BRAKING NEWS

6/recent/ticker-posts


 

बजट 2026: विकसित भारत के दावों के बीच अन्नदाता, ग्रामीण और आम आदमी की अनदेखी



चौधरी शौकत अली चेची
1 फरवरी 2026, रविवार को आज़ाद भारत में एक बार फिर केंद्रीय बजट पेश किया गया। हर वर्ष की तरह इस बार भी बजट आया, घोषणाएँ हुईं और चला गया—लेकिन कृषि प्रधान देश का अन्नदाता फिर निराशा में डूबा रह गया, अगले वर्ष की उम्मीद के सहारे। चुनाव के समय किसान को जाति और धर्म के जाल में उलझा दिया जाता है, जबकि “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” जैसे नारे केवल भाषणों और घोषणाओं तक सीमित रह जाते हैं।
बजट के आँकड़े और कड़वी हकीकत
कुल बजट ₹53.5 लाख करोड़ का है, जिसमें:
राजस्व व्यय: ₹35.3 लाख करोड़
केंद्र सरकार का प्रस्तावित कर्ज: ₹17.2 लाख करोड़
प्रभावी पूंजीगत व्यय: ₹12.2 लाख करोड़ (लगभग 9% वृद्धि)
राजकोषीय घाटा: GDP का 4.3% (पिछले वर्ष 4.4%)
देश पर कुल कर्ज़ अब लगभग ₹215 लाख करोड़ हो चुका है, जो पिछले वर्ष से लगभग ₹33 लाख करोड़ अधिक है। केवल ₹12 लाख करोड़ तो कर्ज़ के ब्याज में ही चले जाते हैं। इसके बावजूद सरकार और नेताओं की सैर-सपाटे, रैलियाँ, भव्य आयोजन और मीडिया पैकेज पर कोई ठोस कटौती नहीं दिखती।
भारत में प्रति व्यक्ति कर्ज लगातार बढ़ रहा है, डॉलर 100 के बराबर पहुँचने की कोशिश में है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पिछले वर्ष का बजट कहाँ और कितना खर्च हुआ—यह सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
इंफ्रास्ट्रक्चर बनाम किसान
बजट में 7 हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, समर्पित फ्रेट कॉरिडोर, 20 नए राष्ट्रीय जलमार्ग, AI, बायोफार्मा, MSME और सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 जैसे क्षेत्रों पर ज़ोर दिया गया है।
लेकिन किसानों के लिए न तो MSP की कानूनी गारंटी, न 2013 भूमि अधिग्रहण कानून पर कोई चर्चा, न ऋण माफी, न मजबूत फसल बीमा।
कृषि क्षेत्र: घोषणाएँ ज्यादा, राहत कम
कृषि बजट: ₹1.32 लाख करोड़
उर्वरक सब्सिडी: ₹1.70 लाख करोड़ (पिछले वर्ष ₹1.88 लाख करोड़ थी)
उच्च मूल्य फसलें: नारियल, चंदन, कोको, काजू, बादाम
मत्स्य पालन: 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों का विकास
पशुपालन: क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी और डेयरी/पोल्ट्री पर फोकस
लेकिन सच्चाई यह है कि किसानों की लागत बढ़ी है, आय घटी है।
हर वर्ष लगभग 12,000 किसान आत्महत्या कर रहे हैं।
किसान पर औसतन ₹1.40 लाख का कर्ज है, और प्राकृतिक आपदाओं से हर साल लगभग ₹14 लाख करोड़ का नुकसान होता है—इन गंभीर मुद्दों पर बजट पूरी तरह मौन है।
ग्रामीण भारत, महिलाएँ और युवा
MGNREGA: ₹86,000 करोड़ (कोई वृद्धि नहीं)
ग्रामीण बेरोजगारी चरम पर
जल जीवन मिशन में कटौती
यूरिया का बैग 45 किलो से घटाकर 40 किलो
महिलाओं के नाम पर लड़कियों के हॉस्टल और “शी-मार्ट्स” की घोषणा है, लेकिन ग्रामीण महिलाओं और किसान परिवारों की वास्तविक समस्याओं पर कोई ठोस समाधान नहीं।
युवाओं के लिए स्किलिंग की बात है, AVGC सेक्टर में लैब्स की घोषणा है, लेकिन नौकरियाँ नहीं। हर साल 2 करोड़ नौकरियों के वादे से अब 20 लाख पर सिमट जाना सरकार की विफलता को दर्शाता है।
शिक्षा और स्वास्थ्य: सबसे उपेक्षित
शिक्षा: ₹1.28 लाख करोड़ (कुल बजट का <3%)
स्वास्थ्य: ₹98,311 करोड़ (<2%)
महामारी के बाद भी शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं दी गई, जबकि रक्षा बजट ₹7.85 लाख करोड़ का है।
निष्कर्ष
यह बजट इंफ्रास्ट्रक्चर, कॉर्पोरेट और बड़े उद्योगों को केंद्र में रखकर बनाया गया है।
किसान, ग्रामीण, मध्यम वर्ग, महिलाएँ और बेरोजगार युवा—सबकी उपेक्षा साफ़ दिखाई देती है।
अगर यही नीति रही, तो असंतोष बढ़ेगा और “विकसित भारत” का सपना केवल आंकड़ों तक सीमित रह जाएगा।
✍️ लेखक परिचय
चौधरी शौकत अली चेची
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष – किसान एकता (संघ)
पिछड़ा वर्ग सचिव – उत्तर प्रदेश (समाजवादी पार्टी)
किसान, ग्रामीण और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर लंबे समय से सक्रिय सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता।
⚖️ कानूनी डिस्क्लेमर
यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों और विश्लेषण पर आधारित है। इसमें व्यक्त मत किसी संस्था, संगठन या समाचार माध्यम के आधिकारिक विचार नहीं हैं। लेख में प्रस्तुत आँकड़े विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों, बजट दस्तावेज़ों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं। किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार की छवि को ठेस पहुँचाने का उद्देश्य नहीं है। यदि किसी को आपत्ति हो, तो उसे संयोग मात्र माना जाए।