BRAKING NEWS

6/recent/ticker-posts

भाग-2:-- नौशेरा की रक्षा और 'नौशेरा का शेर' बनने की गाथा

यह रहा भाग–2। इसमें नौशेरा की लड़ाई, झंगर की पुनर्विजय, ब्रिगेडियर उस्मान का नेतृत्व, शहादत और राष्ट्रीय सम्मान का वर्णन है।

चौधरी शौकत अली चेची 
1947–48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जम्मू-कश्मीर का नौशेरा और झंगर क्षेत्र भारतीय सेना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावरों तथा पाकिस्तानी सैनिकों का उद्देश्य इन क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर कश्मीर में अपनी स्थिति मजबूत करना था। भारतीय सेना के सामने चुनौती केवल सीमा की रक्षा की नहीं, बल्कि नवस्वतंत्र भारत की संप्रभुता और सम्मान की भी थी।
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को 50 (इंडिपेंडेंट) पैरा ब्रिगेड की कमान सौंपी गई। उस समय परिस्थितियाँ बेहद कठिन थीं। सीमित संसाधन, दुर्गम भौगोलिक क्षेत्र और लगातार हो रहे हमलों के बावजूद उन्होंने अपने सैनिकों का मनोबल कभी टूटने नहीं दिया।
प्रारंभिक संघर्षों में झंगर पर दुश्मन का कब्ज़ा हो गया। यह भारतीय सेना के लिए बड़ा झटका था। इस घटना के बाद अनेक प्रकार की चर्चाएँ और अफवाहें भी फैलने लगीं। विभाजन के तत्काल बाद का समय होने के कारण समाज में अविश्वास का वातावरण था और कुछ लोगों ने उनकी निष्ठा पर भी प्रश्न उठाने का प्रयास किया। किंतु ब्रिगेडियर उस्मान ने इन चर्चाओं का उत्तर शब्दों से नहीं, बल्कि अपने नेतृत्व, अनुशासन और रणकौशल से दिया।
लोकप्रिय सैन्य विवरणों के अनुसार उन्होंने अपने साथियों का मनोबल बढ़ाने के लिए यह संकल्प लिया कि जब तक झंगर पुनः भारतीय सेना के नियंत्रण में नहीं आ जाता, तब तक वे आरामदायक बिस्तर पर नहीं सोएंगे। उनका पूरा ध्यान केवल मिशन की सफलता पर था। वे सैनिकों के बीच रहते, उनका उत्साह बढ़ाते और हर कठिनाई में स्वयं सबसे आगे दिखाई देते थे।
उन्होंने अपनी ब्रिगेड में अनुशासन, पारस्परिक विश्वास और राष्ट्रभक्ति की भावना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। सैनिकों से उनका व्यवहार एक कमांडर से अधिक एक संरक्षक जैसा था। यही कारण था कि उनके नेतृत्व में सैनिक असाधारण साहस के साथ युद्ध लड़ते रहे।
झंगर की पुनर्विजय और दुश्मन की निराशा
रणनीतिक योजना और अदम्य साहस के साथ भारतीय सेना ने पुनः आक्रमण किया। भीषण संघर्ष के बाद झंगर पर भारतीय सेना ने दोबारा नियंत्रण स्थापित कर लिया। यह विजय केवल सैन्य सफलता नहीं थी, बल्कि पूरे देश के लिए आत्मविश्वास का प्रतीक बन गई।
नौशेरा सेक्टर में दुश्मन के लगातार हमलों को विफल करने और झंगर की पुनर्प्राप्ति में उनके निर्णायक योगदान के कारण उन्हें पूरे देश में "नौशेरा का शेर" कहा जाने लगा। उनकी वीरता से पाकिस्तान इतना विचलित हुआ कि विभिन्न ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उनके सिर पर 50,000 रुपये का इनाम घोषित किया गया था, जो उस समय बहुत बड़ी राशि मानी जाती थी।
शहादत जिसने इतिहास रच दिया
झंगर की पुनर्विजय के बाद भी ब्रिगेडियर उस्मान अग्रिम मोर्चे पर सक्रिय रहे। 3 जुलाई 1948 को वे अग्रिम चौकियों का निरीक्षण कर रहे थे। इसी दौरान दुश्मन की भारी गोलाबारी शुरू हो गई। एक गोला उनके निकट आकर फटा और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। मातृभूमि की रक्षा करते हुए उन्होंने वहीं वीरगति प्राप्त की।
महज़ 35 वर्ष की आयु में देश ने अपने सबसे बहादुर सैन्य अधिकारियों में से एक को खो दिया। वे 1947–48 के कश्मीर युद्ध में शहीद होने वाले भारतीय सेना के सबसे वरिष्ठ अधिकारियों में गिने जाते हैं।
राष्ट्र ने दी भावभीनी विदाई
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का पार्थिव शरीर दिल्ली लाया गया, जहाँ उन्हें पूर्ण सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य तथा तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबैटन सहित अनेक सैन्य और राजनीतिक हस्तियाँ उनकी अंतिम यात्रा में उपस्थित रहीं।
राष्ट्र ने उनके सर्वोच्च बलिदान को नमन करते हुए उन्हें मरणोपरांत "महावीर चक्र" से सम्मानित किया, जो भारत का दूसरा सर्वोच्च वीरता पुरस्कार है।
सादगी, सेवा और मानवीय संवेदनाएँ
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का जीवन केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं था। वे अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। उन्होंने विवाह नहीं किया और अपना अधिकांश समय सेना तथा राष्ट्र की सेवा को समर्पित किया। विभिन्न विवरणों के अनुसार वे अपने वेतन का बड़ा हिस्सा जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा और गरीबों की सहायता में खर्च करते थे। उनका मानना था कि एक सैनिक का दायित्व केवल सीमा की रक्षा करना नहीं, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील रहना भी है।
आज भी भारतीय सेना और देशवासी उन्हें केवल एक वीर सैनिक के रूप में नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी, त्याग और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में याद करते हैं।
�⁠अगले **भाग–3** में लेखक का संदेश, �⁠वीर अब्दुल हमीद का प्रेरक संदर्भ, �⁠राष्ट्रीय एकता पर विचार, �⁠कब्र से जुड़ी घटना का संतुलित उल्लेख तथा �⁠**कानूनी डिस्क्लेमर सहित प्रकाशन-योग्य समापन** प्रस्तुत किया जाएगा।
.header-ads img { height:300px !important; max-height:300px !important; width:150% !important; object-fit:cover; }