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आस्था, परंपरा और संस्कृति का संगम बनेगा ऐतिहासिक बाराही मेला, 1 अप्रैल से गूंजेगा सूरजपुर का मेला प्रांगण


       मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ सूरजपुर
ग्रेटर नोएडा के ऐतिहासिक कस्बे सूरजपुर में सदियों से चली आ रही आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक प्राचीन बाराही मेला एक बार फिर अपने पूरे वैभव और श्रद्धा के साथ सजने जा रहा है।
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी यह मेला 1 अप्रैल 2026 से प्रारंभ होकर 13 अप्रैल 2026 तक आयोजित किया जाएगा, जिसका भव्य समापन पारंपरिक इनामी कुश्ती दंगल के साथ होगा।
इस संबंध में मेले की तैयारियों को लेकर शिव मंदिर सेवा समिति (पंजीकृत) की एक महत्वपूर्ण बैठक रविवार को बाराही मेला प्रांगण में आयोजित की गई, जिसमें मेले को पहले से अधिक भव्य, आकर्षक और सुव्यवस्थित बनाने के लिए विस्तृत चर्चा की गई।
बैठक की अध्यक्षता समिति के अध्यक्ष धर्मपाल भाटी (प्रधान) ने की, जबकि संचालन समिति के महामंत्री ओमवीर बैंसला ने किया।
श्रद्धा और आस्था का केंद्र है बाराही मेला
बैठक को संबोधित करते हुए अध्यक्ष धर्मपाल भाटी ने कहा कि बाराही मेला केवल एक मेला नहीं बल्कि क्षेत्र की आस्था और आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि वर्षों से यह मेला क्षेत्र की धार्मिक चेतना को जागृत करता आया है। यहां आने वाले श्रद्धालु देवी-देवताओं के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और अपने जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
उन्होंने कहा कि इस मेले में भक्ति, श्रद्धा और सांस्कृतिक उल्लास का अनूठा संगम देखने को मिलता है। मेले के दौरान पूरा क्षेत्र मानो धार्मिक ऊर्जा और आध्यात्मिक वातावरण से सराबोर हो जाता है।
भक्ति, संस्कृति और परंपरा की अनूठी छटा
समिति के महामंत्री ओमवीर बैंसला ने बताया कि मेले के दौरान धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।
इसके साथ ही पारंपरिक मेलों की तरह ग्रामीण बाजार, हस्तशिल्प की दुकानें, झूले और लोक संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम भी मेले की शोभा बढ़ाएंगे।
उन्होंने बताया कि मेले का सबसे बड़ा आकर्षण इनामी कुश्ती दंगल होगा, जिसमें क्षेत्र के साथ-साथ अन्य जनपदों और राज्यों से भी प्रसिद्ध पहलवान भाग लेंगे।
कुश्ती दंगल भारतीय परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह शक्ति, साहस और खेल भावना का प्रतीक माना जाता है।
ग्रामीण संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक
बाराही मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि ग्रामीण संस्कृति और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है।
इस मेले में विभिन्न गांवों और क्षेत्रों से हजारों लोग एकत्र होकर आपसी भाईचारे और सौहार्द का संदेश देते हैं।
यह मेला उस परंपरा को जीवित रखता है जिसमें धर्म, संस्कृति, लोकजीवन और सामाजिक संबंधों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष प्रबंध
बैठक में मेले की व्यवस्थाओं को लेकर भी विस्तार से चर्चा की गई। समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि मेले में आने वाले श्रद्धालुओं और दर्शकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए स्वच्छता, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, पार्किंग, यातायात नियंत्रण और सुरक्षा के विशेष प्रबंध किए जाएंगे।
इसके लिए स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग से भी सहयोग लिया जाएगा, ताकि मेला शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित तरीके से संपन्न हो सके।
मेले की परंपरा को जीवित रखने का संकल्प
बैठक में उपस्थित सभी पदाधिकारियों और सदस्यों ने इस वर्ष के मेले को ऐतिहासिक और यादगार बनाने का संकल्प लिया।
समिति ने क्षेत्र के लोगों से भी अपील की कि वे 1 अप्रैल से प्रारंभ होने वाले बाराही मेले में अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर इस पवित्र परंपरा को और अधिक समृद्ध बनाएं।
बैठक में ये रहे उपस्थित
इस अवसर पर समिति के कोषाध्यक्ष लक्ष्मण सिंघल, वरिष्ठ उपाध्यक्ष बिजेंद्र सिंह ठेकेदार, सह सचिव विनोद सिकंदराबाद, सह मीडिया प्रभारी लीलू भगत और रवि भाटी, पवन जिंदल (लाल पन्नी), योगेश अग्रवाल, केडी गुर्जर, राजकुमार नागर, महाराज सिंह उर्फ पप्पू, आचार्य सुनीत शुक्ला, अवनीश अवस्थी, राकेश भाटी, राहुल कपासिया, महेश पीलवान, हरीश नागर, गौरव नागर, अजय शर्मा एडवोकेट, हरिकिशन, नवीन देवधर, राजपाल भड़ाना, देवा पंडित, सुनील सौनिक, सचिन भाटी, अरविंद भाटी, सतपाल शर्मा एडवोकेट, मयंक ठाकुर, मदन शर्मा, भगत सिंह आर्य, अज्जू भाटी सहित समिति के अनेक पदाधिकारी और सदस्य उपस्थित रहे।
आस्था का संदेश:
जब परंपरा, श्रद्धा और संस्कृति एक साथ मिलती हैं, तो वह केवल आयोजन नहीं बल्कि समाज की आत्मा बन जाती है। बाराही मेला भी इसी जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जो वर्षों से क्षेत्र की आध्यात्मिक चेतना को जागृत करता आ रहा है।