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कुरुक्षेत्र से उठी साहित्य और सनातन चेतना की गूंज — ‘षष्ठ वार्षिकोत्सव 2026’ बना राष्ट्रीय सांस्कृतिक विमर्श का मंच

📰 मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ कुरूक्षेत्र / गौतमबुद्धनगर 
धर्म, दर्शन और सृजन की पावन भूमि कुरुक्षेत्र एक बार फिर भारतीय सांस्कृतिक चेतना के विराट संगम का साक्षी बना, जब शिला अक्षर फाउंडेशन, दिल्ली द्वारा “षष्ठ वार्षिकोत्सव 2026” का आयोजन अखंड गीतापीठ शाश्वत सेवाश्रम ट्रस्ट में अत्यंत भव्य, गरिमामयी और विचारोत्तेजक वातावरण में संपन्न हुआ।
“जहां गीता का संदेश गूंजा, वहीं सृजन के अक्षर फिर से जागेंगे” — इस मूल भाव ने पूरे आयोजन को केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर के सांस्कृतिक और बौद्धिक आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया।
विशेष उल्लेखनीय है कि यह संस्था गौतम बुद्ध नगर (ग्रेटर नोएडा) में भी सक्रिय भूमिका निभा रही है, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर साहित्य, शिक्षा और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण और प्रसार को नई गति मिल रही है।
🔶 विशेष एंगल: ‘गीता से ज्ञान, साहित्य से समाज’ — परंपरा और आधुनिकता का सशक्त सेतु
यह आयोजन एक ऐसे सांस्कृतिक सेतु के रूप में सामने आया, जहां गीता का आध्यात्मिक संदेश और आधुनिक साहित्यिक अभिव्यक्ति एक-दूसरे के पूरक बनकर उभरे।
आज के भौतिकवादी दौर में, जहां मूल्य और संस्कार अक्सर पीछे छूटते नजर आते हैं, वहां यह कार्यक्रम भारतीयता की जड़ों को पुनर्जीवित करने का गंभीर प्रयास प्रतीत हुआ।
🔷 आध्यात्मिक आरंभ: वैदिक परंपरा की जीवंत झलक
कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंगलाचरण, दीप प्रज्ज्वलन और माँ सरस्वती वंदना के साथ हुई।
यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि ज्ञान, प्रकाश और सृजन के प्रति सामूहिक संकल्प का प्रतीक था। सभागार में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति इस आध्यात्मिक ऊर्जा से जुड़ता हुआ दिखाई दिया।
🔷 प्रथम सत्र: विचारों में भारतीय दर्शन की गहराई
प्रथम सत्र में
मुख्य अतिथि: पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी शाश्वत आनंद गिरि जी महाराज
अध्यक्ष: डॉ. एस.पी. शर्मा
विशिष्ट अतिथियों में ललित भूषण, प्रो. डॉ. पूनम अग्रवाल, कुमुद शुक्ला, मधुर कुलश्रेष्ठ, डॉ. अनुज भार्गव उपस्थित रहे।
वक्ताओं ने अपने उद्बोधनों में श्रीमद्भगवद्गीता के जीवन दर्शन, भारतीय शिक्षा पद्धति, लोक संस्कृति और मानवीय मूल्यों पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया।
स्वामी शाश्वत आनंद गिरि जी महाराज ने विशेष रूप से कहा कि “गीता केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है, जिसे अपनाकर व्यक्ति और समाज दोनों संतुलित हो सकते हैं।”
🔷 द्वितीय सत्र: साहित्यिक सृजन का साक्षात उत्सव
द्वितीय सत्र में आयोजित काव्य गोष्ठी और पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम ने आयोजन को एक नई ऊंचाई प्रदान की।
डॉ. नीलिमा निर्भीक और मनोज कुमार राणा द्वारा लिखित
📚 “पौराणिक साहित्य एवं श्रीमद्भागवत पुराण” (भाग 1 एवं 2)
का विधिवत लोकार्पण किया गया।
अध्यक्ष: कुमार दत्त ‘कुंवर’
मुख्य अतिथि: डॉ. आरती वाजपेयी
विशिष्ट अतिथि: सुंदर जायसवाल ‘सबरस’, सुरेश सोनपुरे ‘अजनबी’, डॉ. anil शर्मा ‘मयंक’, डॉ. मृदुला त्यागी
कवियों और साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भक्ति, समाज, समकालीन समस्याओं और मानवीय संवेदनाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया, जिससे श्रोता भावविभोर हो उठे।
🔷 तृतीय सत्र: काव्य संध्या में भावनाओं का उत्कर्ष
तृतीय सत्र की काव्य संध्या ने पूरे आयोजन को भावनात्मक ऊंचाई पर पहुंचा दिया।
अध्यक्ष: नीलम कुलश्रेष्ठ
मुख्य अतिथि: डॉ. कुमार आदित्य
मंच पर सुमन शर्मा, डॉ. आरती शर्मा, अर्चना सिंह, डॉ. मोनिका रानी, डॉ. ब्रजलता शर्मा सहित अनेक कवियों ने
श्रृंगार, वीर, करुण और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी कविताओं का पाठ किया।
🔷 संचालन और वैचारिक दिशा
कार्यक्रम का संचालन डॉ. नीलिमा निर्भीक और श्वेता शर्मा ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया।
डॉ. नीलिमा निर्भीक ने अपने वक्तव्य में कहा कि “यदि युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना है, तो साहित्य और संस्कृति को जीवन का हिस्सा बनाना होगा।”
🔷 सम्मान समारोह: साहित्य साधकों का अभिनंदन
संस्था की अध्यक्ष डॉ. ब्रजलता शर्मा ने स्वागत उद्बोधन और धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
संस्था के चेयरमैन रमेश चंद्र शर्मा द्वारा अतिथियों और साहित्यकारों को
प्रमाण पत्र, अंगवस्त्र और ‘साहित्य गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया गया।
🔷 समापन: राष्ट्रीय चेतना का उदघोष
कार्यक्रम का समापन भारत माता के जयघोष, धर्मभूमि कुरुक्षेत्र की महिमा और राष्ट्रगान के साथ हुआ।
संस्था के पदाधिकारी निखिल गौड़ ने कहा कि
“भारतीय संस्कृति और साहित्य केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की दिशा निर्धारित करने वाली शक्ति हैं।”
🟡 विजन लाइव का विश्लेषण:
कुरुक्षेत्र में आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय समाज में मूल्यों की पुनर्स्थापना की दिशा में एक गंभीर पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। जिस तरह से गीता के सिद्धांतों को आधुनिक साहित्य और युवा पीढ़ी से जोड़ा गया, वह इस बात का संकेत है कि परंपरा को प्रासंगिक बनाए बिना भविष्य का संतुलित निर्माण संभव नहीं है।
ग्रेटर नोएडा जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहरी क्षेत्रों में इस प्रकार की संस्थाओं की सक्रियता यह दर्शाती है कि विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक चेतना को भी समान महत्व दिया जा रहा है।
यदि ऐसे आयोजन निरंतर होते रहे, तो वे न केवल साहित्यिक वातावरण को समृद्ध करेंगे, बल्कि समाज में वैचारिक संतुलन, नैतिकता और सांस्कृतिक जुड़ाव को भी मजबूती प्रदान करेंगे।