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“हर शरारत के पीछे एक संकेत” — यथार्थ हॉस्पिटल की पहल से शिक्षकों को मिला बच्चों की छुपी समस्याओं को समझने का नया दृष्टिकोण

स्पेशल न्यूज़ स्टोरी
“हर शरारत के पीछे एक संकेत” — यथार्थ हॉस्पिटल की पहल से शिक्षकों को मिला बच्चों की छुपी समस्याओं को समझने का नया दृष्टिकोण
       मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ नोएडा
आज के प्रतिस्पर्धी और बदलते शैक्षणिक माहौल में अक्सर बच्चों की शरारत, चुप्पी या पढ़ाई में गिरावट को अनुशासनहीनता या लापरवाही समझ लिया जाता है। लेकिन क्या हर शरारत के पीछे कोई गहरा संकेत छुपा हो सकता है? इसी महत्वपूर्ण सवाल को केंद्र में रखते हुए यथार्थ सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, सेक्टर 110, नोएडा ने स्कूल शिक्षकों के लिए एक विशेष स्वास्थ्य जागरूकता अभियान आयोजित किया।
इस प्रभावशाली सत्र में 50 से अधिक शिक्षकों ने सक्रिय भागीदारी की। कार्यक्रम का उद्देश्य स्पष्ट था—शिक्षकों को बच्चों में प्रारंभिक स्वास्थ्य, व्यवहार एवं विकास संबंधी समस्याओं की समय रहते पहचान करने के लिए प्रशिक्षित करना, ताकि विद्यालय केवल पढ़ाई का केंद्र न रहकर संवेदनशील देखभाल का सुरक्षित वातावरण भी बन सके।
कक्षा से क्लिनिक तक: शुरुआती संकेतों की पहचान में शिक्षक की भूमिका
कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रगति जैन (सीनियर कंसल्टेंट – स्त्री एवं प्रसूति रोग) एवं डॉ. रोली मुंशी (सीनियर कंसल्टेंट – पीडियाट्रिक्स एवं नियोनेटोलॉजी) द्वारा किया गया।
डॉ. रोली मुंशी ने अपने संबोधन में कहा कि बच्चों की विकास संबंधी चुनौतियों के शुरुआती संकेत अक्सर घर से अधिक स्कूल में दिखाई देते हैं, क्योंकि बच्चा अपने दिन का बड़ा हिस्सा कक्षा में बिताता है। ऐसे में शिक्षक ही वह पहला व्यक्ति हो सकता है जो समस्या को पहचानकर समय रहते सही दिशा दे सके।
उन्होंने ऑटिज़्म, एडीएचडी (ADHD), डिस्लेक्सिया और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े शुरुआती लक्षणों पर विस्तार से चर्चा की, जैसे—
आंखों से संपर्क न करना
नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया न देना
बोलने में देरी
पढ़ाई में अचानक गिरावट
पढ़ने-लिखने में कठिनाई
अत्यधिक चंचलता या एक स्थान पर न बैठ पाना
साथ ही उन्होंने स्कूल में बढ़ती बुलिंग (Bullying) की समस्या को भी गंभीरता से लेने की सलाह दी। यदि कोई बच्चा स्कूल आने से बचने लगे, अकेला रहने लगे या अत्यधिक चिंतित दिखे, तो यह केवल व्यवहार नहीं बल्कि मदद की पुकार भी हो सकती है।
संवेदनशील संवाद: समाधान की पहली सीढ़ी
सत्र के दौरान विशेषज्ञों ने शिक्षकों को यह समझाया कि किसी भी बच्चे से बातचीत करते समय संवेदनशीलता और धैर्य सबसे जरूरी है।
सलाह दी गई कि—
बच्चे से शांत और निजी वातावरण में बात करें।
डांटने या तुलना करने के बजाय उसकी बात ध्यान से सुनें।
समस्या दिखने पर अभिभावकों को उचित विशेषज्ञ से संपर्क करने के लिए प्रेरित करें।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रारंभिक पहचान और सहयोग से कई जटिल समस्याओं को गंभीर होने से पहले ही नियंत्रित किया जा सकता है।
किशोरावस्था और भावनात्मक देखभाल पर विशेष फोकस
डॉ. प्रगति जैन ने किशोरावस्था, मासिक धर्म, गर्भावस्था जागरूकता और भावनात्मक उतार-चढ़ाव के दौरान बच्चों—विशेषकर किशोरियों—को सही मार्गदर्शन देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि स्वस्थ विकास के लिए डॉक्टर, परिवार और विद्यालय के बीच मजबूत संवाद अत्यंत आवश्यक है। यदि तीनों पक्ष मिलकर काम करें, तो बच्चे का मानसिक और शारीरिक विकास संतुलित रूप से संभव है।
विशेष एंगल: शिक्षा व्यवस्था में ‘भावनात्मक साक्षरता’ की जरूरत
इस कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि इसने शिक्षा व्यवस्था में “भावनात्मक साक्षरता” (Emotional Literacy) की आवश्यकता को रेखांकित किया।
आज के समय में परीक्षा परिणाम और अंक महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण है बच्चे का मानसिक स्वास्थ्य और आत्मविश्वास। कई बार जिसे ‘शरारती’ या ‘कमजोर छात्र’ कह दिया जाता है, वह वास्तव में किसी आंतरिक संघर्ष से गुजर रहा होता है।
कार्यक्रम का केंद्रीय संदेश भी यही रहा—
“हर शरारती बच्चा गलत नहीं होता, हर कमजोर छात्र आलसी नहीं होता। सही समय पर पहचान और सहयोग से शिक्षक किसी बच्चे का जीवन बदल सकते हैं।”
समाज के लिए एक सकारात्मक पहल
यथार्थ सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल की यह पहल केवल एक मेडिकल सेमिनार नहीं, बल्कि समाज के भविष्य—बच्चों—को सुरक्षित और समर्थ बनाने की दिशा में एक सार्थक कदम है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे जागरूकता अभियान नियमित रूप से आयोजित किए जाएं, तो स्कूल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं बल्कि मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा का भी मजबूत स्तंभ बन सकते हैं।
यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि जब स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र मिलकर कार्य करते हैं, तो आने वाली पीढ़ी के लिए एक स्वस्थ, संवेदनशील और संतुलित भविष्य की नींव रखी जा सकती है।