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कच्चे माल की बेतहाशा बढ़ती कीमतों से MSME उद्योगों पर दोहरी मार, ITC में फंसी पूंजी ने बढ़ाई मुश्किलें


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क्राफ्ट पेपर से प्लास्टिक, स्टील और एल्युमिनियम तक बढ़ी लागत; IBA ने प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप, बाजार की समीक्षा और MSME राहत पैकेज की मांग की
मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ ग्रेटर नोएडा
उत्तर प्रदेश के MSME उद्योगों के सामने इन दिनों बढ़ती उत्पादन लागत और सीमित कार्यशील पूंजी की चुनौती गंभीर होती जा रही है। गौतम बुद्ध नगर के औद्योगिक क्षेत्र में कोरुगेट बॉक्स, पैकेजिंग, प्लास्टिक, पॉलीबैग, फोम, इंजीनियरिंग और अन्य लघु एवं सूक्ष्म इकाइयों पर कच्चे माल की लगातार बढ़ती कीमतों का दबाव देखने को मिल रहा है। इंडस्ट्रियल बिजनेस एसोसिएशन (IBA), गौतम बुद्ध नगर के अध्यक्ष अमित कुमार उपाध्याय ने इस स्थिति पर तत्काल सरकारी एवं प्रशासनिक हस्तक्षेप की आवश्यकता जताई है।
डेढ़-दो महीने में क्राफ्ट पेपर की कीमतों में 25–30 प्रतिशत वृद्धि का दावा
अमित कुमार उपाध्याय के अनुसार, पिछले डेढ़-दो महीनों में क्राफ्ट पेपर की कीमतों में लगभग 25–30 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। इसके अलावा पॉलीमर, प्लास्टिक दाना, स्टील, कॉपर, एल्युमिनियम सहित कई अन्य औद्योगिक कच्चे माल की कीमतों में भी लगातार वृद्धि हो रही है।
उनका कहना है कि समस्या केवल कीमत बढ़ने तक सीमित नहीं है। कई उत्पादों के दाम हर दूसरे-तीसरे दिन बदलने से MSME इकाइयों के लिए उत्पादन लागत का सही अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है। ऐसी स्थिति में पहले से तय ऑर्डर पर काम करने वाले छोटे उद्योगों के लिए ग्राहक को समय पर कीमत बताना और अपने मार्जिन को सुरक्षित रखना चुनौती बन गया है।
ऑर्डर तय, लेकिन लागत अनिश्चित—MSME के सामने बड़ा संकट
MSME इकाइयों की कार्यप्रणाली में कच्चे माल की कीमतों का सीधा प्रभाव तैयार उत्पाद की लागत पर पड़ता है। जब किसी उद्योग को ऑर्डर पहले की कीमत पर मिलता है और उत्पादन के दौरान कच्चे माल की कीमत बढ़ जाती है, तो अतिरिक्त लागत का बड़ा हिस्सा उद्योग को स्वयं वहन करना पड़ सकता है।
IBA अध्यक्ष के मुताबिक, कई इकाइयाँ ग्राहकों को बनाए रखने के लिए बढ़ी हुई लागत के बावजूद उत्पादन जारी रखने को मजबूर हैं। इससे उद्योगों का लाभांश प्रभावित होने के साथ-साथ नकदी प्रवाह पर भी दबाव बढ़ रहा है।
ITC में फंसी पूंजी ने बढ़ाई कार्यशील पूंजी की समस्या
अमित कुमार उपाध्याय ने MSME क्षेत्र की एक अन्य प्रमुख समस्या Input Tax Credit (ITC) को बताया।
उनके अनुसार, कई मामलों में उद्योगों को कच्चा माल खरीदते समय अपेक्षाकृत अधिक दर पर GST का भुगतान करना पड़ता है, जबकि तैयार माल की बिक्री पर कम GST दर लागू होती है। उनके द्वारा दिए गए उदाहरण के अनुसार, 18 प्रतिशत GST पर कच्चा माल खरीदकर 5 प्रतिशत GST पर तैयार माल बेचने की स्थिति में बड़ी मात्रा में ITC जमा हो सकता है।
छोटी एवं सूक्ष्म औद्योगिक इकाइयों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उनकी कार्यशील पूंजी सीमित होती है। एक ओर कच्चे माल की कीमत लगातार बढ़ रही है और दूसरी ओर कर क्रेडिट की राशि लंबे समय तक कारोबार में उपलब्ध नकदी के रूप में इस्तेमाल नहीं हो पाती। इससे कैश फ्लो पर दोहरा दबाव पैदा होने की बात IBA की ओर से कही गई है।
‘कागज पर कारोबार, जमीन पर नकदी का संकट’
MSME उद्योगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता नियमित नकदी प्रवाह है। कच्चे माल की खरीद, श्रमिकों का भुगतान, बिजली, परिवहन, किराया और अन्य परिचालन खर्च लगातार चलते रहते हैं। ऐसे में यदि बिक्री से प्राप्त धन और ITC से जुड़ी राशि समय पर उपलब्ध न हो, तो कारोबार चलाने के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता बढ़ जाती है।
IBA का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में कई इकाइयों को हर महीने अतिरिक्त आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। यदि कच्चे माल की कीमतों में असामान्य वृद्धि और कार्यशील पूंजी की समस्या लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर उत्पादन, निवेश और रोजगार पर भी पड़ सकता है।
IBA की मांग—पेपर निर्माताओं और MSME प्रतिनिधियों की संयुक्त बैठक हो
इंडस्ट्रियल बिजनेस एसोसिएशन ने जिला प्रशासन और जिला उद्योग केंद्र (DIC) से इस मामले में तत्काल बैठक बुलाने की मांग की है।
IBA के अनुसार, बैठक में—
पेपर एवं अन्य कच्चे माल के निर्माता,
डीलर एवं सप्लायर,
संबंधित औद्योगिक संगठन,
MSME प्रतिनिधि तथा
प्रशासन एवं जिला उद्योग केंद्र
को शामिल किया जाना चाहिए।
एसोसिएशन का कहना है कि बैठक के माध्यम से कच्चे माल की कीमतों में अचानक और बार-बार हो रही वृद्धि के कारणों की जानकारी सामने आनी चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में बाजार असंतुलन या अनुचित मूल्य वृद्धि की स्थिति पाई जाती है, तो नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई की जानी चाहिए।
MSME के लिए तत्काल राहत की मांग
IBA ने उत्तर प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन और जिला उद्योग केंद्र के समक्ष कई मांगें रखी हैं। इनमें प्रमुख रूप से ITC रिफंड की प्रक्रिया को सरल, समयबद्ध और पारदर्शी बनाना, लंबित मामलों के निस्तारण के लिए विशेष शिविर आयोजित करना तथा MSME इकाइयों को कार्यशील पूंजी के संकट से राहत दिलाने के लिए विशेष उपाय शामिल हैं।
एसोसिएशन ने ब्याज अनुदान, कार्यशील पूंजी सहायता और अन्य नीतिगत सहयोग उपलब्ध कराने की भी मांग की है, ताकि बढ़ती इनपुट लागत के बीच छोटी औद्योगिक इकाइयों को कारोबार जारी रखने में सहायता मिल सके।
रोजगार पर भी पड़ सकता है असर
MSME क्षेत्र का संकट केवल उद्योग मालिकों तक सीमित नहीं रहता। छोटी और मध्यम औद्योगिक इकाइयाँ बड़ी संख्या में श्रमिकों और स्थानीय सेवा प्रदाताओं को रोजगार देती हैं। यदि उत्पादन लागत लगातार बढ़ती रही और इकाइयों की नकदी स्थिति कमजोर होती गई, तो इसका असर उत्पादन क्षमता और रोजगार दोनों पर पड़ने की आशंका है।
अमित कुमार उपाध्याय ने कहा कि MSME उद्योग देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था और रोजगार व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसलिए कच्चे माल की कीमतों में तेज वृद्धि, ITC में पूंजी के फंसने और कार्यशील पूंजी की कमी को केवल कारोबारी समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाने से उद्योगों को स्थिरता मिल सकती है और उत्पादन एवं रोजगार पर पड़ने वाले संभावित दबाव को कम किया जा सकता है।
IBA अध्यक्ष का संदेश
अमित कुमार उपाध्याय ने कहा, “MSME उद्योग केवल व्यापार नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका और देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव हैं। यदि समय रहते प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया गया तो अनेक इकाइयों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है, जिसका प्रभाव रोजगार, निवेश और औद्योगिक विकास पर पड़ेगा। सरकार एवं प्रशासन को इस गंभीर विषय पर तत्काल ठोस और प्रभावी कदम उठाने चाहिए।”



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