बजट-2021-22 में गांव गरीब और किसान को लेकर कई लंबे चौडे दावे किए गए, मगर क्या वास्तव में गांव गरीब और किसान कुछ मिला?

 


 


क्या अन्नदाता देश का दुश्मन है या किसानों को सजा देने के लिए जेल बनाई जा रही है?

 


 


चौधरी शौकत अली चेची


-----------------------------भारत सरकार की ओर से वर्ष 2021-22 का बजट 01 फरवरी-2021 को पेश किया गया। इस बजट में गांव गरीब और किसान को लेकर कई लंबे चौडे दावे किए गए। मगर क्या वास्तव में गांव गरीब और किसान कुछ मिला है आखिर कहां गए कोविड-19 पीरियड दिया गया 20 लाख करोड का पैकेज। चलिए इन सब बातों पर बारीकी से नजर डालते हैं। डीजल, पेट्रोल पर कृषि सेंस लगा दिया जो केंद्र की झोली में जाएगा। किसानों को क्या लाभ मिला, किसानों की आय दोगुनी करने का कोई फार्मूला अभी तो शायद नहीं है। केवल कर्ज देने के नाम पर किसानों को बर्बाद करने की प्रक्रिया तैयार की जा रही है। सरकारी जमीनों को भी नीलाम करने का फार्मूला तैयार किया जा रहा है। सब कुछ तो बेच दिया शायद सरकार चलाने के लिए ठेका देने का क्या प्रस्ताव पास किया जा सकता है? बैंकों में से लगभग 65 प्रतिशत केंद्र ने और करीब 41 प्रतिशत प्रदेशों ने कर्ज लिया। बजट में किसानों को सच्चाई मालूम नहीं हो, शायद इसलिए पूरे दिन दिल्ली और एनसीआर के कुछ इलाकों में इंटरनेट बंद कर दिया गया। इससे क्या सच्चाई पर पर्दा पडा रहेगा? 4 दिन के बाद सच्चाई तो बाहर आ ही जाएगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आम बजट 2020.21 में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने को लेकर नई प्रइावेटाइजेशन पॉलिसी का ब्लूप्रिंट भी पेश किया है। सरकार इसके जरिये हजारों करोड़ रुपये का फंड जुटाने की जुगत में है। सूत्रों के हवाले से है कि नई नीति के तहत केंद्र सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के संचालन से बाहर आएगी। मतलब इन कंपनियों के नियमित कामकाज को निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया जाएगा। हालांकि फिलहाल सिर्फ नॉन स्ट्रैटजिक सेक्टर के का ही निजीकरण करने की योजना है। कैबिनेट ने पिछले दिनों ही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लिए नई नीति को हरी झंडी दी है, जिसके तहत ही यह तय किया जाएगा कि कौन से स्ट्रैटजिक हैं और कौन से नॉन स्ट्रैटजिक माना जा रहा है कि सार्वजनिक हित और नेशनल इंट्रेस्ट से जुड़ी कंपनियों को स्ट्रैटजिक सेक्टर्स में रखा जाएगा और बाकी को नॉन स्ट्रैटजिक सेक्टर्स में डाल दिया जाएगा। देश में इस वक्त केंद्र सरकार के स्वामित्व वाली तकरीबन 249 कंपनियां हैं, जिनमें से 54 से ज्यादा स्टॉक मार्केट में लिस्टेड हैं। इन कंपनियां का कुल टर्नओवर 24 लाख करोड़ रुपया और नेट वर्थ 12 लाख करोड़ रुपया है। देश की अर्थव्यवस्था में इन कंपनियों का महत्वपूर्ण योगदान है,् पिछले साल मई में सरकार ने आत्मनिर्भर भारत के तहत यह घोषणा की थी कि स्ट्रैटजिक सेक्टर में अधिकतम 4 कंपनियां होंगी इस तरह अन्य क्षेत्र की सरकारी कंपनियां निजीकरण के दायरे में आएंगी। नई नीति के अंतर्गत स्ट्रैटजिक सेक्टर की एक लिस्ट अधिसूचित की जाएगी, जिसमें कम से कम एक और अधिकतम 4 कंपनियां होंगी। दूसरी तरफ, अन्य सेक्टर्स में सक्रिय को फीजिबिलिटी के आधार पर प्राइवेट सेक्टर को सौंपा जाएगा। बजट में सरकार की हिस्सेदारी बेचने पर फोकस रहा है। इसके जरिये सरकार बढ़ते खर्च के लिए फंड जुटा सकेगी। ं सरकार अभी तक अपनी हिस्सेदारी बेचकर अब तक 17,957 करोड़ रुपये जुटा चुकी है। मालूम हो कि हिस्सेदारी बेचकर और शेयर बायबैक के जरिये सरकार ने 2.10 लाख रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था। हालांकि मौजूदा स्थिति में यह संभव नहीं लग रहा है। इस बजट की गहराई में जाकर देखें तो 5 बड़े ऐलान किए गए औंर जिसमें पांच झटके भी दिए हैं। इनमें कोरोना वैक्सीन के लिए 35000 करोड़ का ऐलान, बीमा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा 49 से बढ़कर 74 फीसदी, सोना.चांदी होगा सस्ता, लेदर प्रोडक्ट भी होंगे सस्ते, पहली बार देश में डिजिटल जनगणना, 75 साल से अधिक उम्र के लोगों को टैक्स नहीं भरना होगा। अब झटका देने वाले ऐलानों को भी देखिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पेट्रोल पर 2.50 रुपये और डीजल पर 4 रुपये का कृषि सेस लगाने का ऐलान किया। हालांकि ऐसा कहा जा रहा है कि इसका असर उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ेगा और ये सेस कंपनियों को देना होगा। मगर आशंका जताई जा रही है कि बाद में कंपनियों की मनमानी की कीमत कहीं उपभोक्ताओं को चुकानी पड़ सकती है। दूसरा टैक्स पेयर्स को कोई राहत नहीं।  कोरोना काल में टैक्स पेयर्स को कुछ छूट मिलने की उम्मीद थी, मगर वे खाली हाथ रह गए। इस बजट में उनके लिए कुछ भी नहीं है। मिडिल क्लास और नौकरी.पेशा वालों के लिए न तो कोई अतिरिक्त टैक्स छूट दी गई और न ही टैक्स स्लैब में कोई बदलाव किया गया। कम सैलरी वाले टैक्सपेयर्स, मिडिल क्लास और छोटे.मोटे बिजनेस करने वालों को टैक्स को लेकर सबसे अधिक उम्मीदें थीं, मगर उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टैक्स स्लैब में इस बार कोई भी बदलाव नहीं किया। इस तरह से मध्यम वर्गीय लोगों को पहले की तरह ही टैक्स नियमों का पालन करना होगा। सिर्फ 75 साल से अधिक उम्र के लोगों को राहत मिली है।


तीसरा मोबाइल फोन होंगे महंगे। सरकार के इस बजट से मोबाइल खरीदने की चाह रखने वालों को झटका लगा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मोबाइल उपकरण पर कस्टम ड्यूटी को बढ़ाने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि मोबाइल उपकरण पर अब कस्टम ड्यूटी 2.5 फीसदी तक लगेगा। आंकड़ों की मानें तो पिछले 4 साल में सरकार ने इन मोबाइल प्रोडक्ट्स पर औसतन करीब 10 फीसदी तक इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाई है। मोबाइल आज के वक्त में हर इंसान की जरूरत है, ऐसे में अगर यर प्रोडक्ट महंगा हुआ तो इसका असर आम लोगों पर पड़ेगा, यानी सरकार ने हर आम आदमी की जेब से बडी चालाकी से पैसे निकालने की जुगत भिडा दी है। चौथा रोजगार को लेकर कोई ठोस रणनीति नहीं। केंद्र सरकार ने बजट में इन्फ्रास्ट्रक्टर और हाईवे निर्माण को लेकर बड़े ऐलान किए हैं। बंगाल से लेकर असम तक में राजमार्गों का निर्माण होगा। इस काम से भले ही काफी लोगों को रोजगार मिलेगा, मगर बजट में रोजगार सृजन को लेकर न तो कोई स्पष्ट और प्रत्यक्ष तौर पर बात की गई है और न ही इसे लेकर कोई ठोस रोडमैप दिखाया गया है। देश में इस साल कितने रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे, इसे लेकर भी कोई स्पष्टता नहीं दिखी। पांचवा सबसे झटका देने वाला ऐलान किसानों को लेकर है। किसानों की उम्मीदों को इससे बडा झटका लगा है। किसान आंदोलन को ध्यान में रखते हुए ऐसी उम्मीद थी कि इस बजट में खेती.किसानी पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है और पीएम किसान सम्मान निधि स्कीम में मिलने वाले पैसे को बढ़ाया जा सकता है, मगर ऐसा नहीं हुआ। पीएम किसान योजना के तहत अभी हर साल 6,000 रुपए मिलते हैं और ऐसी उम्मीदे थीं कि इसमें 3,000 रुपए का इजाफा हो सकता है, मगर ऐसा नहीं हुआ। कुछ विपक्षी दल और किसान संगठन पीएम किसान योजना के तहत इस राशि को 6,000 रूपये सालाना से बढ कर 24,000 हजार रूपये किए जाने की मांग कर रहे हैं। कई विशेषज्ञ यह मान रहे थे कि मोदी सरकार किसान आंदोलन को देखते हुए इस बारे में कुछ नया फैसला ले सकती है, मगर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के भाषणों में ऐसा कुछ भी नहीं दिखा। यही कारण है कि बजट को देख कर किसान अपने को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर किसानों के धरने के चारों तरफ सडक पर कील ही बल्कि शूल गाडे जा रहे हैं। देश की सीमाओं की तरह है पत्थरों की बैरीकेटिंग और कटीले तार लगाकर सरकार क्या संदेश दे रही है यह भी समझने का विषय है? क्या अन्नदाता देश का दुश्मन है या किसानों को सजा देने के लिए जेल बनाई जा रही है? कृषि कानून वापस नहीं  लेना और एमएसपी पर गारंटी कानून नहीं बनाना, किसानों को बंधुआ मजदूर बनाया जा रहा है।

लेखकः. चौधरी शौकत अली चेची भारतीय किसान यूनियन ( बलराज) के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष  हैं।