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दनकौर में सूफियाना रंग में डूबा 82वां सालाना उर्स मुकद्दस, तीन दिवसीय आयोजन में आस्था, भाईचारा और संस्कृति का अद्भुत संगम


     मौहम्मद इल्यास-"दनकौरी" /  गौतमबुद्धनगर 
कुतुब-ए-मसाइख, ख्वाजा-ए-ख्वाजगान हजरत मोहम्मद हाजी लुत्फुल्लाह शाह चिश्ती निजामी रहमतुल्लाह अलैहि का 82वां सालाना तीन दिवसीय उर्स मुकद्दस सोमवार 1 जून 2026 से दनकौर स्थित पवित्र दरगाह शरीफ पर पूरे अदब, अहतराम और अकीदत के साथ शुरू हो गया। यह उर्स हर वर्ष की तरह इस बार भी सूफियाना परंपरा, धार्मिक आस्था और गंगा-जमुनी तहजीब की जीवंत मिसाल बनकर सामने आया, जिसमें हजारों की संख्या में अकीदतमंदों ने शिरकत की।
उर्स के शुभारंभ अवसर पर किसान एकता संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी सोरन प्रधान ने रात्रि लगभग 8:00 बजे फीता काटकर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया। इस अवसर पर दरगाह कमेटी, स्थानीय गणमान्य नागरिकों और बड़ी संख्या में उपस्थित जायरीन ने उनका फूल-मालाओं से जोरदार स्वागत किया। दरगाह के सज्जादानशीन सूफी फजलुर रहमान लुत्फी की मौजूदगी में कार्यक्रम को औपचारिक रूप से प्रारंभ किया गया।
अपने संबोधन में चौधरी सोरन प्रधान ने कहा कि सूफी संतों की शिक्षाएं आज भी समाज को प्यार, भाईचारा, सहिष्णुता और इंसानियत का संदेश देती हैं। उन्होंने सभी को उर्स मुबारक की शुभकामनाएं देते हुए अपील की कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से समाज में आपसी सद्भाव को और मजबूत किया जाए।
उर्स के पहले दिन बाद नमाज असर, दुआ खाना दरवेश मंजिल (सराय वाली मस्जिद) से चादर शरीफ का भव्य और अनुशासित जुलूस निकाला गया। जुलूस में शामिल अकीदतमंद हाथों में चादर, फूल और अकीदत के साथ दरगाह की ओर बढ़े। “या ख्वाजा”, “हजरत का दरबार मुबारक” जैसी सदाओं से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। दरगाह पहुंचकर चादरपोशी की रस्म अदा की गई, जहां लोगों ने अपने-अपने घरों और समाज की खुशहाली के लिए दुआएं मांगीं।
रात्रि में मिलाद शरीफ का आयोजन किया गया, जिसमें उलेमा-ए-कराम ने हजरत लुत्फुल्लाह शाह चिश्ती निजामी के जीवन, उनके आध्यात्मिक योगदान और समाज को दिए संदेशों पर विस्तार से प्रकाश डाला। इसके पश्चात महफिल-ए-समा (कव्वाली) का आयोजन हुआ, जो उर्स की विशेष पहचान मानी जाती है।
इस महफिल में मेरठ, फिरोजाबाद और बनारस से आए मशहूर कव्वालों ने सूफियाना कलाम पेश किए। “भर दो झोली मेरी या मोहम्मद”, “ख्वाजा मेरे ख्वाजा” जैसे कलामों पर अकीदतमंद झूम उठे। पूरी रात दरगाह परिसर में इबादत, जिक्र और सूफियाना संगीत की गूंज सुनाई देती रही, जिससे माहौल पूरी तरह रूहानी बन गया।
दरगाह के सज्जादानशीन सूफी फजलुर रहमान लुत्फी ने जानकारी देते हुए बताया कि उर्स के दूसरे दिन यानी 2 जून 2026 की रात्रि को भी ख्वाजा लुत्फुल्लाह शाह चिश्ती निजामी की शान में भव्य महफिल-ए-समा का आयोजन किया जाएगा। इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से आए नामी कव्वाल अपनी प्रस्तुतियां देंगे, जिससे अकीदतमंदों को सूफियाना रंग में डूबने का अवसर मिलेगा।
उन्होंने आगे बताया कि उर्स के अंतिम दिन 3 जून 2026 को सुबह 11:00 बजे कुल शरीफ अदा किया जाएगा, जो उर्स की सबसे अहम रस्मों में से एक होती है। इस दौरान विशेष दुआएं की जाएंगी और दरगाह पर हाजिरी देने वालों की भीड़ उमड़ेगी। इसके बाद रात्रि में सिलसिला-ए-चिश्तिया के महान सूफी संत बाबा शाह फिरोज चिश्ती रहमतुल्लाह अलैहि की शान में महफिल-ए-समा का आयोजन होगा। इसी क्रम में उनका 449वां सालाना कुल शरीफ भी अदा किया जाएगा।
तीन दिनों तक चलने वाले इस उर्स मुकद्दस के दौरान दरगाह परिसर और आसपास के इलाकों में मेले जैसा माहौल बना हुआ है। जगह-जगह लंगर (सामूहिक भोजन) का आयोजन किया जा रहा है, जहां सभी धर्मों और वर्गों के लोग एक साथ बैठकर भोजन कर रहे हैं। यह दृश्य समाज में समानता और भाईचारे का संदेश देता है।
उर्स के मद्देनजर प्रशासन द्वारा सुरक्षा के भी व्यापक इंतजाम किए गए हैं। यातायात व्यवस्था, साफ-सफाई और भीड़ प्रबंधन को लेकर विशेष ध्यान रखा गया, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
इस अवसर पर क्षेत्र के जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, धर्मगुरु और हजारों की संख्या में अकीदतमंद मौजूद रहे। हर कोई अपने तरीके से इस पवित्र आयोजन का हिस्सा बनकर खुद को धन्य महसूस कर रहा है।
विजन लाइव का विश्लेषण:
दनकौर का यह ऐतिहासिक उर्स मुकद्दस केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है, बल्कि यह सूफी परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। यहां हर वर्ग, हर समुदाय के लोग एक साथ इकट्ठा होकर जिस तरह से इबादत और इंसानियत का संदेश देते हैं, वह आज के समय में बेहद प्रासंगिक है। ऐसे आयोजन न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं, बल्कि समाज में आपसी विश्वास, सौहार्द और भाईचारे को भी मजबूती देते हैं।
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