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दनकौर शरीफ में सूफियाना रंग में डूबा 82वां सालाना उर्स मुबारक, इबादत, मोहब्बत और भाईचारे का उमड़ा सैलाब


मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ गौतमबुद्धनगर
दनकौर शरीफ स्थित हजरत ख्वाजा लुत्फुल्लाह शाह चिश्ती निजामी रहमतुल्लाह अलैह का 82वां सालाना उर्स मुबारक इस वर्ष भी पूरे शानो-शौकत, अकीदत और रूहानी माहौल के साथ मनाया जा रहा है। तीन दिवसीय इस उर्स मुकद्दस ने न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र बनाया, बल्कि सूफी परंपरा, गंगा-जमुनी तहजीब और सामाजिक एकता का अद्भुत संगम भी प्रस्तुत किया।
दरगाह परिसर को खास तौर पर सजाया गया, जहां रंग-बिरंगी रोशनी, चादरपोशी और इत्र की खुशबू से माहौल पूरी तरह आध्यात्मिक बना रहा। जैसे ही उर्स की रस्मों की शुरुआत हुई, वैसे ही देश के अलग-अलग हिस्सों—उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान सहित दूर-दराज के इलाकों से जायरीन बड़ी संख्या में यहां पहुंचने लगे। हर कोई अपने दिल में मन्नत और दुआ लेकर ख्वाजा के दरबार में हाजिरी देने आया।
कव्वालियों की गूंज से महका दनकौर शरीफ
2 जून 2026 की रात्रि को उर्स के दूसरे दिन आयोजित महफिल-ए-समां ने पूरे आयोजन को अपने चरम पर पहुंचा दिया। मशहूर कव्वालों ने सूफियाना अंदाज में ख्वाजा की शान में कलाम पेश किए—जिसमें इश्क-ए-हकीकी, इंसानियत और खुदा की बंदगी का पैगाम झलकता रहा।
“भर दो झोली मेरी या मोहम्मद” और “ख्वाजा मेरे ख्वाजा” जैसे कलामों पर अकीदतमंद झूम उठे और पूरा माहौल रूहानी कैफियत में डूब गया। देर रात तक चली इस महफिल में लोगों ने पूरी तन्मयता से हिस्सा लिया।
मुख्य अतिथि का सम्मान, परंपरा का निर्वहन
इस मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे गौतम बुद्ध नगर दीवानी एवं फौजदारी बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष उमेश भाटी एडवोकेट का दरगाह के सज्जादानशीन सूफी फजलुर रहमान लुत्फी द्वारा दस्तारबंदी कर सम्मानित किया गया। यह रस्म सूफी परंपरा में सम्मान और आदर का प्रतीक मानी जाती है।
मुख्य अतिथि ने भी इस आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे उर्स समाज में प्रेम, सौहार्द और भाईचारे को मजबूत करते हैं।
कुल शरीफ में उमड़ा आस्था का जनसैलाब
3 जून 2026 को सुबह से ही दरगाह परिसर में भारी भीड़ देखने को मिली। दोपहर 11:00 बजे 82वां सालाना कुल शरीफ अकीदत और अनुशासन के साथ सम्पन्न हुआ। इस दौरान हजारों जायरीन एक साथ दुआ में शामिल हुए और मुल्क की तरक्की, अमन-चैन और खुशहाली के लिए हाथ उठाए।
कुल शरीफ के समय दरगाह परिसर में एक अलौकिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया गया, जिसने हर मौजूद व्यक्ति को भाव-विभोर कर दिया।
लंगर और सेवा की परंपरा
उर्स के दौरान लंगर की व्यवस्था भी विशेष रूप से की गई, जहां सभी धर्मों और वर्गों के लोगों को बिना किसी भेदभाव के भोजन कराया गया। यह परंपरा सूफी संतों की उस शिक्षा को दर्शाती है, जिसमें इंसानियत और सेवा को सर्वोपरि माना गया है।
स्वयंसेवकों ने दिन-रात सेवा में जुटकर जायरीनों को हर संभव सुविधा प्रदान की।
आगे का कार्यक्रम
उर्स के अंतिम चरण में 3 जून की रात्रि को सिलसिला-ए-चिश्तिया के बुजुर्ग हजरत बाबा फिरोजशाह चिश्ती रहमतुल्लाह आलैहि की शान में एक और भव्य महफिल-ए-समां आयोजित की जाएगी।
इसके बाद 4 जून 2026 की सुबह 4:00 बजे 449वां कुल शरीफ अदा किया जाएगा, जिसके साथ यह तीन दिवसीय उर्स मुकद्दस विधिवत सम्पन्न हो जाएगा।
प्रशासन और व्यवस्था
उर्स के दौरान स्थानीय प्रशासन और उर्स कमेटी द्वारा सुरक्षा, ट्रैफिक नियंत्रण, साफ-सफाई और स्वास्थ्य सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा गया। पुलिस बल की तैनाती के साथ-साथ सीसीटीवी निगरानी भी की गई, जिससे आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो रहा है।
विजन लाइव का विश्लेषण
दनकौर शरीफ का उर्स मुबारक आज के समय में सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक बन चुका है। यहां हर वर्ग, हर धर्म और हर तबके के लोग एक साथ इकट्ठा होकर यह संदेश देते हैं कि इंसानियत सबसे बड़ा मजहब है।
ऐसे आयोजन समाज में सकारात्मक ऊर्जा भरते हैं और आपसी भाईचारे को मजबूत करते हैं, जो वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत है।


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