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27 मई 1964: जब भारत ने अपना पहला प्रधानमंत्री ही नहीं, एक युग खो दिया

📍 विशेष लेख
27 मई 1964, दोपहर का समय। दिल्ली के सरकारी दफ्तरों में अचानक टेलीफोन की घंटियां तेज़ी से बजने लगीं। ऑल इंडिया रेडियो के कर्मचारी भागते हुए स्टूडियो पहुंचे, संसद भवन के गलियारों में असामान्य हलचल थी। कुछ ही पलों बाद रेडियो पर एक भारी और भावुक आवाज गूंजी—
“प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू अब हमारे बीच नहीं रहे।”
यह केवल एक सूचना नहीं थी, बल्कि उस भारत के लिए गहरा आघात था, जिसने आज़ादी के बाद अपनी पहचान गढ़नी शुरू ही की थी। उस समय देश की आबादी लगभग 46 करोड़ थी, और करोड़ों लोगों ने पहली बार महसूस किया कि राष्ट्र भी खुद को अनाथ महसूस कर सकता है।
🔹 आखिरी सुबह: एक महान नेता की विदाई
27 मई की सुबह लगभग 6 बजकर 20 मिनट पर नेहरू ने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी से कहा—
“पीठ में बहुत दर्द हो रहा है।”
कुछ देर बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा—
“I think I am finished.”
डॉ. बी.एन. चुघ, डॉ. तलवार सहित वरिष्ठ चिकित्सकों की टीम तत्काल पहुंची। ऑक्सीजन, इंजेक्शन—हर संभव प्रयास किया गया, लेकिन दोपहर 1 बजकर 44 मिनट पर उनकी धड़कन थम गई। उस समय कमरे में इंदिरा गांधी मौजूद थीं।
🔹 शोक की लहर: तीन मूर्ति भवन से गांवों तक
नेहरू के निधन की खबर फैलते ही तीन मूर्ति भवन में मातम छा गया। वर्षों से उनके साथ जुड़े कर्मचारी फूट-फूटकर रो पड़े।
एक बुजुर्ग माली बार-बार यही कह रहा था—
“पंडित जी चले गए… अब यहां कौन आएगा सुबह बगीचा देखने…”
दिल्ली में सिनेमाघरों ने शो बीच में ही रोक दिए। कनॉट प्लेस की दुकानें स्वतः बंद होने लगीं। रेलवे स्टेशनों, चौपालों और डाकघरों के बाहर लोग रेडियो के आसपास इकट्ठा हो गए। यह शोक केवल राजधानी तक सीमित नहीं था—पूरा देश इसे महसूस कर रहा था।
🔹 अंतिम यात्रा: जनसैलाब का सैलाब
28 मई 1964 की सुबह, नेहरू की अंतिम यात्रा तीन मूर्ति भवन से निकली। सेना की तोप गाड़ी पर फूलों से सजी उनकी पार्थिव देह रखी गई।
इतिहासकारों के अनुसार, करीब 15 से 20 लाख लोग सड़कों पर उमड़ पड़े।
लोग पेड़ों और बिजली के खंभों पर चढ़कर अंतिम दर्शन कर रहे थे
महिलाएं बच्चों को कंधों पर उठाकर झलक दिखाने की कोशिश कर रही थीं
कई लोग भावनाओं में बेहोश हो गए
एक किसान आगरा से सिर्फ यह कहकर आया था—
“जिस आदमी ने हमें वोट की ताकत दी, उसे आखिरी बार देखना है।”
इस अंतिम यात्रा में राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, गुलजारीलाल नंदा, लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, जगजीवन राम, कामराज, इंदिरा गांधी सहित अनेक नेता और दुनिया भर के प्रतिनिधि मौजूद रहे।
🔹 वैश्विक शोक और नेहरू की विरासत
नेहरू के निधन पर दुनिया भर से शोक संदेश आए।
लॉर्ड माउंटबेटन (ब्रिटेन)
मार्शल टीटो (यूगोस्लाविया)
गमाल अब्देल नासिर (मिस्र)
सभी ने उन्हें शांति और विकास का वैश्विक प्रतीक बताया।
नेहरू ने अपनी वसीयत में इच्छा जताई थी कि उनकी राख का एक हिस्सा गंगा में प्रवाहित किया जाए और शेष भारत के खेतों में बिखेर दिया जाए। भारतीय वायुसेना ने इस इच्छा को पूरा किया—एक प्रतीक कि वे स्वयं को इस मिट्टी का हिस्सा मानते थे।
🔹 एक युग का अंत, एक राष्ट्र की परीक्षा
नेहरू के जाने के बाद भारत केवल एक नेता नहीं खोया था, बल्कि वह स्तंभ खो दिया था जिसने—
लोकतंत्र की नींव मजबूत की
IIT, AIIMS, बड़े बांध और उद्योग स्थापित किए
वैज्ञानिक सोच और आधुनिक भारत की दिशा तय की
उनकी मृत्यु के बाद देश में यह चिंता गहराई कि अब आगे का रास्ता क्या होगा।
आज जब इतिहास को त्वरित माध्यमों से समझने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब 1964 का भारत हमें याद दिलाता है कि उस दिन चिता पर केवल एक प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि आज़ाद भारत का पहला सपना विदा हो रहा था।
✍️ लेखक परिचय
मौहम्मद इल्यास “दनकौरी”
वरिष्ठ पत्रकार, संपादक एवं सामाजिक विश्लेषक।
पिछले कई वर्षों से सामाजिक, ऐतिहासिक और समसामयिक विषयों पर लेखन करते हुए जनजागरूकता का कार्य कर रहे हैं। क्षेत्रीय पत्रकारिता में सक्रिय भूमिका निभाते हुए समाज, राजनीति और इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर संतुलित और तथ्यपरक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं।
⚖️ कानूनी डिस्क्लेमर
यह लेख ऐतिहासिक घटनाओं, उपलब्ध अभिलेखों, जनस्मृतियों और लेखक के व्यक्तिगत विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या विचारधारा की छवि को प्रभावित करना नहीं, बल्कि इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को प्रस्तुत करना है। पाठकों से अपेक्षा की जाती है कि वे इसे एक विश्लेषणात्मक एवं संदर्भात्मक दृष्टिकोण से पढ़ें।
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