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वीर अब्दुल हमीद: उत्तर प्रदेश की वीरभूमि का एक और अमर सपूत

यह रहा भाग–3 (समापन)। इसमें राष्ट्रीय एकता का संदेश, वीर अब्दुल हमीद का उल्लेख, लेखक का निष्कर्ष तथा कानूनी डिस्क्लेमर शामिल है।
चौधरी शौकत अली चेची

उत्तर प्रदेश की धरती ने देश को अनेक ऐसे वीर सैनिक दिए हैं जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान के बाद यदि किसी मुस्लिम सैनिक का नाम भारतीय सैन्य इतिहास में सर्वोच्च सम्मान के साथ लिया जाता है, तो वह हैं कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद, परमवीर चक्र।

गाजीपुर जनपद के धामूपुर गाँव में 1 जुलाई 1933 को जन्मे अब्दुल हमीद ने 27 दिसंबर 1954 को भारतीय सेना की 4 ग्रेनेडियर्स बटालियन में भर्ती होकर देशसेवा का मार्ग चुना। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में भी उन्होंने अपनी सेवाएँ दीं, किंतु उनका सर्वोच्च पराक्रम 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में देखने को मिला।

खेमकरण सेक्टर के असल उत्तर क्षेत्र में पाकिस्तान ने अत्याधुनिक अमेरिकी पैटन टैंकों के साथ भीषण हमला किया। उस समय अब्दुल हमीद ने अपनी रिकॉयललेस गन से दुश्मन के कई पैटन टैंकों को ध्वस्त कर दिया। इसी अद्भुत वीरता के दौरान 10 सितंबर 1965 को वे मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके अप्रतिम साहस के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया।

ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान और वीर अब्दुल हमीद दोनों इस सत्य के जीवंत उदाहरण हैं कि भारतीय सैनिक की पहली और अंतिम पहचान उसका राष्ट्रधर्म है। उसकी वर्दी का रंग केवल तिरंगे की शान और भारत की सुरक्षा के लिए होता है।

राष्ट्रीय एकता का अमर संदेश

ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची देशभक्ति किसी धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र की सीमाओं में नहीं बंधती। भारत की सेना सदैव विविधता में एकता की मिसाल रही है, जहाँ हर सैनिक संविधान की शपथ लेकर राष्ट्र की रक्षा करता है।

देश के विभाजन के कठिन दौर में भी उन्होंने अपने कर्तव्य, ईमानदारी और राष्ट्रनिष्ठा को सर्वोपरि रखा। उन्होंने यह सिद्ध किया कि किसी भी नागरिक की निष्ठा का मूल्यांकन उसके धर्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म, चरित्र और राष्ट्र के प्रति समर्पण से होना चाहिए।

आज जब समाज को समय-समय पर विभाजनकारी सोच से चुनौती मिलती है, तब ब्रिगेडियर उस्मान जैसे महापुरुषों का जीवन हमें आपसी विश्वास, भाईचारे और राष्ट्रीय एकता का मार्ग दिखाता है। उनका बलिदान हर भारतीय के लिए प्रेरणा है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य विरासत भी।

श्रद्धांजलि

ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान की 114वीं जयंती पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि एवं ख़िराज-ए-अकीदत।

भारत माँ के इस अमर सपूत ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि देश की सेवा सबसे बड़ा धर्म है और मातृभूमि की रक्षा से बढ़कर कोई कर्तव्य नहीं।

"ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी,
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुर्बानी।"

जय हिंद।
जय जवान, जय किसान।
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लेखक परिचय

चौधरी शौकत अली चेची सामाजिक सरोकारों, इतिहास, राष्ट्रीय एकता, संवैधानिक मूल्यों तथा समसामयिक विषयों पर लेखन करने वाले स्वतंत्र लेखक एवं चिंतक हैं। उनके लेख विभिन्न समाचार पत्रों, समाचार पोर्टलों और सामाजिक मंचों पर प्रकाशित होते रहते हैं। वे सामाजिक सौहार्द, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रहित से जुड़े विषयों पर निरंतर सक्रिय रहते हैं।

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कानूनी डिस्क्लेमर

यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों, सैन्य साहित्य, प्रकाशित पुस्तकों, समाचार रिपोर्टों तथा प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर तैयार किया गया है। जिन प्रसंगों पर इतिहासकारों के बीच मतभेद या विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, उन्हें यथासंभव संतुलित रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। लेखक एवं प्रकाशक का उद्देश्य किसी धर्म, समुदाय, संस्था या व्यक्ति की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि भारत के एक महान सैनिक के जीवन, योगदान और बलिदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण करना है। यदि किसी तथ्य में अद्यतन शोध या आधिकारिक अभिलेखों के आधार पर भिन्न जानकारी उपलब्ध हो, तो उसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।यह तीनों भाग मिलाकर एक विस्तृत, प्रकाशन-योग्य फीचर लेख तैयार हो जाता है।
 
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