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EXCLUSIVE | मनरेगा बचाओ संग्राम: जब गाँव की चौपाल ने सरकार से सीधे सवाल पूछे


गौतमबुद्ध नगर में मजदूरों का गुस्सा, सिस्टम की चुप्पी और आंदोलन की आहट
 मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ग्रेटर नोएडा/दादरी 
सरकारी फाइलों में मनरेगा अभी भी “चल रही योजना” है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में यह योजना संघर्ष बन चुकी है। जनपद गौतमबुद्ध नगर के दादरी विधानसभा क्षेत्र की नई बस्ती ग्राम पंचायत में आयोजित मनरेगा बचाओ संग्राम की अंतिम चरण की ग्राम चौपाल ने यह साफ कर दिया कि ग्रामीण भारत अब सिर्फ सुन नहीं रहा, सवाल पूछ रहा है।
महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर पुष्पांजलि अर्पित कर शुरू हुई चौपाल एक सामान्य राजनीतिक सभा नहीं थी, बल्कि यह ग्रामीण मजदूरों की खुली अदालत थी, जहाँ हर आवाज़ अपने हक की गवाही दे रही थी।
काम माँगो तो आवेदन रद्द, मजदूरी माँगो तो चुप्पी”
चौपाल में ग्रामीणों ने खुलकर बताया कि मनरेगा के तहत काम माँगने पर आवेदन निरस्त कर दिए जाते हैं और जिनका काम हो भी गया, उनकी मजदूरी महीनों तक अटकी रहती है।
ग्रामीण महिला मजदूर सुनीता देवी ने कहा,
“हमने काम किया, लेकिन पैसे नहीं आए। बच्चों की फीस और राशन उधार से चल रहा है।”
यह बयान सिर्फ एक महिला का नहीं, बल्कि हजारों मनरेगा मजदूरों की पीड़ा है।
22 ग्राम चौपाल, एक ही दर्द की कहानी
12 जनवरी से शुरू हुए मनरेगा बचाओ संग्राम के तहत अब तक 22 ग्राम चौपालें आयोजित की जा चुकी हैं। हर गाँव से वही शिकायतें सामने आईं—
काम के दिनों में लगातार कटौती
समय पर भुगतान नहीं
पंचायत स्तर पर मनमानी
प्रशासनिक अनदेखी
यह साबित करता है कि समस्या व्यक्तिगत नहीं, सिस्टमेटिक फेल्योर है।
यह आत्मनिर्भर भारत नहीं, मजदूर को असहाय बनाने की साजिश है”
चौपाल को संबोधित करते हुए जिला कांग्रेस अध्यक्ष दीपक भाटी चोटीवाला ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार मनरेगा को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर कर रही है ताकि गरीबों का सहारा छीन लिया जाए और गाँव से शहरों की ओर पलायन बढ़े।
उन्होंने दो टूक कहा,
“मनरेगा गरीबों की जीवन रेखा है, और इसे काटना ग्रामीण भारत की कमर तोड़ने जैसा है।”
अब आंदोलन की अगली रणनीति तय
इस चौपाल में यह भी स्पष्ट किया गया कि आंदोलन अब नए चरण में जाएगा।
25 फरवरी तक जिला स्तरीय घेराव, रैलियाँ और प्रदर्शन किए जाएंगे, ताकि मनरेगा का मुद्दा सिर्फ पंचायत तक सीमित न रहे, बल्कि राष्ट्रीय जन आंदोलन बने।
EXCLUSIVE एंगल: चौपाल बनी जनता का संसद
नई बस्ती की चौपाल की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि यहाँ भाषण कम और जनता की गवाही ज़्यादा थी।
यहाँ मजदूर नेता नहीं बने, बल्कि नेताओं को जवाबदेह बनाने वाले नागरिक बने।
यह चौपाल सत्ता और सिस्टम के बीच खड़ी उस दीवार की कहानी कहती है, जिसे अब गाँव तोड़ना चाहता है।
यह सिर्फ एक कार्यक्रम की रिपोर्ट नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की चेतावनी है—
अगर मनरेगा कमजोर हुआ, तो आंदोलन मजबूत होगा।