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“मनरेगा सिर्फ योजना नहीं, गांव की जीवनरेखा – कोट-डेरीन की चौपाल से उठी रोजगार की आवाज़”

मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ गौतमबुद्धनगर 
कोट-डेरीन गांव की चौपाल इस बार किसी सामान्य बैठक का स्थल नहीं थी, बल्कि यह उस संघर्ष की आवाज़ बन गई जहाँ मजदूर, किसान और ग्रामीण एक साथ खड़े होकर अपने हक की बात कर रहे थे। जिला कांग्रेस गौतमबुद्ध नगर द्वारा आयोजित मनरेगा बचाओ संग्राम की इस ग्राम चौपाल में राजनीति से ज्यादा रोटी, रोजगार और सम्मान का सवाल केंद्र में रहा।
गांव के बुजुर्ग मजदूरों से लेकर युवा किसानों तक, हर चेहरा यह सवाल पूछ रहा था – “अगर मनरेगा कमजोर हुई तो गांव कैसे बचेगा?”
यही सवाल इस चौपाल का असली एजेंडा बन गया।
जब योजना नहीं, जीवन पर संकट हो
ग्रामीणों ने बताया कि मनरेगा सिर्फ 100 दिन के काम की योजना नहीं है, बल्कि यह
पलायन रोकने की ढाल है
गरीब परिवारों की आर्थिक रीढ़ है
महिलाओं के आत्मसम्मान का साधन है
गांव की अर्थव्यवस्था की सांस है
ऐसे में मनरेगा के बजट, भुगतान और काम के दिनों में कटौती को ग्रामीणों ने अपने जीवन पर सीधा हमला बताया।
चौपाल में सियासत नहीं, सच्चाई की चर्चा
जिला कांग्रेस अध्यक्ष दीपक भाटी चोटीवाला ने जब सरकार की नीतियों की ‘क्रोनोलॉजी’ रखी तो चौपाल में सन्नाटा छा गया। भूमि अधिग्रहण, नोटबंदी, जीएसटी और कृषि कानूनों के बाद अब मनरेगा को कमजोर करने का मुद्दा ग्रामीणों के लिए पूरी तस्वीर साफ कर गया।
ग्रामीणों का कहना था कि अब यह लड़ाई किसी पार्टी की नहीं, गांव के अस्तित्व की लड़ाई है।
गजन सिंह की अगुवाई में गांव-गांव चेतना
ग्राम चौपाल के संयोजक गजन सिंह प्रधान ने स्पष्ट कहा कि यह संघर्ष यहीं नहीं रुकेगा।
अब हर पंचायत में चौपाल लगेगी, हर मजदूर को उसका अधिकार याद दिलाया जाएगा और मनरेगा को कमजोर करने की कोशिशों का संगठित विरोध होगा।
संकल्प से आंदोलन तक
चौपाल के अंत में सिर्फ भाषण नहीं हुए, बल्कि संकल्प लिया गया –
पंचायत स्तर पर जागरूकता अभियान तेज होगा
मजदूरों को संगठित किया जाएगा
मनरेगा को मूल स्वरूप में बहाल कराने तक संघर्ष जारी रहेगा
कोट-डेरीन की यह चौपाल बताती है कि मनरेगा अब सिर्फ सरकारी योजना नहीं रही, बल्कि गांव की अस्मिता का सवाल बन चुकी है।
यहीं से मनरेगा बचाओ संग्राम को नई धार और नई दिशा मिलती दिख रही है।