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मंच पर चेहरे वही, दरी पर कार्यकर्ता नए—सपा में प्रतिनिधित्व पर उठे सवाल

व्यंग्य: "PDA में 'P' और 'D' तो दिखे, 'A' रास्ते में कहीं खो गया?"
रिपोर्ट: मौहम्मद इल्यास 'दनकौरी'
ग्रेटर नोएडा | व्यंग्य विशेष
समाजवादी पार्टी की पीडीए परिवर्तन यात्रा इन दिनों गौतमबुद्ध नगर की सड़कों पर दौड़ रही है। साइकिल के पहिए तो तेजी से घूम रहे हैं, लेकिन लगता है कि प्रतिनिधित्व का पहिया कहीं पंक्चर हो गया है। कम से कम पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय खान (एडवोकेट) का पत्र पढ़कर तो यही एहसास होता है।
दो दशक तक पार्टी का झंडा उठाने वाले संजय खान अब पूछ रहे हैं कि "क्या हमारी भूमिका सिर्फ भीड़ बढ़ाने, नारे लगाने और दरी बिछाने तक ही सीमित है?" सवाल सीधा है, लेकिन जवाब शायद मंच पर मौजूद कुर्सियों की तरह पहले से आरक्षित है।
कहते हैं कि PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। लेकिन यदि पत्र में लगाए गए आरोप सही हैं, तो गौतमबुद्ध नगर की राजनीति में शायद इसका नया अर्थ बन गया है—"पोस्टर, डिस्प्ले और आयोजन"। मंच पर वही परिचित चेहरे, वही भाषण और वही तस्वीरें... जबकि वर्षों से संगठन की धूल फांकने वाले कार्यकर्ता नीचे से मंच की ओर देखते रह जाते हैं।
संजय खान ने अपने पत्र में 20 वर्षों की राजनीतिक यात्रा का हवाला दिया है। छात्र सभा से लेकर अधिवक्ता सभा तक संगठन की सीढ़ियां चढ़ीं, आंदोलन किए, संघर्ष किए। लेकिन अब उन्हें लगता है कि पार्टी में वरिष्ठता का पैमाना संघर्ष नहीं, बल्कि मंच तक पहुंच का रास्ता है।
राजनीतिक गलियारों में लोग चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि कुछ नेताओं के लिए पार्टी का मंच ऐसा वीआईपी लाउंज बन गया है, जहां एंट्री पास कुछ चुनिंदा लोगों के पास ही है। बाकी कार्यकर्ता लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रमाण बनकर भीड़ में हाथ हिलाते रह जाते हैं।
व्यंग्य तो यह भी है कि जिस पार्टी की पहचान सामाजिक न्याय और भागीदारी की राजनीति से रही है, उसी पार्टी में अब कार्यकर्ता पूछ रहे हैं—"साहब, हमारी बारी कब आएगी?"
पत्र में राष्ट्रीय नेतृत्व से शिकायत की गई है कि अल्पसंख्यक नेताओं को मंच, पोस्टर और निर्णय प्रक्रिया में उचित स्थान नहीं मिल रहा। यदि ऐसा है, तो सवाल केवल एक वर्ग का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक दर्शन का भी है, जिसकी बुनियाद साझी भागीदारी पर रखी गई थी।
अब देखने वाली बात यह होगी कि यह पत्र लखनऊ तक पहुंचकर फाइलों में दब जाता है या फिर संगठन के भीतर आत्ममंथन की वजह बनता है। क्योंकि राजनीति में कार्यकर्ता की नाराजगी अक्सर भाषणों से नहीं, सम्मान से दूर होती है।
अंत में एक हल्का-फुल्का राजनीतिक तंज—
"साइकिल तो सबकी है, लेकिन हैंडल किसके हाथ में रहेगा, असली लड़ाई शायद वहीं से शुरू होती है।"


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