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बाराही मेला-2026 सूरजपुर: जब. डाॅ कुमार आदित्य की कविता ने आस्था को शब्द और भावनाओं को स्वर दे दिया

मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ सूरजपुर (ग्रेटर नोएडा)
प्राचीन एवं ऐतिहासिक बाराही मेला-2026 में जहां एक ओर रागनी, लोक संस्कृति और आधुनिक आकर्षणों की धूम रही, वहीं रविवार का दिन उस समय खास बन गया जब मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे भारत विकास परिषद के नवनिर्वाचित कोषाध्यक्ष डॉ. कुमार आदित्य ने अपनी भावपूर्ण काव्य प्रस्तुति से पूरे माहौल को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया।
मंच पर जैसे ही डॉ. कुमार आदित्य ने अपनी कविता का पाठ शुरू किया, पंडाल में एक अलग ही सन्नाटा छा गया—एक ऐसा सन्नाटा, जिसमें हर श्रोता शब्दों को महसूस कर रहा था:
“हर धड़कन की प्यास में तू,
जीवन के एहसास में तू।
शून्य हूँ मैं, विस्तार में तू,
कविताओं के सार में तू।
लफ़्ज़ों की झंकार में तू,
महफ़िल के श्रृंगार में तू।
नज़रों के दर्पण में तू,
मेरी भक्ति और अर्पण में तू।
ईश्वर का कोई नज़राना लगता है,
तुझसे ये रिश्ता पुराना लगता है।”
इन पंक्तियों ने मानो मेले के पूरे वातावरण को एक आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। यह केवल कविता नहीं थी, बल्कि आस्था, प्रेम, समर्पण और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत संगम थी, जिसने हर श्रोता के हृदय को स्पर्श किया।
🎤 कविता से बना आध्यात्मिक वातावरण
डॉ. कुमार आदित्य की काव्य शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने जटिल भावनाओं को सरल शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत किया। उनकी कविता में जहां भक्ति का भाव था, वहीं उसमें जीवन दर्शन और मानवीय रिश्तों की गहराई भी झलक रही थी।
जैसे-जैसे कविता आगे बढ़ी, दर्शकों की तल्लीनता भी बढ़ती गई। अंत में जब उन्होंने “तुझसे ये रिश्ता पुराना लगता है” कहा, तो पूरा पंडाल तालियों की गूंज से भर उठा। यह क्षण मेले के सबसे यादगार पलों में शामिल हो गया।
🏛️ बाराही मेले के महत्व पर विचार
अपनी काव्य प्रस्तुति के पश्चात डॉ. कुमार आदित्य ने बाराही मेले के ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व पर भी विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि बाराही मेला केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक है। यह मेला लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करता है और समाज में सांस्कृतिक मूल्यों को जीवित रखने का एक सशक्त माध्यम है।
उन्होंने यह भी कहा कि आज के बदलते दौर में ऐसे आयोजनों का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि यही मंच नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, परंपराओं और नैतिक मूल्यों से परिचित कराते हैं।
🌟 दर्शकों पर गहरा प्रभाव
डॉ. कुमार आदित्य की प्रस्तुति का प्रभाव केवल तालियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह लोगों के मन में गहराई तक उतर गया। कई श्रोता उनकी कविता के भावों को आपस में चर्चा करते नजर आए।
मेले में मौजूद बुजुर्गों ने इसे “पुरानी संस्कृति की नई अभिव्यक्ति” बताया, वहीं युवाओं ने इसे “दिल को छू लेने वाला अनुभव” कहा।
🎭 संस्कृति और साहित्य का संगम
बाराही मेला-2026 में डॉ. कुमार आदित्य की यह प्रस्तुति इस बात का प्रमाण है कि लोक संस्कृति और साहित्य जब एक साथ आते हैं, तो एक नई चेतना का निर्माण होता है।
जहां एक ओर रागनी और लोकगीतों ने मेले को जीवंत बनाए रखा, वहीं कविता ने उसे गहराई और भावनात्मक विस्तार दिया।
🔍 विजन लाइव विश्लेषण
डॉ. कुमार आदित्य की प्रस्तुति ने यह स्पष्ट कर दिया कि आज भी शब्दों की शक्ति सबसे प्रभावशाली माध्यम है।
बाराही मेला जैसे मंच पर जब कविता के माध्यम से आस्था और संस्कृति को व्यक्त किया जाता है, तो वह केवल मनोरंजन नहीं रहता, बल्कि एक आध्यात्मिक और सामाजिक अनुभव बन जाता है।
यह प्रस्तुति इस बात का संकेत भी है कि यदि साहित्य को ऐसे जनमंचों से जोड़ा जाए, तो यह समाज में सकारात्मक परिवर्तन और सांस्कृतिक जागरूकता का मजबूत आधार बन सकता है।
बाराही मेला-2026 में डॉ. कुमार आदित्य की काव्य प्रस्तुति निश्चित रूप से उन पलों में शामिल हो गई है, जिन्हें लंबे समय तक याद किया जाएगा।