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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी : धर्म, आस्था और सांस्कृतिक एकता का पर्व

चौधरी शौकत अली चेची

भारत एक ऐसा देश है जहाँ विभिन्न धर्मों, जातियों और समुदायों के हजारों त्योहार मनाए जाते हैं। ये पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं बल्कि त्याग, बलिदान, भाईचारा, मानवता, परंपरा और ज्ञान की उन्नति की प्रेरणा भी देते हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण और पावन पर्व है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

श्रीकृष्ण जन्म का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु ने धरती पर बढ़ते अधर्म और अत्याचार को समाप्त करने के लिए द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया।
भविष्य पुराण व अन्य ग्रंथों में वर्णित है कि भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी की अर्धरात्रि, रोहिणी नक्षत्र में मथुरा की कारागार में देवकी और वासुदेव के घर श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।

राजा कंस द्वारा किए जा रहे अत्याचार और सात संतानों की मृत्यु के बाद, आठवीं संतान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। जन्म के समय चमत्कारिक घटनाएँ हुईं—कारागार के द्वार खुल गए, बेड़ियाँ टूट गईं, पहरेदार सो गए और वासुदेव ने नवजात कृष्ण को यमुना पार कर गोकुल में नंद-यशोदा के घर सुरक्षित पहुँचा दिया।

कंस वध और बाल लीलाएँ

कृष्ण बचपन से ही दिव्य लीलाओं के लिए प्रसिद्ध रहे। उन्होंने पूतना, तृणावर्त और अघासुर जैसे राक्षसों का वध किया और अंततः कंस का अंत कर धर्म की स्थापना की। गोकुल और वृंदावन की गलियों में माखन चोरी और गोपियों के संग रासलीला ने उन्हें "बाल गोपाल" और "मुरलीधर" के रूप में विख्यात बनाया।

इसी स्मृति में महाराष्ट्र और अन्य प्रदेशों में आज भी दही-हांडी उत्सव मनाया जाता है, जहाँ युवा टोली मानव पिरामिड बनाकर ऊँचाई पर बंधी मटकी फोड़ते हैं।

जन्माष्टमी का उत्सव

देशभर के मंदिरों, विशेषकर मथुरा और वृंदावन में यह पर्व विशेष धूमधाम से मनाया जाता है। श्रद्धालु दिनभर व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण की जन्म आरती व पंचामृत अभिषेक के बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोलते हैं। विदेशों में भी, विशेषकर ISKCON (हिस्कॉन) मंदिरों में कृष्ण जन्मोत्सव बड़ी आस्था और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

श्रीकृष्ण के उपदेश और आदर्श

  • महाभारत के युद्ध में अर्जुन को गीता का ज्ञान देकर धर्म, कर्म और भक्ति का मार्ग बताया।
  • द्रौपदी की लाज बचाकर स्त्री-सम्मान का आदर्श स्थापित किया।
  • सुदामा जैसे मित्र को सम्मान और समृद्धि देकर सच्ची मित्रता का उदाहरण प्रस्तुत किया।
  • अधर्म के विनाश और धर्म की रक्षा के लिए अपने जीवन को समर्पित किया।

इसी कारण श्रीकृष्ण को "योगेश्वर", "मुरली मनोहर", "गोविंद" और "वसुदेव" के नामों से पूजा जाता है।

ज्योतिषीय दृष्टि से जन्माष्टमी 2025

इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व आज शनिवार, 16 अगस्त 2025 को मनाया जा रहा है।

  • अष्टमी तिथि आरंभ: 15 अगस्त, रात्रि 11:49 बजे से
  • अष्टमी तिथि समाप्त: 16 अगस्त, रात्रि 9:35 बजे तक
  • जन्माष्टमी पूजन का शुभ मुहूर्त: 16 अगस्त, रात 12:04 से 12:45 बजे तक

जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नहीं बल्कि सत्य, धर्म, प्रेम, मित्रता और मानवता के मूल्यों को जीवन में उतारने का प्रेरणास्रोत है।


कानूनी अस्वीकरण (Disclaimer)

इस लेख में प्रस्तुत ऐतिहासिक, धार्मिक और ज्योतिषीय विवरण विभिन्न पुराणों, शास्त्रों और परंपरागत मान्यताओं पर आधारित हैं। ज्योतिषीय तिथि और समय पंचांग की गणना अनुसार हैं, जिनमें विभिन्न परंपराओं और आचार्यों के मतांतर संभव हैं। पाठक इन्हें आस्था और जानकारी के रूप में ग्रहण करें, इसे किसी भी प्रकार का कानूनी, आधिकारिक या वैज्ञानिक प्रमाण न माना जाए।


- ✍️ लेखक:   चौधरी शौकत अली चेची,राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, किसान एकता (संघ) सचिव, पिछड़ा वर्ग उत्तर प्रदेश (सपा) है।