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"संकल्प से सिस्टम तक—जेवर एयरपोर्ट के बहाने उभरता ‘न्यू एज कनेक्टिविटी मॉडल’, जिसमें स्थानीय संघर्ष भी शामिल”

  मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ गौतमबुद्धनगर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह इलाका आज जिस ऐतिहासिक मुकाम पर खड़ा है, वह केवल एक एयरपोर्ट के उद्घाटन की कहानी नहीं, बल्कि करीब ढाई दशक लंबे विजन, राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्थानीय संघर्ष और कनेक्टिविटी आधारित विकास मॉडल का परिणाम है।
नोएडा से जेवर तक का सफर अब सिर्फ भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि भारत के बदलते इंफ्रास्ट्रक्चर सोच का प्रतीक बन चुका है।
कुछ ही समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित होने वाला नोएडा ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट (जेवर) इस पूरे परिवर्तन का केंद्र बिंदु है।
🔶 25 साल की कहानी: फाइलों से फ्लाइट तक
2001: राजनाथ सिंह सरकार में जेवर एयरपोर्ट का सपना
मायावती काल: परियोजना को शुरुआती गति
केंद्र की मंजूरी में अड़चनें: IGI एयरपोर्ट की निकटता का तर्क
2012–2017: अनिश्चितता, फाइलों में देरी
मथुरा-अलवर शिफ्ट की चर्चा: परियोजना पर संकट
यहीं से यह कहानी केवल एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि “बचाने और आगे बढ़ाने की लड़ाई” बन गई।
🔶 डॉ. महेश शर्मा: “नीतिगत मोर्चे पर निर्णायक पकड़”
गौतमबुद्ध नगर के सांसद और पूर्व केंद्रीय उड्डयन मंत्री डॉ. महेश शर्मा ने इस परियोजना को रणनीतिक स्तर पर जिंदा बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई।
उनका योगदान:
केंद्र सरकार में रहते हुए एयरपोर्ट की प्रासंगिकता को मजबूती से रखा
मथुरा/अलवर शिफ्ट के प्रस्तावों का तर्कसंगत विरोध
जेवर को एविएशन और लॉजिस्टिक्स के लिए उपयुक्त स्थल के रूप में स्थापित किया
उनके प्रयासों ने यह सुनिश्चित किया कि “परियोजना केवल कागजों में न रह जाए, बल्कि स्थान भी न बदले।”
🔶 धीरेंद्र सिंह: “जमीन से जुड़ा संघर्ष, जिसने रास्ता साफ किया”
जेवर विधायक धीरेंद्र सिंह इस परियोजना के ग्राउंड-लेवल फेस के रूप में उभरे।
उनकी भूमिका:
किसानों और प्रशासन के बीच समन्वय स्थापित करना
भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवादों को कम करने का प्रयास
क्षेत्र में जनसमर्थन तैयार करना
परियोजना को लेकर स्थानीय विश्वास कायम रखना
उन्होंने इस प्रोजेक्ट को “केवल एयरपोर्ट नहीं, बल्कि क्षेत्रीय क्रांति” के रूप में प्रस्तुत किया।
🔶 2017 के बाद: “डबल इंजन” से तेज रफ्तार
योगी आदित्यनाथ सरकार (2017) के आने के बाद:
नीतिगत अड़चनें कम हुईं
मंजूरी और क्रियान्वयन में तेजी आई
परियोजना ने जमीन पर आकार लेना शुरू किया
यह वह दौर था जब संकल्प से सिस्टम में बदलाव दिखने लगा।
🔶 कनेक्टिविटी रिवोल्यूशन: भारत का नया मॉडल
गौतमबुद्ध नगर आज एक इंटीग्रेटेड कनेक्टिविटी हब बन चुका है:
🔻 मौजूदा लाइफलाइन:
यमुना एक्सप्रेसवे
ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे
🔻 जुड़ने वाले कॉरिडोर:
दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे
गुड़गांव कनेक्टिविटी
गंगा एक्सप्रेसवे
🔻 एयर कनेक्टिविटी:
जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट
👉 यह मॉडल “सड़क + हवाई + औद्योगिक कॉरिडोर” का त्रिस्तरीय विकास ढांचा तैयार करता है।
🔶 “गांव से ग्लोबल”: बदलती सामाजिक-आर्थिक तस्वीर
एक समय:
दनकौर, जेवर, रबूपुरा जैसे क्षेत्र बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करते थे
मंझावली यमुना पुल जैसी परियोजनाएं वर्षों तक अटकी रहीं
आज:
वही क्षेत्र एक्सप्रेसवे नेटवर्क से जुड़ा है
वैश्विक एयर कनेक्टिविटी की ओर बढ़ रहा है
निवेश, उद्योग और शहरीकरण का केंद्र बन रहा है
🔶 आर्थिक प्रभाव: “नया ग्रोथ इंजन”
विशेषज्ञों के अनुसार, यह पूरा नेटवर्क:
लॉजिस्टिक्स कॉस्ट कम करेगा
वेयरहाउसिंग और सप्लाई चेन को मजबूत करेगा
हजारों-लाखों रोजगार पैदा करेगा
FDI (विदेशी निवेश) को आकर्षित करेगा
गौतमबुद्ध नगर को नॉर्थ इंडिया का बिजनेस गेटवे बनाएगा
🔶 चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि, इस विकास के साथ कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़े हैं:
भूमि अधिग्रहण और किसानों के मुआवजे के मुद्दे
तेज शहरीकरण के बीच संतुलित विकास
स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता
यह वे पहलू हैं, जिन पर आने वाले समय में ध्यान देना जरूरी होगा।
🔶 निष्कर्ष: “एक परियोजना, कई परतें”
जेवर एयरपोर्ट की कहानी कई स्तरों पर एक साथ चलती है:
✔ 25 साल का विजन
✔ नीतिगत संघर्ष
✔ स्थानीय नेतृत्व (डॉ. महेश शर्मा, धीरेंद्र सिंह)
✔ कनेक्टिविटी आधारित विकास मॉडल
✔ और एक उभरता वैश्विक हब
👉 यह केवल एक एयरपोर्ट नहीं, बल्कि
“नए भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर, राजनीति और क्षेत्रीय विकास के संगम” की जीवंत मिसाल है।
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका उद्घाटन करेंगे, तो वह एक रनवे का उद्घाटन नहीं होगा—
बल्कि गौतमबुद्ध नगर के लिए नए आर्थिक युग की उड़ान होगी।