BRAKING NEWS

6/recent/ticker-posts


 

दनकौर–मंझावली यमुना पुल: 36 वर्षों का इंतजार, बदली सरकारें और आखिरकार विकास की जीत


 मौहम्मद इल्यास-"दनकौरी"/ ग्रेटर नोएडा
यमुना नदी के दोनों किनारों पर बसे गांवों के लिए दनकौर–मंझावली यमुना पुल केवल कंक्रीट और लोहे का ढांचा नहीं है, बल्कि यह तीन पीढ़ियों की प्रतीक्षा, अधूरी घोषणाओं और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों की जीवंत कहानी है। यह पुल उस भरोसे का प्रतीक है, जो कभी टूटा, कभी डगमगाया, लेकिन आखिरकार साकार हुआ।
कांग्रेस सरकार में रखी गई थी, पहली नींव
उत्तर प्रदेश में जब कांग्रेस की अंतिम सरकार नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में थी, उसी दौरान दनकौर–मंझावली यमुना पुल की पहली बार औपचारिक शुरुआत हुई।
नौरंगपुर गांव के पास तत्कालीन केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री राजेश पायलट और केंद्रीय मंत्री डॉ. अंबार रिजवी के कर-कमलों द्वारा पुल का शिलान्यास किया गया। उस समय क्षेत्र के लोगों को लगा कि अब दिल्ली का लंबा चक्कर खत्म होगा और हरियाणा से सीधा संपर्क संभव हो सकेगा।
सत्ता परिवर्तन और परियोजना का ठहराव
लेकिन प्रदेश में सत्ता बदली और मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की सरकार आते ही यह परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई।
यह कहकर सबको चौंका दिया गया कि यह परियोजना उच्च स्तर से स्वीकृत ही नहीं है। इसके बाद वर्षों तक प्रदेश में सपा और बसपा की सरकारें रहीं, लेकिन इस पुल का नाम तक सरकारी फाइलों से गायब सा हो गया।
धीरे-धीरे क्षेत्र में यह धारणा गहरी होती चली गई कि केंद्र और प्रदेश में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारों के रहते इस पुल का बन पाना असंभव है।
2014–2017: राजनीति बदली, तस्वीर बदली
वर्ष 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनी और 2017 में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा सरकार आई। इसके बाद वर्षों से अटकी दनकौर–मंझावली यमुना पुल परियोजना को वास्तविक गति मिली।
वर्ष 2014 में ही केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इस पुल का पुनः शिलान्यास किया और स्पष्ट संदेश दिया कि यह परियोजना अब कागजों में नहीं, जमीन पर उतरेगी।
पुल तो बन गया, लेकिन रास्ता रह गया
सरकारी निगरानी और केंद्र–राज्य समन्वय के चलते यमुना नदी पर पुल का निर्माण निर्धारित समय सीमा में पूरा हो गया।
हालांकि उत्तर प्रदेश की ओर एक बड़ी बाधा बनी रही—
करीब डेढ़ किलोमीटर लंबा एप्रोच रोड, जो यमुना के पुश्ता तक आना था और फिर उसे चौड़ा कर ग्रेटर नोएडा के सड़क नेटवर्क से जोड़ा जाना था।
इस अधूरे रास्ते के कारण पुल तैयार होने के बावजूद आम जनता को उसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा था।
अटल बिहारी वाजपेयी मार्ग: अंतिम कड़ी पूरी
अब पुश्ता से लेकर पुल तक बनने वाले एप्रोच रोड का नाम “अटल बिहारी वाजपेयी मार्ग” रखा गया है और इसके भूमि पूजन कार्यक्रम के संपन्न होते ही वर्षों पुरानी यह आखिरी बाधा भी दूर हो गई है।
यह मार्ग न केवल भौगोलिक दूरी घटाएगा, बल्कि अटल जी के विकास, संवाद और समरसता के विचारों को भी साकार करेगा।
किसानों की भूमिका: विकास की असली नींव
इस पूरी परियोजना में किसानों की भूमिका सबसे अहम रही।
भूमि अधिग्रहण के दौरान मुआवजे का वितरण, सहमति और सहयोग के बिना यह परियोजना संभव नहीं थी। किसानों का कहना है कि अब वे अपनी फसलें हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश—दोनों जगह आसानी से बेच सकेंगे।
समय, ईंधन और अर्थव्यवस्था की बचत
अब तक फरीदाबाद जाने के लिए दिल्ली होकर लंबा चक्कर लगाना पड़ता था, जिसमें कई घंटे और अतिरिक्त ईंधन खर्च होता था।
दनकौर–मंझावली यमुना पुल और अटल बिहारी वाजपेयी मार्ग के पूरा होते ही घंटों का सफर मिनटों में बदल जाएगा। इससे न केवल आम नागरिकों को राहत मिलेगी, बल्कि व्यापार, उद्योग और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
जेवर एयरपोर्ट और NCR विकास से सीधा जुड़ाव
यह मार्ग नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (जेवर), औद्योगिक कॉरिडोर और प्रस्तावित फिल्म सिटी से सीधे जुड़कर NCR के विकास मानचित्र को नई दिशा देगा। आने वाले वर्षों में यह इलाका गुरुग्राम की तर्ज पर तेजी से विकसित होने की संभावना रखता है।
"विजन लाइव" का विश्लेषण:एक पुल, कई मायने
दनकौर–मंझावली यमुना पुल आज
राजनीतिक इच्छाशक्ति,
केंद्र–राज्य सहयोग,
किसानों की सहमति,
और दीर्घकालिक विकास दृष्टि
का जीवंत उदाहरण बन चुका है।
यह पुल बताता है कि जब सरकारें बदलती हैं, लेकिन नीयत मजबूत होती है, तब दशकों से रुके सपने भी हकीकत बन जाते हैं।