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वादे हैं वादों का क्या ?



महंगाई, अधिकारों का ह्रास और 85% जनता की टूटती कमर
चौधरी शौकत अली चेची
भारत एक कृषि प्रधान देश है, लेकिन आज वही अन्नदाता सबसे अधिक असुरक्षित, कर्जदार और हताश नजर आता है। 2014 के बाद विकास के दावों के बीच देश की 85% आम जनता महंगाई, टोल टैक्स, शिक्षा और चिकित्सा की मार झेल रही है, जबकि केवल 15% वर्ग के लिए व्यवस्था “बल्ले–बल्ले” साबित हुई है। आंकड़े सिर्फ चौंकाते नहीं, बल्कि रोंगटे खड़े कर देते हैं।
1. किसान: जो दर्द लेकर सोता है, वही लेकर जागता है
देश में लगभग 15 करोड़ किसान बताए जाते हैं, लेकिन वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है। आज स्थिति यह है कि 60% किसान खेती छोड़ना चाहते हैं, क्योंकि खेती अब घाटे का सौदा बन चुकी है।
2014 से पहले किसानों पर कर्ज लगभग ₹7 लाख करोड़ था
आज यह बढ़कर ₹25 लाख करोड़ से अधिक हो चुका है
प्रति किसान औसत कर्ज ₹1.40 लाख तक पहुंच गया है
शुद्ध दैनिक आय मात्र ₹29 प्रतिदिन
कर्ज, महंगे इनपुट और फसल का सही मूल्य न मिलने के कारण हर वर्ष लगभग 12,000 किसान आत्महत्या कर रहे हैं।
डीजल, पेट्रोल, बिजली, खाद, बीज, दवाई, कृषि यंत्र, मजदूरी, किराया—सब कुछ महंगा है। ऊपर से नकली बीज और दवाइयां किसानों को बर्बादी की ओर धकेल रही हैं।
बरसात, ओलावृष्टि, बाढ़ और आवारा पशुओं से हर वर्ष ₹14 लाख करोड़ से अधिक का नुकसान होता है।
यदि सभी फसलों पर MSP लागू हो और 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून सही ढंग से लागू किया जाए तो किसानों की आय में लगभग 50% तक सुधार संभव है। ₹6000 की सम्मान निधि और जबरन भूमि अधिग्रहण किसान के साथ मज़ाक है।
जल–जंगल–ज़मीन पर कब्जा अन्नदाता की रीढ़ तोड़ रहा है।
2. टोल टैक्स: सड़कें कम, वसूली ज्यादा
राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल टैक्स आम जनता के लिए एक बड़ी आर्थिक सजा बन चुका है।
नियम अनुसार 60 किमी पर टोल होना चाहिए, पर कई जगह 30 किमी में ही टोल
हर साल 6% बढ़ोतरी
देश में लगभग 5000 टोल बूथ
2021 में NHAI पर ₹5 लाख करोड़ कर्ज, अब भी ₹2.5 लाख करोड़ के आसपास
पिछले वर्षों में ₹2.5 लाख करोड़ की टोल वसूली
वाहन मालिक पहले ही रोड टैक्स, इंश्योरेंस, पॉल्यूशन, पेट्रोल-डीजल, स्पेयर पार्ट्स पर टैक्स दे चुका है—फिर टोल टैक्स क्यों?
20 किमी के दायरे में रहने वालों के लिए टोल फ्री नियम है, लेकिन अमल नहीं।
NHAI हेल्पलाइन 1033 पर 15 लाख शिकायतें दर्ज हुईं, फिर भी व्यवस्था जस की तस।
3. शिक्षा: अधिकार नहीं, व्यापार बन गई
शिक्षा की महंगाई:
औसतन 6% सालाना, प्राइवेट स्कूलों में 15% तक
लाखों सरकारी स्कूल बंद
सरकारी स्कूलों में संसाधनों की भारी कमी
CBSE कोर्स हर साल बदलता है, जिससे खर्च 3 गुना बढ़ जाता है
शिक्षा पर सालाना खर्च ₹10,000 से ₹50,000 तक
एडमिशन के नाम पर लाखों रुपये की डोनेशन, आरक्षण में धांधली और निजी स्कूलों की तानाशाही आम बात हो चुकी है।
भारत में MBBS की पढ़ाई करोड़ों में, जबकि विदेशों में ₹27 लाख में पूरी हो जाती है।
4. चिकित्सा: बीमारी से पहले ही कर्ज
स्वास्थ्य सेवाएं:
सालाना 16% महंगाई
दवाइयों और जांच में 30% से 75% तक बढ़ोतरी
3000 से अधिक दवाइयों की कीमत बढ़ी
बीमा का लाभ केवल 6% लोगों को
सरकारी अस्पताल कमजोर, निजी अस्पताल महंगे और बीमा सीमित। इलाज आज 50% से अधिक महंगा हो चुका है।
ईमानदार दवा विक्रेता पर कानून का डंडा, लेकिन नकली दवाइयों और लूट पर कोई रोक नहीं।
निष्कर्ष: 60% कमाई सिर्फ जीने में खर्च
आज एक आम भारतीय की 60% से अधिक आय टोल, शिक्षा, चिकित्सा और खाद्यान्न पर खर्च हो जाती है।
यह केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय है।
“सब कुछ हमने सीखा नहीं, सीखी होशियारी—
सच है दुनिया वालों, हम हैं अनाड़ी।”
यह पंक्तियां आज की व्यवस्था पर करारा व्यंग्य हैं।
अब सरकारों, बुद्धिजीवियों और समाज को आत्मचिंतन करना होगा।
✍️ लेखक परिचय
चौधरी शौकत अली चेची
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष – किसान एकता (संघ)
पिछड़ा वर्ग सचिव – समाजवादी पार्टी, उत्तर प्रदेश
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, किसान अधिकार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य नीति पर लगातार लेखन एवं जनआंदोलन से जुड़े रहे हैं।
वे जमीनी स्तर पर किसानों, मजदूरों और वंचित वर्गों की आवाज़ उठाने के लिए जाने जाते हैं।
⚖️ कानूनी डिस्क्लेमर (Legal Disclaimer)
यह लेख लेखक के व्यक्तिगत अध्ययन, सार्वजनिक आंकड़ों, मीडिया रिपोर्ट्स और सामाजिक अनुभवों पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार पूर्णतः लेखक के निजी हैं। प्रस्तुत आंकड़े विभिन्न सरकारी/गैर-सरकारी स्रोतों पर आधारित अनुमानित जानकारी हैं। किसी संस्था, सरकार या व्यक्ति पर आरोप लगाना उद्देश्य नहीं है। पाठक इसे जनहित विमर्श के रूप में लें।