। संसार का सबसे बडा कोष-आनंद, इसने अपने पास रखा हुआ है। यह ब्रह्मतत्त्व सर्वत्र व्यापक है, इसके गुण आनन्द भी सर्वत्र है परंतु प्रकृति के बने सारे पदार्थों में इस आनंद की केवल छाया है। प्रकृतिजन्य तत्वों से मिला जीवात्मा भ्रम से, अज्ञान से यह समझ लेता है कि  प्रकृति के तत्वों में आनंद है छाया को यह वास्तविक वस्तु समझ कर लेता है तो उसके पीछे दुःखी होता है। यह दुख तभी दूर होता है,जब वह इस भ्रम से निकलकर आनन्द के स्रोत ब्रह्मातत्त्व की ओर जाता हैं। अतः हमें ईश्वर का वैदिक स्वरूप समझकर केवल एक ही ईश्वर की पूजा करनी चाहिए।

लेखकः-पं0 महेन्द्र कुमार आर्य, आर्य समाज सूरजपुर, ग्रेटर नोएडा, जिलाः-गौतमबुद्धनगर, के पूर्व प्रधान हैं।