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जमीनी स्तर पर संस्कारों की अलख: दनकौर में सामाजिक चेतना की नई पहल

   मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ गौतमबुद्धनगर
दनकौर  के थाना रोड स्थित रमेश मिष्ठान भंडार केवल एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान नहीं, बल्कि अब सामाजिक विमर्श और राष्ट्रनिर्माण से जुड़े विचारों का केंद्र बनता नजर आया। यहीं विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान से जुड़े संस्कार केन्द्र के विस्तार और सामाजिक भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई, जिसने क्षेत्र में संस्कार आधारित शिक्षा के नए अध्याय की नींव रखी।
इस बैठक की सबसे खास बात यह रही कि चर्चा केवल संगठनात्मक ढांचे तक सीमित नहीं रही, बल्कि दलित एवं वंचित समाज को जाग्रत करने, नैतिक मूल्यों को मजबूत करने और बाल-युवाओं में संस्कारों के बीजारोपण जैसे व्यापक सामाजिक सरोकारों पर गंभीर मंथन हुआ।
बैठक में संस्कार केन्द्र के सम्भाग प्रमुख योगेन्द्र सिंह राणा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “दलित व वंचित समाज को जाग्रत करना हम सभी का प्रथम कर्तव्य है। जब तक समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को संस्कार और शिक्षा से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक समग्र राष्ट्र विकास की कल्पना अधूरी रहेगी।” उनका यह वक्तव्य बैठक का केंद्रीय विचार बनकर उभरा।
संस्कार केन्द्र के खंड प्रमुख अनिल कुमार गोयल ने दनकौर क्षेत्र में संस्कार केन्द्र की गतिविधियों, उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं को विस्तार से रखा। वहीं सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज दनकौर के प्रधानाचार्य जय प्रकाश सिंह ने संस्कार केन्द्र को विद्यालयों और समाज के बीच सेतु बताते हुए इसके शैक्षिक और नैतिक महत्व को रेखांकित किया।
बैठक की अध्यक्षता कर रहे जय प्रकाश सिंह की मौजूदगी में सर्वसम्मति से अनिल कुमार गोयल को खंड संस्कार केन्द्र प्रमुख तथा नरेंद्र नागर को सह खंड संस्कार केन्द्र प्रमुख मनोनीत किया गया। यह मनोनयन केवल दायित्व नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की जिम्मेदारी के रूप में देखा जा रहा है।
बैठक में जितेन्द्र कुमार नागर (समाजसेवी), देवदत्त शर्मा (प्रधानाचार्य, सरस्वती शिशु मंदिर जूनियर हाई स्कूल) सहित कई शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की सहभागिता ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया कि दनकौर में संस्कार केन्द्र अब एक संगठित सामाजिक अभियान का रूप ले रहा है।
"विजन लाइव "का विश्लेषण
यह बैठक केवल एक संगठनात्मक निर्णय नहीं, बल्कि समाज के नैतिक पुनर्निर्माण और वंचित वर्ग को मुख्यधारा से जोड़ने की ठोस पहल के रूप में देखी जा रही है। दनकौर से उठी यह संस्कार की लौ आने वाले समय में पूरे क्षेत्र को सामाजिक चेतना से आलोकित करने की क्षमता रखती है।