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“जहाँ प्रेम ही परमात्मा है : पुरुषोत्तम मास की ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा का अलौकिक महोत्सव”


ब्रजरज में भीगे लाखों चरण, राधे-श्याम के नाम से गूँजा ब्रजमंडल, सेवा-भक्ति और समर्पण की अविरल धारा ने रचा आध्यात्मिक इतिहास।
भगवत प्रसाद शर्मा की कलम ✍️ से
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ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा : जहाँ धूल भी भक्ति है, आँसू भी साधना हैं और प्रेम ही परमात्मा है
“ब्रज कोई भूमि नहीं, ब्रज तो भगवान के हृदय की धड़कन है।”
पुरुषोत्तम मास की पावन बेला में सम्पन्न हुई ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा के गहन जागरण का महोत्सव है। 15 जून को इस एक माह तक चलने वाली दिव्य यात्रा के पूर्ण होने के साथ ही लाखों श्रद्धालुओं के हृदय भाव-विभोर हो उठे। किसी की आँखें नम थीं, तो किसी के होंठों पर बस एक ही पुकार—
“हे राधे! हे श्याम! फिर कब बुलाओगे?”
ब्रज की परिक्रमा भले ही समाप्त हो जाए, किन्तु उसका भाव कभी समाप्त नहीं होता। यहाँ से लौटने वाला हर यात्री अपने साथ केवल स्मृतियाँ नहीं, बल्कि ब्रजरज की पवित्रता, कान्हा की बाँसुरी की अनुगूँज और राधारानी की कृपा का अमृत लेकर जाता है।
ब्रज—जहाँ ईश्वर भी प्रेम के सामने नतमस्तक हैं
संसार में अनगिनत तीर्थ हैं जहाँ मनुष्य भगवान की खोज में जाता है, पर ब्रज वह अद्वितीय भूमि है जहाँ स्वयं भगवान प्रेम की खोज में विचरते प्रतीत होते हैं।
यही वह पावन धरा है—
जहाँ अनंत ब्रह्माण्डों के स्वामी श्रीकृष्ण, यशोदा मैया की डाँट से भयभीत हो जाते हैं।
जहाँ परमब्रह्म माखन चुराकर बाल-सुलभ लीलाएँ करते हैं।
जहाँ सर्वशक्तिमान भगवान ग्वालबालों के संग धूल में खेलते हैं।
और जहाँ श्रीराधा के निष्कलुष प्रेम के आगे स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने को ऋणी मानते हैं।
इसीलिए संतों ने कहा है—
“तीर्थ अनेक, पर ब्रज अनूप।
यहाँ प्रेम ही परम स्वरूप॥”
ब्रजरज की महिमा : धूल नहीं, दिव्यता का स्पर्श
ब्रजवासियों के लिए ब्रज की धूल मात्र मिट्टी नहीं, बल्कि दिव्यता का सजीव प्रतीक है।
यह वही रज है—
जो नन्दलाल के चरणों से पवित्र हुई,
जिसमें राधारानी की पायलें झनकीं,
और जिसमें गोपियों के प्रेमाश्रु समाहित हैं।
जब श्रद्धालु नंगे पाँव इस रज पर चलते हैं, तो वे केवल यात्रा नहीं करते, वे अपने अहंकार का विसर्जन करते हैं।
“ब्रज की रज मस्तक चढ़े, मिट जाए अभिमान।
राधा नाम हृदय बसे, मिल जाए भगवान॥”
एक माह तक बहती रही भक्ति की गंगा
इस वर्ष की परिक्रमा ने ब्रज को मानो जीवंत कर दिया। हर दिशा में भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला—
प्रातःकाल मंगला आरती की गूँज
“राधे-राधे” का अखण्ड उच्चारण
संकीर्तन, भागवत कथा और सत्संग
भजन मंडलियों की मधुर स्वर-लहरियाँ
साथ ही सेवा की ऐसी अद्भुत मिसालें देखने को मिलीं—
कहीं थके यात्रियों के चरण धोते ब्रजवासी
कहीं जलसेवा और भंडारे
कहीं वृद्धों के डगमगाते कदमों को सहारा
कहीं छोटे-छोटे बच्चों का स्वागत
ऐसा प्रतीत होता था मानो सम्पूर्ण ब्रजभूमि स्वयं श्रद्धालुओं को अपनी गोद में लेकर चल रही हो।
दिव्यांग श्रद्धालुओं की अटूट आस्था
इस परिक्रमा का सबसे भावुक कर देने वाला दृश्य दिव्यांग श्रद्धालुओं की अदम्य आस्था थी।
शारीरिक सीमाओं के बावजूद उनका संकल्प अडिग था—
किसी के कदम कमजोर थे, पर विश्वास अटल था
किसी की दृष्टि धुंधली थी, पर भक्ति उज्ज्वल थी
किसी का शरीर थक गया, पर “राधे-राधे” का नाम उन्हें आगे बढ़ाता रहा
यह अनुभव कराता है कि ब्रज तक पहुँचने का मार्ग पैरों से नहीं, श्रद्धा से तय होता है।
ब्रजवासियों का सेवा धर्म : संस्कृति की आत्मा
ब्रज की पहचान केवल उसके मंदिर नहीं, बल्कि उसके लोग हैं।
यहाँ सेवा कोई कर्तव्य नहीं, बल्कि स्वभाव है।
ब्रजवासी श्रद्धालुओं में अतिथि नहीं, ठाकुरजी का स्वरूप देखते हैं—
कोई जल पिलाता है
कोई भोजन कराता है
कोई विश्राम कराता है
कोई दवा देता है
और कोई “राधे-राधे” कहकर थके मन को ऊर्जा दे देता है
ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा का आध्यात्मिक रहस्य
मान्यता है कि जीव 84 लाख योनियों में भटकता है।
ब्रज की 84 कोस परिक्रमा इन बंधनों से मुक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
यह परिक्रमा—
दूरी नहीं, आत्मा की यात्रा है
थकान नहीं, तपस्या है
कदम नहीं, समर्पण है
और साधारण यात्रा नहीं, प्रेम का उत्सव है
जब परिक्रमा पूर्ण होती है…
एक माह की कठिन यात्रा के बाद जब श्रद्धालु परिक्रमा पूर्ण करता है, तो उसके चेहरे पर थकान के साथ अद्भुत शांति भी होती है।
उसे लगता है—
जीवन का अधूरा अध्याय पूर्ण हो गया
भीतर का बोझ उतर गया
राधारानी की कृपा प्राप्त हुई
उस समय बहने वाले आँसू दुःख के नहीं, बल्कि ब्रज-वियोग के होते हैं।
ब्रज का अंतिम संदेश : प्रेम ही मार्ग है
ब्रज हमें सिखाता है—
भगवान को ज्ञान से नहीं, प्रेम से पाया जाता है
विद्वता से अधिक महत्त्व सरलता का है
वैभव से अधिक महत्त्व सेवा का है
अधिकार से अधिक महत्त्व समर्पण का है
“वैदिक ज्ञान जहाँ रुक जाता है,
वहीं से ब्रज का प्रेम प्रारम्भ होता है।”
समापन : ब्रज आज भी जीवित है
पुरुषोत्तम मास की इस पावन चौरासी कोस परिक्रमा के पूर्ण होने पर ब्रजभूमि, ब्रजरज, संत-महात्माओं, ब्रजवासियों और लाखों श्रद्धालुओं को कोटि-कोटि प्रणाम।
कि कलियुग में भी प्रेम जीवित है,
श्रद्धा जीवित है,
और ब्रज आज भी जीवित है।
जय जय श्री राधे।
जय जय श्री श्याम।
जय ब्रजधाम।
लेखक परिचय ✍️
भगवत प्रसाद शर्मा (बृजवासी)
मीडिया एक्जीक्यूटिव एवं स्वतंत्र लेखक
मूल निवास: ग्राम खाम्बी (खम्बवन), ब्रज क्षेत्र
वर्तमान में: ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा यात्रा में सक्रिय सहभाग
भगवत प्रसाद शर्मा सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक विषयों पर सक्रिय लेखन करते हैं। विशेष रूप से ब्रज संस्कृति, श्रीकृष्ण भक्ति और सनातन परंपराओं पर उनकी गहरी पकड़ है। उनके लेखों में आस्था, अनुभव और संवेदनाओं का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है, जो पाठकों को सीधे आध्यात्मिक अनुभूति से जोड़ता है।
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