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ऋतुराज बसंत में प्रकृति की सुंदरता का अलौकिक वर्णन



नव संवत्सर : वसंत-विहंसित प्रकृति का दिव्य अभिनन्दन
 भगवत प्रसाद शर्मा
प्रस्तावना : नव संवत्सर और वसंत का अद्भुत संगम
भारतीय संस्कृति में नव संवत्सर का आगमन केवल एक नए वर्ष की शुरुआत भर नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मानव जीवन के मध्य गहरे सामंजस्य का प्रतीक है। जब समय का चक्र एक और परिक्रमा पूर्ण करता है और नव संवत्सर का शुभ प्रभात उदित होता है, तब सम्पूर्ण प्रकृति मानो उल्लास और नवजीवन के रंगों में रंग जाती है।
यह वही समय होता है जब ऋतुओं का राजा बसंत अपनी मधुर आहट के साथ धरती पर उतरता है। शीत ऋतु की कठोरता समाप्त हो जाती है और वातावरण में कोमलता, मधुरता और सुगंध का विस्तार होने लगता है।
भारतीय ऋषियों और मनीषियों ने वसंत को केवल एक ऋतु नहीं माना, बल्कि इसे नवजीवन, सृजन और सौंदर्य का उत्सव कहा है। यही कारण है कि भारतीय नववर्ष का प्रारंभ भी प्रकृति के इसी स्वर्णिम कालखंड में होता है।
प्रकृति का नववधू-सा अलौकिक श्रृंगार
वसंत ऋतु का आगमन होते ही ऐसा प्रतीत होता है मानो धरती स्वयं नववधू का रूप धारण कर रही हो। हरित धरा पर नवपल्लवों का कोमल आवरण बिछ जाता है। वृक्षों की सूनी डालियाँ फिर से जीवन के रंगों से भर जाती हैं और समस्त सृष्टि एक नवीन उल्लास से भर उठती है।
प्रातःकाल जब सूर्य की अरुणिमा आकाश को स्वर्णिम आभा से भर देती है, तब पत्तों पर जमे ओस के कण मोतियों की माला की भाँति चमक उठते हैं। मंद-मंद बहती शीतल समीर पुष्पों की सुगंध को अपने साथ लेकर वातावरण में ऐसा मधुर रस घोल देती है कि मन स्वतः ही प्रसन्नता से भर जाता है।
ऐसा प्रतीत होता है मानो सृष्टि का प्रत्येक कण नव संवत्सर के स्वागत में अपने-अपने ढंग से मंगलगान कर रहा हो।
इसी दृश्य को काव्य की पंक्तियों में अनुभव किया जा सकता है—
खिल गयी जुही, चम्पा, बेला और मोगरा, केतकी अपढारी,
पीली चुनरी ओढ़े प्रकृति भी लग रही आज कितनी प्यारी।
मंद पवन में सुरभि घुली है, उपवन-उपवन गान सुनाता,
नव जीवन का मधुर निमंत्रण हर पल्लव मुस्काकर लाता।
पुष्प, पवन और पल्लवों का मधुर संगीत
बसंत ऋतु में प्रकृति मानो एक विशाल संगीत सभा का रूप ले लेती है। वन-उपवनों में खिले रंग-बिरंगे पुष्प अपनी छटा से धरती को सजा देते हैं।
पलाश के वृक्षों पर खिलने वाले लाल पुष्प मानो अग्निशिखा की भांति आकाश को छूते प्रतीत होते हैं। कचनार की कोमल पंखुड़ियाँ और अमलतास के स्वर्णिम गुच्छे प्रकृति के इस श्रृंगार को और भी आकर्षक बना देते हैं।
आम्र-वृक्षों पर आई मंजरियों की सुगंध वातावरण में ऐसी मधुरता घोल देती है कि मन स्वतः ही पुलकित हो उठता है। कोयल की मधुर कूक, पपीहे की पुकार और चिड़ियों का कलरव मानो नव संवत्सर का स्वागत गीत बन जाता है।
नदियों की कल-कल ध्वनि, सरोवरों में खिले कमलों की आभा और मंद पवन की सरसराहट मिलकर ऐसा दिव्य संगीत रचते हैं जिसमें समस्त सृष्टि तल्लीन हो जाती है।
ओस-बिन्दुओं की रजत-माल ये, पल्लव-पल्लव पर मुस्काए,
अरुण-किरण का स्वर्ण-स्पर्श ये, नव आशाएँ आज जगाए।
आम्र-मंजरियों की सुरभि से महका कण-कण आज ये सारा,
नव संवत्सर के स्वागत में देखो पुलकित हुआ जग सारा।
भारतीय संस्कृति में वसंत का आध्यात्मिक महत्व
भारतीय परंपरा में वसंत को अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना गया है। प्राचीन ग्रंथों में इसे ऋतुराज अर्थात ऋतुओं का राजा कहा गया है।
महर्षि वाल्मीकि और कालिदास जैसे महान कवियों ने भी अपने काव्य में वसंत ऋतु की अनुपम महिमा का वर्णन किया है। कालिदास के “ऋतुसंहार” में वसंत का वर्णन प्रेम, सौंदर्य और उल्लास की पराकाष्ठा के रूप में मिलता है।
बसंत पंचमी का पर्व भी इसी ऋतु में मनाया जाता है, जो विद्या की देवी सरस्वती को समर्पित है। यह दिन ज्ञान, कला और संस्कृति के नवप्रारंभ का प्रतीक माना जाता है।
इसी प्रकार चैत्र मास में आने वाला नव संवत्सर भी भारतीय कालगणना की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दिन केवल नए वर्ष का आरंभ नहीं, बल्कि नव ऊर्जा, नव संकल्प और नव चेतना का प्रतीक है।
नव संवत्सर का संदेश : नवता और आशा का आलोक
प्रकृति का यह अद्भुत सौंदर्य केवल आँखों को आनंदित करने के लिए नहीं है, बल्कि यह जीवन के गहरे सत्य को भी प्रकट करता है।
वृक्ष जब अपने पुराने पत्तों को त्यागते हैं तभी उनमें नए पत्तों का जन्म होता है। इसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन में पुराने दोषों, नकारात्मक विचारों और दुर्भावनाओं को त्यागकर नवीन विचारों और श्रेष्ठ संकल्पों को अपनाना चाहिए।
वसंत हमें यह सिखाता है कि जीवन में परिवर्तन ही सृजन का आधार है। हर अंत के बाद एक नया आरंभ होता है और हर अंधकार के बाद प्रकाश का उदय निश्चित होता है।
इसी भाव को काव्य में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है—
अरुणिम प्रभा से आलोकित जब नभ का अंचल होता है,
नव जीवन का संदेश लिये हर उपवन चंचल होता है।
हरित धरा पर स्वर्णिम छाया, सुरभित मधुवन की फुलवारी,
नव संवत्सर के स्वागत में सजती सृष्टि सुहागन न्यारी।
नव संवत्सर : नव संकल्पों का उत्सव
नव संवत्सर का यह पावन अवसर हमें आत्ममंथन और आत्मविकास की प्रेरणा देता है। यह समय हमें यह सोचने का अवसर देता है कि बीते वर्ष में हमने क्या सीखा, क्या खोया और क्या पाया।
यदि हम अपने जीवन में सद्भाव, करुणा, परोपकार और सकारात्मकता के दीप प्रज्वलित करें, तो हमारा जीवन भी उसी प्रकार सुंदर और सुगंधित बन सकता है जैसे वसंत में खिलता हुआ उपवन।
आइए, इस पावन नव वर्ष पर हम अपने हृदय में आशा का दीप जलाएँ, अपने विचारों में नवता का संचार करें और अपने कर्मों से समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने का संकल्प लें।
यही नव संवत्सर का सच्चा अभिनन्दन है—
प्रकृति का सौंदर्य, नवता का आलोक और जीवन की अनंत संभावनाएँ।
लेखक परिचय
भगवत प्रसाद शर्मा उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जनपद के ग्रेटर नोएडा क्षेत्र के निवासी हैं। वे भारतीय जनता पार्टी से जुड़े एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता एवं मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर रहे हैं।
आप सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विषयों पर नियमित रूप से लेखन करते हैं। भारतीय संस्कृति, प्रकृति, अध्यात्म और राष्ट्रवादी चिंतन से जुड़े विषयों पर आपकी विशेष रुचि है।
आपके लेख विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित होते रहते हैं। लेखन के माध्यम से आप समाज में सकारात्मक विचारधारा, सांस्कृतिक चेतना और नैतिक मूल्यों को प्रोत्साहित करने का प्रयास करते हैं।
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