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धरना, वार्ता और जुगलबंदी के बीच पिसता आम किसान


नोएडा–ग्रेटर नोएडा–यीडा में किसान आंदोलन की अंदरूनी कहानी (व्यंग्य)
-मौहम्मद इल्यास “दनकौरी”-
गौतमबुद्धनगर के नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) क्षेत्र में यदि किसी चीज़ का सबसे तेज़ विकास हुआ है, तो वह है— धरना संस्कृति, वार्ता संस्कृति और किसान नेताओं की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत।
इन सबके बीच जो लगातार हाशिये पर धकेला जा रहा है, वह है— बेचारा आम किसान, जो हर आंदोलन में सिर्फ़ भीड़ बनकर रह जाता है।
धरना: मुद्दे किसानों के, मंच नेताओं के
यहाँ धरना अब संघर्ष नहीं, बल्कि एक पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम बन चुका है।
बैनर लगते हैं, मंच सजता है, माइक पर वही चेहरे दिखाई देते हैं।
आम किसान सुबह खेत छोड़कर आता है, नारे लगाता है और शाम को इस उम्मीद में लौटता है कि “अबकी बार कुछ तो बदलेगा।”
पर बदलता क्या है?
बयान बदलते हैं
तारीख़ बदलती है
मुद्दे वही रहते हैं
वार्ता: जहाँ किसान की जगह कुर्सियाँ तय होती हैं
धरने के बाद होती है वार्ता।
किसानों के नाम पर, लेकिन किसानों के बिना।
अंदर वही सीमित चेहरे, बाहर सैकड़ों किसान इंतज़ार में।
हर वार्ता के बाद एक तयशुदा वाक्य उछाला जाता है—
“वार्ता सकारात्मक रही।”
सवाल यह है कि यह सकारात्मकता किसके खाते में जाती है?
किसान नेता और अधिकारियों की जुगलबंदी
दिखने में यह संघर्ष लगता है, पर भीतर से यह एक संतुलित तालमेल है।
न ज़्यादा टकराव, न ज़्यादा समाधान।
धरना चलता रहे, सिस्टम चलता रहे और किसान उलझा रहे।
यहाँ आंदोलन व्यवस्था को हिलाने के लिए नहीं, बल्कि दबाव को नियंत्रित करने के लिए दिखाई देता है।
सरकार के इशारे और नियंत्रित आंदोलन
किसान अब यह सवाल पूछने लगा है कि—
क्या हर आंदोलन सचमुच किसानों की पीड़ा से उपजता है, या कई बार यह राजनीतिक जरूरत के हिसाब से गर्म और ठंडा किया जाता है?
जब ज़रूरत होती है—
भीड़ जुटती है
नारे गूंजते हैं
जब ज़रूरत खत्म—
आंदोलन ठंडा
किसान अकेला
किसान नेताओं की बढ़ती संपत्ति, घटती किसान हैसियत
सबसे बड़ा व्यंग्य यहीं छुपा है।
जो किसान नेता आंदोलन की अगुवाई करते हैं, उनकी—
संपत्ति बढ़ती है
पहचान बढ़ती है
पहुँच बढ़ती है
और आम किसान?
वह आज भी—
मुआवज़े के लिए दफ्तरों के चक्कर काटता है
आबादी प्लॉट के नाम पर फाइल ढोता है
शिफ्टिंग की प्रतीक्षा में साल गिनता है
आबादी प्लॉट शिफ्टिंग: उम्मीदों का अंतहीन चक्कर
नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यीडा में आबादी प्लॉट शिफ्टिंग अब प्रक्रिया नहीं, परीक्षा बन चुकी है।
कभी सर्वे अधूरा, कभी नीति संशोधित, कभी सूची लंबित।
किसान की ज़मीन तो चली गई, पर बदले में मिला—
इंतज़ार।
भीड़ बनकर रह गया किसान
धीरे-धीरे किसान समझने लगा है कि—
वह फैसले का हिस्सा नहीं
वार्ता की मेज़ पर उसकी कुर्सी नहीं
आंदोलन में उसकी भूमिका सिर्फ़ संख्या तक सीमित है
वह सिर्फ़ भीड़ है
जिससे ताकत दिखाई जाती है,
लेकिन जिसे ताकत नहीं दी जाती।
निष्कर्ष: किसान को नायक नहीं, न्याय चाहिए
यह लेख किसी व्यक्ति या संगठन पर नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र पर व्यंग्य है, जहाँ किसान का नाम तो लिया जाता है, पर उसकी ज़िंदगी नहीं बदली जाती।
जब तक किसान—
सवाल नहीं पूछेगा
भीड़ बनने से इनकार नहीं करेगा
और अपने तथाकथित रहनुमाओं से जवाबदेही नहीं मांगेगा
तब तक धरने चलते रहेंगे, वार्ताएँ होती रहेंगी, जुगलबंदी मजबूत होती जाएगी—
और आम किसान यूँ ही पिसता रहेगा।
✍️ लेखक परिचय
मौहम्मद इल्यास “दनकौरी”
लेखक:- विजन लाइव के प्रधान संपादक, वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक एवं विचारक हैं।
वे लंबे समय से नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना प्राधिकरण एवं ग्रामीण-किसान मुद्दों पर जमीनी, निर्भीक और जनपक्षीय लेखन करते आ रहे हैं।
उनकी लेखनी की पहचान—
सत्ता और व्यवस्था का यथार्थवादी विश्लेषण
आम किसान और आम आदमी की आवाज़
व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर सटीक प्रहार
⚖️ कानूनी डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)
यह लेख लेखक के निजी विचारों, सामाजिक अनुभवों एवं व्यंग्यात्मक विश्लेषण पर आधारित है।
लेख का उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, संगठन या प्रशासनिक इकाई की मानहानि करना नहीं है।
लेख में प्रयुक्त घटनाएँ एवं पात्र प्रतीकात्मक हैं।
किसी प्रकार की समानता यदि प्रतीत होती है, तो वह संयोग मात्र है।
यह लेख अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं जनहित के उद्देश्य से लिखा गया है।
पाठक इससे सहमत या असहमत हो सकते हैं, यह उनका निजी अधिकार है।