BRAKING NEWS

6/recent/ticker-posts

लोकतंत्र में निर्णय जनोन्माद से नहीं, संविधान और तथ्यों से होने चाहिए


— डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी नींव संविधान, विधि के शासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा पर आधारित है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके निर्णय भावनाओं, राजनीतिक दबाव अथवा क्षणिक जनाक्रोश के बजाय तथ्यों, संवैधानिक प्रक्रियाओं और विधिसम्मत जांच के आधार पर लिए जाएँ। हाल के घटनाक्रम में केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लोकतांत्रिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है। यह घटना केवल एक व्यक्ति या पद से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह इस प्रश्न को भी सामने लाती है कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में निर्णयों का आधार क्या होना चाहिए।
मेरे लिए श्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा अत्यंत वेदनापूर्ण है। किसी भी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति के कार्यों, निर्णयों और उत्तरदायित्व का मूल्यांकन निष्पक्ष तथ्यों, प्रमाणित साक्ष्यों और निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए। यदि किसी भी मंत्री अथवा सार्वजनिक पदाधिकारी के भविष्य का निर्धारण केवल राजनीतिक दबाव, सड़क पर हुए प्रदर्शन अथवा जनभावनाओं के आधार पर होने लगे, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिरता और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है।
श्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने कार्यकाल के दौरान भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अधिक आधुनिक, समावेशी, अनुसंधान-केंद्रित और प्रौद्योगिकी-सक्षम बनाने की दिशा में अनेक महत्वपूर्ण पहल कीं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन, उच्च शिक्षा में सुधार, डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने तथा वैश्विक मानकों के अनुरूप शिक्षा प्रणाली विकसित करने के प्रयास उनके कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियों के रूप में देखे जाते हैं। किसी भी बड़े सुधार कार्यक्रम की तरह इन प्रयासों पर मतभेद और आलोचनाएँ भी स्वाभाविक हैं।
लोकतंत्र में असहमति केवल स्वीकार्य ही नहीं, बल्कि आवश्यक भी है। स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों, छात्रों, शिक्षकों और विभिन्न संगठनों को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। किंतु असहमति का समाधान संविधान द्वारा निर्धारित संस्थागत प्रक्रियाओं, न्यायिक व्यवस्था, संसदीय विमर्श और संवाद के माध्यम से होना चाहिए। यदि जनदबाव ही शासन के निर्णयों का प्रमुख आधार बन जाए, तो इससे संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
लोकतंत्र का अर्थ केवल विरोध या समर्थन नहीं है, बल्कि यह उत्तरदायित्व, संतुलन और संवैधानिक मर्यादा का भी नाम है। सरकारों की नीतियों की समीक्षा होनी चाहिए, निर्णयों की आलोचना भी होनी चाहिए, लेकिन यह सब विधिसम्मत और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर होना आवश्यक है। यही परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है।
यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी लोकतांत्रिक परिस्थिति का लाभ राष्ट्रविरोधी, विघटनकारी अथवा अराजक तत्व न उठा सकें। लोकतांत्रिक आंदोलनों की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब वे शांतिपूर्ण, संवैधानिक और जिम्मेदार तरीके से संचालित हों। प्रत्येक राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और नागरिक का दायित्व है कि वह राष्ट्रहित, सामाजिक समरसता और संविधान की सर्वोच्चता को सर्वोपरि रखे।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इसकी सबसे बड़ी शक्ति इसकी संस्थाएँ, संविधान और विधि का शासन हैं। लोकतंत्र भीड़ के शोर से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण निर्णयों, निष्पक्ष संस्थाओं, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों से मजबूत होता है। इसलिए किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी के संबंध में निर्णय लेते समय न्याय, तथ्य, विधिक प्रक्रिया और राष्ट्रहित—इन सभी सिद्धांतों का समान रूप से पालन किया जाना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम लोकतंत्र को केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के रूप में न देखें, बल्कि उसे संवैधानिक मूल्यों, संस्थागत गरिमा और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की दृष्टि से भी समझें। लोकतंत्र तभी सशक्त रहेगा जब प्रत्येक नागरिक, प्रत्येक राजनीतिक दल और प्रत्येक सार्वजनिक संस्था संविधान की मर्यादा का सम्मान करते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन करेगी।
अंततः, भारत का लोकतंत्र तभी और अधिक मजबूत होगा जब प्रत्येक निर्णय निष्पक्ष तथ्यों, विधिसम्मत प्रक्रिया, संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रहित के आधार पर लिया जाएगा। यही लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा है और यही एक सशक्त, उत्तरदायी एवं समावेशी भारत की पहचान भी है।
राष्ट्र सर्वोपरि है, संविधान सर्वोच्च है और लोकतंत्र की गरिमा अक्षुण्ण रहनी चाहिए।
लेखक परिचय
डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा
मीडिया एवं जनसंपर्क विशेषज्ञ
भारतीय जनता पार्टी, ग्रेटर नोएडा
जनपद गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश
डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा मीडिया संचार, जनसंपर्क, राजनीतिक संवाद, सामाजिक विमर्श और लोकनीति से जुड़े विषयों के अध्येता एवं वक्ता हैं। वे विभिन्न सामाजिक, राष्ट्रीय और समसामयिक विषयों पर नियमित रूप से लेखन करते हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों, सुशासन, राष्ट्रहित, जनसंचार तथा सार्वजनिक नीति से जुड़े विषयों पर उनके विचार विभिन्न समाचार पत्रों, डिजिटल मीडिया मंचों एवं सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं।
कानूनी डिस्क्लेमर
अस्वीकरण (Disclaimer):
इस लेख में व्यक्त विचार पूर्णतः लेखक के व्यक्तिगत एवं वैचारिक दृष्टिकोण हैं। इनका उद्देश्य लोकतांत्रिक विमर्श, संवैधानिक मूल्यों तथा समसामयिक सार्वजनिक विषयों पर विचार प्रस्तुत करना है। इस लेख में उल्लिखित टिप्पणियाँ किसी न्यायिक निष्कर्ष, आधिकारिक सरकारी घोषणा अथवा किसी संवैधानिक संस्था के अधिकृत मत का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। लेख में वर्णित घटनाओं और सार्वजनिक व्यक्तियों से संबंधित संदर्भ उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं एवं लेखक के विश्लेषण पर आधारित हैं। पाठकों से अपेक्षा है कि वे किसी भी विषय पर अंतिम निष्कर्ष हेतु संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों, सरकारी अभिलेखों एवं सक्षम प्राधिकारियों द्वारा जारी सूचनाओं का भी अवलोकन करें। यह लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भावना के अनुरूप एक वैचारिक लेख के रूप में प्रस्तुत किया गया है।


.header-ads img { height:300px !important; max-height:300px !important; width:150% !important; object-fit:cover; }