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शिलापट्ट से गायब नाम, पर आसमान में दर्ज पहचान: जेवर की राजनीति का ‘एयरबोर्न’ अध्याय”


संपादकीय | “शिलापट्ट से गायब नाम, पर आसमान में दर्ज पहचान: जेवर की राजनीति का ‘एयरबोर्न’ अध्याय”
भारतीय राजनीति में श्रेय की अपनी एक अलग अर्थव्यवस्था होती है—यहाँ काम जितना ज़रूरी नहीं, उतना ज़रूरी है कि उस काम के साथ आपका नाम कितनी मजबूती से जुड़ता है। और अगर नाम कहीं छूट जाए, तो उसे वापस जोड़ने के भी अपने-अपने हुनर होते हैं। जेवर के विधायक धीरेंद्र सिंह इस कला में धीरे-धीरे एक अलग पहचान बना चुके हैं।
धीरेंद्र सिंह की राजनीतिक शैली कुछ ऐसी है कि जहाँ कहानी ठहरती दिखे, वहाँ से उनकी सक्रियता शुरू हो जाती है। पहली बार विधायक बनते ही अपनी तनख्वाह का चेक सरकार को लौटाना कोई साधारण कदम नहीं था; यह एक संदेश था—और राजनीति में संदेश अक्सर काम से कहीं ज्यादा दूर तक जाता है। तब से लेकर अब तक, वह समय-समय पर ऐसे प्रसंग गढ़ते रहे हैं, जो उन्हें चर्चा के केंद्र में बनाए रखते हैं।
नोएडा इंटरनेशनल जेवर एयरपोर्ट की कहानी भी कुछ ऐसी ही बहुस्तरीय गाथा है। यह परियोजना कभी मथुरा और अलवर की ओर झुकती दिखी, तो कभी फाइलों में उलझी रही। इस पूरी प्रक्रिया में गौतम बुद्ध नगर के सांसद डॉ. महेश शर्मा की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, जिन्होंने इस परियोजना को नीति-निर्माण के स्तर पर दिशा दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद इस परियोजना को नई गति मिली। केंद्र और राज्य—दोनों से स्वीकृति मिली, लेकिन असली चुनौती जमीन पर थी। किसानों की सहमति के बिना यह सपना साकार होना संभव नहीं था। विरोध भी हुआ, आशंकाएँ भी उठीं, और कई तरह की बातें भी फैलाई गईं।
यहीं पर धीरेंद्र सिंह की भूमिका सामने आती है। उन्होंने किसानों के बीच जाकर संवाद स्थापित किया, उन्हें भरोसा दिलाया और सीधे मुख्यमंत्री से मिलवाने का रास्ता तैयार किया। यह सिर्फ राजनीतिक पहल नहीं थी, बल्कि विश्वास निर्माण की प्रक्रिया भी थी। धीरे-धीरे किसान सहमत हुए और यही सहमति इस परियोजना की सबसे बड़ी नींव साबित हुई।
28 मार्च 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एयरपोर्ट का उद्घाटन हुआ। मंच सजा, उपलब्धियों का उल्लेख हुआ और शिलापट्ट भी लगा। लेकिन इसी बीच एक चर्चा ने जन्म लिया—शिलापट्ट पर धीरेंद्र सिंह का नाम नहीं था। राजनीति में ऐसे क्षण अक्सर असहजता पैदा करते हैं, लेकिन यहाँ कहानी ने एक अलग मोड़ लिया।
15 जून 2026 को पहली उड़ान के दिन धीरेंद्र सिंह ने एक अलग ही संदेश दिया। उन्होंने एयरपोर्ट के लिए जमीन देने वाले किसानों को हवाई यात्रा कराकर लखनऊ पहुँचाया और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनकी सीधी मुलाकात कराई। यह पहल सिर्फ एक आयोजन नहीं थी, बल्कि एक प्रतीक थी—कि विकास की कहानी में असली भागीदारी किन लोगों की है।
यही वह क्षण था जिसने पूरे घटनाक्रम को एक नए दृष्टिकोण से देखने पर मजबूर किया। जहाँ एक ओर नाम शिलापट्ट पर दर्ज होने की चर्चा थी, वहीं दूसरी ओर यह दृश्य था जिसमें किसान, जिनकी जमीन पर यह परियोजना खड़ी हुई, स्वयं उस विकास का अनुभव कर रहे थे।
राजनीति में अक्सर श्रेय को लेकर होड़ रहती है, लेकिन कभी-कभी कुछ कदम ऐसे होते हैं जो औपचारिक मान्यता से आगे निकल जाते हैं। धीरेंद्र सिंह का यह प्रयास उसी श्रेणी में रखा जा सकता है—जहाँ नाम से ज्यादा काम और प्रतीकात्मकता चर्चा में आ जाती है।
जेवर एयरपोर्ट की यह कहानी अभी जारी है। आने वाले समय में इसके कई और आयाम सामने आएंगे, कई और दावे होंगे। लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि इस पूरे घटनाक्रम में धीरेंद्र सिंह ने अपनी अलग उपस्थिति दर्ज कराई है—चाहे वह शिलापट्ट पर दिखे या जनमानस में।
मौहम्मद इल्यास ‘दनकौरी’
संपादक, विजन लाइव
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