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खामोशी में दबी चीखें और बदलाव की पुकार:-- इशिका भाटी की स्मृति में श्रद्धांजलि व विचार गोष्ठी

खामोशी में दबी चीखें और बदलाव की पुकार
इशिका भाटी की स्मृति में श्रद्धांजलि व विचार गोष्ठी — एक मार्मिक, चेतावनी देती विशेष स्टोरी
मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ ग्रेटर नोएडा 
ग्राम बढ़पुरा की उस सुबह में कुछ अलग था। हवा में शोक था, लोगों की आंखों में आक्रोश और मन में अपराधबोध। यह केवल एक श्रद्धांजलि सभा नहीं थी, बल्कि समाज की सामूहिक आत्मा का वह क्षण था, जब हर व्यक्ति खुद से सवाल कर रहा था—क्या हम सब भी कहीं न कहीं इस अपराध के भागीदार हैं?
दिवंगत इशिका भाटी की तस्वीर के सामने जली मोमबत्तियां, चढ़ाए गए फूल और मौन खड़े लोग इस बात के गवाह थे कि एक बेटी की हत्या सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज की हार है। दहेज एक अभिशाप निवारण समिति और ग्रामवासियों द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम दर्द, पश्चाताप और संकल्प का संगम बन गया।
एक हंसती-खेलती बेटी से ‘मामला नंबर’ तक
24 दिसंबर… वह तारीख अब ग्राम बढ़पुरा के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज हो चुकी है। जिस बेटी को हंसी-खुशी विदा किया गया था, वही बेटी कुछ ही समय में दहेज की भूख की बलि चढ़ा दी गई। गांव गोठरा, जनपद बागपत स्थित ससुराल में हुई इस निर्मम हत्या ने यह साबित कर दिया कि कानून का डर तब तक बेमानी है, जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी।
मामले में दहेज हत्या के तहत सात लोगों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की गई, दो गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन गांव के बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक एक ही सवाल था—क्या केवल गिरफ्तारी से इशिका को न्याय मिल जाएगा?
जब मंच पर टूटती आवाजें और कांपते शब्द
विचार गोष्ठी में बोलते हुए दहेज एक अभिशाप निवारण समिति की अध्यक्षा निर्मल डेढा भावुक हो उठीं। उन्होंने कहा,
“जब तक हम बेटी को बोझ और बहू को नौकरानी समझते रहेंगे, तब तक ऐसी घटनाएं रुकेंगी नहीं। बदलाव की शुरुआत घर के अंदर से करनी होगी।”
उनके शब्दों में केवल आक्रोश नहीं, बल्कि वर्षों का सामाजिक दर्द झलक रहा था। सभा में मौजूद कई महिलाओं की आंखें भर आईं—मानो हर एक ने अपने भीतर इशिका की परछाईं देख ली हो।
कानून तब तक कमजोर है, जब तक समाज मजबूत नहीं
समिति के संस्थापक सदस्य आर्य सागर खारी ने दो टूक शब्दों में कहा कि यह लड़ाई सिर्फ भावनाओं की नहीं, बल्कि न्याय और कानून की भी है।
“हम पीड़ित परिवार के साथ आखिरी सांस तक खड़े हैं। जब तक सभी आरोपी जेल नहीं जाएंगे, यह संघर्ष जारी रहेगा।”
उनकी बातों ने यह साफ कर दिया कि यह मामला सिर्फ एक खबर बनकर नहीं रह जाएगा।
वह सच्चाई, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं
समिति के संस्थापक मास्टर मनमिंदर भाटी ने समाज की उस कड़वी सच्चाई को सामने रखा, जिस पर अक्सर चुप्पी साध ली जाती है।
उन्होंने कहा, “आज 40-40 साल की बेटियां केवल इसलिए कुंवारी बैठी हैं क्योंकि उनके माता-पिता दहेज नहीं दे सकते। क्या यही हमारा सभ्य समाज है?”
सभा में सन्नाटा छा गया। यह सन्नाटा किसी प्रश्न का उत्तर नहीं, बल्कि स्वीकारोक्ति था।
इशिका की बेटी—दर्द से उम्मीद तक
कार्यक्रम का सबसे भावनात्मक क्षण तब आया, जब समिति के संयोजक वीरचंद डेढा ने इशिका की बेटी के भविष्य को लेकर घोषणा की।
उन्होंने कहा कि समिति उसकी शिक्षा और आर्थिक सहायता की जिम्मेदारी निभाएगी।
यह घोषणा केवल सहायता नहीं थी, बल्कि यह भरोसा था कि इशिका की बेटी को समाज अनाथ नहीं छोड़ेगा।
जब संकल्प शब्द नहीं, जिम्मेदारी बन गया
सभा के अंत में उपस्थित लोगों ने दहेज न लेने और न देने का सामूहिक संकल्प लिया। यह संकल्प मंच तक सीमित नहीं रहा—यह हर घर तक पहुंचने का वादा बन गया।
कार्यक्रम का संचालन आर्य सागर खारी ने किया। इस अवसर पर राष्ट्रीय महासचिव महेंद्र राठी, विधिक सलाहकार एडवोकेट सीमा चौधरी, वीर सिंह डेढा, वीरचंद भड़ाना, मनविंदर भाटी, भारतीय किसान यूनियन मंच के जिला अध्यक्ष अक्षय मुखिया, समाजवादी नेता अक्षय चौधरी, पन्नाधाय ट्रस्ट की सदस्य मानसी अवाना सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण, सामाजिक कार्यकर्ता और पीड़ित परिवार मौजूद रहा।
अंत में एक सवाल, जो हर दिल में रह गया
सभा समाप्त हुई, लोग अपने-अपने घर लौट गए, लेकिन इशिका भाटी का नाम वहां मौजूद हर व्यक्ति के दिल में रह गया। सवाल साफ है—
क्या यह सभा एक औपचारिकता थी, या वाकई समाज अब बदलने को तैयार है?
इशिका भाटी की स्मृति में आयोजित यह श्रद्धांजलि सभा सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि एक चेतावनी थी—अगर अब भी नहीं बदले, तो अगली इशिका का नाम किसी और गांव से आएगा।
यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती…
यह समाज की परीक्षा है।