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SIR: मतदाता का अधिकार या लोकतंत्र की भूलभुलैया ?गौतमबुद्ध नगर से उठते गंभीर सवाल

चौधरी शौकत अली चेची
सरकार के आदेश के अनुपालन में चुनाव आयोग द्वारा अक्टूबर 2025 से 12 राज्यों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया प्रारंभ की गई। इसके तहत 6 जनवरी 2026 को ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल जारी किया गया तथा 6 मार्च 2026 को फाइनल डेटा प्रकाशित किया जाना प्रस्तावित है।
लेकिन यह प्रक्रिया मतदाता अधिकारों को सुदृढ़ करने की दिशा में है या लोकतांत्रिक प्रणाली को जटिल बनाने वाली भूलभुलैया, यह प्रश्न अब गंभीर रूप ले चुका है।
गौतमबुद्ध नगर: SIR के आँकड़े क्या कहते हैं?
गौतमबुद्ध नगर जिला प्रशासन द्वारा जारी SIR आँकड़ों के अनुसार—
SIR से पूर्व कुल पंजीकृत मतदाता: 18,65,673
जिले की अनुमानित जनसंख्या: लगभग 25 लाख
डिजिटाइज्ड फॉर्म: 14,18,202
सफलतापूर्वक मैप्ड मतदाता: 12,41,974
नॉन-मैप्ड मतदाता: 1,76,228
प्रशासन का कहना है कि इन नॉन-मैप्ड मतदाताओं को शीघ्र नोटिस जारी किए जाएंगे तथा उन्हें वर्ष 2003 की मतदाता सूची से जुड़े साक्ष्य एक माह के भीतर प्रस्तुत करने होंगे।
विधानसभा-वार स्थिति
नोएडा (61)
कुल मतदाता: 7,71,082
डिजिटाइज्ड: 5,62,032
मैप्ड: 5,04,528
नॉन-मैप्ड: 57,504
दादरी (62)
कुल मतदाता: 7,26,828
डिजिटाइज्ड: 5,62,671
मैप्ड: 4,63,813
नॉन-मैप्ड: 98,858
जेवर (63)
कुल मतदाता: 3,67,763
डिजिटाइज्ड: 2,93,499
मैप्ड: 2,73,633
नॉन-मैप्ड: 19,866
25% वोटर कम कैसे हो गए?
SIR प्रक्रिया में यह तथ्य सामने आया कि जिले में अनुपस्थित, स्थानांतरित या मृत मतदाताओं की संख्या 4,47,471 बताई गई है।
यह लगभग 25% की गिरावट दर्शाती है, जो स्वाभाविक प्रतीत नहीं होती, क्योंकि—
हर चुनाव में मतदाता संख्या और पोलिंग बूथ दोनों बढ़ते हैं
इस बार पोलिंग बूथ लगभग 200 से अधिक बढ़े, लेकिन
मतदाता संख्या घट गई
तर्क दिया गया कि मतदाता की दूरी कम करने हेतु एक बूथ पर 1500 की जगह 1200 वोटर रखे जाएंगे।
लेकिन सवाल यह है कि जब मतदान प्रतिशत सामान्यतः 40% से 60% के बीच रहता है, तो क्या कभी यह अध्ययन हुआ कि 40% मतदान न करने वाले मतदाता कौन हैं और क्यों मतदान नहीं करते?
पोलिंग बूथ बढ़ने से लाभ किसे, नुकसान किसे?
पोलिंग बूथ की संख्या बढ़ना अपने-आप में सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन जब इसके साथ मतदाता सूची से नाम बड़े पैमाने पर कटें, तो यह विषय गंभीर बहस की मांग करता है।
किसान, आम जनता और सरकारी प्राथमिकताएँ
देश का किसान यूरिया और डीएपी के लिए पैसे देकर भी
घंटों लाइन में खड़ा रहता है
लाठियाँ खाता है
अपमानित होता है
लेकिन किसान की सुविधा को लेकर सरकार और प्रशासन की गंभीरता सवालों के घेरे में है।
इसी तरह आम जनता जाम और लाइनों में घंटों बर्बाद करती है, पर व्यवस्थागत सुधार दिखाई नहीं देते।
गौतमबुद्ध नगर की राजनीतिक हकीकत
गौतमबुद्ध नगर में 2.5 लाख से अधिक मुस्लिम आबादी होने के बावजूद
न तो प्रभावी नेतृत्व दिखाई देता है
न ही संगठित राजनीतिक रणनीति
वहीं 2027 विधानसभा चुनाव के संभावित विपक्षी प्रत्याशी
2-4 समर्थकों के साथ हाईकमान को सलामी देने में व्यस्त हैं
जमीनी संघर्ष और मतदाता जागरूकता पर गंभीर नहीं दिखते
इसके विपरीत, बीजेपी के नेता और कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर सक्रिय और संगठित दिखाई देते हैं।
एक उदाहरण: वोट कटे, फिर भी जीत
यह प्रश्न उठाता है—
ज्यादा जागरूक कौन था—उम्मीदवार या मतदाता?
उत्तर प्रदेश का बड़ा परिदृश्य
2027 से पहले 15,030 नए पोलिंग बूथ जोड़े गए
कुल पोलिंग बूथ: 1,77,516 (पहले 1,62,486)
उत्तर प्रदेश में: 403 विधानसभा, 75 जिले
पुराने रिकॉर्ड के अनुसार—
पहले मतदाता: 15.45 करोड़
अब बताए जा रहे: 12.55 करोड़
अर्थात
2.89 करोड़ मतदाता कम
लगभग 19% वोट कटे
1.05 करोड़ नाम 2003 की सूची में नहीं मिले
यह सब संकेत करता है कि
पोलिंग बूथ बढ़ना और वोटर कम होना केवल संयोग नहीं, बल्कि रणनीति भी हो सकती है।
2024 लोकसभा चुनाव का संदर्भ
INDIA गठबंधन: 43 सीटें, 43.52% वोट
NDA गठबंधन: 36 सीटें, 43.69% वोट
मत प्रतिशत लगभग समान, लेकिन सीटों में अंतर—
यह भी चुनावी प्रणाली की जटिलताओं को दर्शाता है।
निष्कर्ष
विपक्षी दलों को
भांग का नशा उतारकर
जनता के असल अधिकारों पर
ग्राउंड लेवल पर संघर्ष करना होगा
“सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटने से क्या फायदा?”
जनता को दोष देने से भी समाधान नहीं निकलेगा।
लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब
मतदाता जागरूक होगा
नेतृत्व जिम्मेदार होगा
और संविधान सर्वोपरि रहेगा
जय हिंद, जय संविधान
हम सबका भारत — देश महान!
✍️ लेखक परिचय
चौधरी शौकत अली चेची
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष — किसान एकता (संघ)
पिछड़ा वर्ग सचिव, उत्तर प्रदेश — समाजवादी पार्टी
लेखक किसान, सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक अधिकार और चुनावी पारदर्शिता से जुड़े विषयों पर लंबे समय से सक्रिय हैं।
⚖️ कानूनी डिस्क्लेमर
यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों, विश्लेषण और उपलब्ध सरकारी आँकड़ों पर आधारित है।
लेख में व्यक्त मत किसी संस्था, निर्वाचन आयोग या सरकार की आधिकारिक राय नहीं हैं।
प्रस्तुत सामग्री का उद्देश्य लोकतांत्रिक विमर्श, जनजागरूकता और संवैधानिक अधिकारों पर चर्चा को बढ़ावा देना है, न कि किसी व्यक्ति, संस्था या राजनीतिक दल को ठेस पहुँचाना।